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Vaastushastram

वास्तु का अर्थ

दिशा इंसान की दशा बदल देती है I वास्तु कला समस्त कलाओं की जननी है I वास्तु वह स्थान है जिस पर कोई इमारत खड़ी हो I वास्तु शास्त्र 5000 साल से भी अधिक प्राचीन है I वेदों पुराणों और उपनिषदों में इस विज्ञान का विवरण मिलता है I वास्तु शास्त्र के अनुकूल बना गृह सभी भांति शुभ फल देने वाला होता है और वास्तु की त्रुटि वाला गृह न केवल गृह- स्वामी के कष्ट का कारण बनता है, अपितु इसमें वास करने वाले लोगों पर भी अपना प्रभाव दिखाता है I अतः भवन निर्माण से पहले किसी योग्य वास्तु विशेषज्ञ से परामर्श ले लेना ही उत्तम रहता है I भवन निर्माण करवाते समय यदि उचित कर्म- काण्ड कर लिए जाये तो भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी से बचा जा सकता है I लेकिन जो लोग बने बनाए मकान या फ्लैट खरीदते हैं वे क्या करें ? वे अपने घर का वास्तु दोष किस प्रकार दूर करें ? आपकी समस्या के लिए हमारे पास है एक सटीक उपाय I आप इस उपाय को अपनाएं और देखें कि किस प्रकार से आपका घर स्वर्ग कि भांति सुख देने वाला हो जाता है I

वास्तु का अर्थ है वस्तु I वस्तु यानि जिसकी सत्ता या जो अस्तित्व में है I वस्तु शब्द से पृथ्वी, भवन एवं भवन में रखी जाने वाली वस्तुओं का बोध होता है I वास्तु का दूसरा अर्थ भी निकलता है वास अर्थात निवास I एक व्यक्ति धूप में चलते- चलते थक जाता है वह भी कुछ देर विश्राम के लिए छाया की तलाश करता है , यानि कुछ क्षणों के वास के लिए भी उचित स्थान देखता है, तो जो भौतिक आवश्यकता है, हर पल की जरूरत है, जहाँ सुख- शांति, समृद्धि, पुत्र- पौत्र की इच्छाएं हैं, आशाएं हैं उस भवन को बनाने में जितने जतन करें उतने ही कम हैं I क्योंकि वो अपने जीवन भर की खून- पसीने की गाढ़ी कमाई खर्च कर इधर-
उधर से कर्ज लेकर अपना घर बनाने की कल्पना को साकार रूप देता है I
वास्तुशास्त्रादूते तस्य न स्यावल: क्षणनिश्चय: I
तस्समाल्लोकस्य कृपया शास्त्रमतेदुदीर्यते II   
अर्थात -" वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अतिरिक्त अन्य कोई प्रकार नहीं है I जिससे यह  निश्चित किया जा सके कि कोई भी भवन सही निर्मित है या नहीं I" वास्तुशास्त्र के नियम बहुत ही सूक्ष्म अध्ययन और अनुभव के आधार पर बने हैं, इसमें पंच मूलभूत तत्वों का भी समावेश किया गया है ये पंच मूलभूत तत्व हैं- आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि I  
इन तत्वों के वैज्ञानिक उपयोग से पूर्ण रूप से संतुलित वातावरण की रचना होती है, जो अच्छे स्वास्थ्य, सम्पत्ति तथा सम्पन्नता की प्राप्ति को सुनिश्चित करता है I यदि हम वास्तु की ओर समुचित ध्यान न दें तो हमारा घर ही हमारा शत्रु बन जाता है अर्थात हमें अनेक प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है I
वास्तुशास्त्र को जानने योग्य जरुरी बातें

  • मकान बनाने के लिए भूखंड हमेशा समचौरस, समकोण ही उपयुक्त रहता है I त्रिकोण, गोल व कोना कटा हुआ उपयुक्त नहीं रहता है I
  • दक्षिण दिशा को भारी रखें ( अन्य दिशाओं से ) यदि भारी न हो तो वहां पहाड़ की सीनरी  बनाकर या उस दीवार को बाकि अन्य दीवारों से थोड़ी सी ऊपर करके भारी किया जा सकता है I दक्षिण दिशा में अशोक, कदम्ब के वृक्ष लगाकर भारी किया जा सकता है I
  • घर में स्थाई लक्ष्मी के वास के लिए तुलसी का पौधा जरुर लगायें व शाम को जरुर तुलसी के पौधे पर दीपक करें I
  • केले के वृक्ष व अनार के पौधे का भी दीपक से पूजन करने से लक्ष्मी प्रसन्न रहती है I यदि संभव हो तो इनके सन्मुख श्रीसूक्त का पाठ करें I
  • घर के द्वार को साफ़ रखें, द्वार पर किसी प्रकार की अड़चन या रूकावट नहीं होनी चाहिए, इसे द्वारबेध कहते हैं I सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू नहीं लगाएं I जरुरी होने पर पौचा या कपडे से आंगन को साफ़ किया जा सकता है I
  • घर के ईशान कोण, ब्रह्म स्थान को हमेशा पवित्र रखें, यहीं से पूरे घर को, घर के सदस्यों को उर्जा मिलती है I यहाँ भूलकर भी मूत्रालय (शौचालय) नहीं बनाएं I पूजा के लिए यह एकदम उपयुक्त दिशा है I जरुरी व आवश्यकता होने पर ईशानकोण में स्नानघर बनाया जा सकता है I
  • घर के अग्निकोण (दक्षिण- पूर्व) में रसोई होनी चाहिए I रसोई में वेंटीलेशन (झरोखे व खिड़कियाँ) अवश्य ही होनी चाहिए, नहीं होने पर (एग्जास्ट फैन) लगाकर या गैस पर चिमनी लगाकर दोष को शुद्ध किया जा सकता है, इससे वातावरण शुद्ध होता है I
  • शयन कक्ष में पलंग दक्षिण- पश्चिम के कोने में होना चाहिए I
  • शयन कक्ष में शीशा (दर्पण) नहीं होना चाहिए I दर्पण यदि हो भी तो उसमें पलंग नहीं दिखना चाहिए, जिस समय दर्पण इस्तेमाल नहीं हो रहा हो उस समय उसे ढककर रखें I
  • मुख्य द्वार से बड़ा कोई भी द्वार नहीं होना चाहिए I मुख्य द्वार के सामने भी कोई दरवाजा नहीं होना चाहिए, जिससे कोई बाहरी व्यक्ति घर के अन्दर की गतिविधियां न देख सके I
  • प्रवेश द्वार के सामने सीढियां नहीं होनी चाहिए, सीढियों की संख्या सदैव ही विषम संख्या में होनी चाहिए जैसे 5,7,9,11 इत्यादि I 13 संख्या की सीढियां भी नही होनी चाहिए I
  • सीढियां  सदैव दाईं तरफ होनी चाहिए I
  • तिजोरी हमेशा उत्तर दिशा में इस प्रकार से रखें कि उसका मुँह दक्षिण दिशा की ओर खुले I सीढियों के नीचे पूजा घर नहीं होना चाहिए I
यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /- यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I घर, दुकान, फैक्ट्री या किसी भी व्यवसायिक स्थल की मिट्टी भेजकर दोषों को, बन्धनों को, उपरी चक्करों एवं किये कराये को चैक करवायें एवं अपने जीवन को गति दें I मात्र Rs. 250 /-

वास्तु एवं पंचतत्व

वास्तुशास्त्र के समस्त नियमों एवं सिद्धांतों का निर्धारण दिशाओं, विदिशाओं एवं पंचतत्वों के आधार पर ही किया गया है I पंचतत्वों से मिलकर ही इस सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, ये पंचतत्व हैं- आकाश, वायु, पृथ्वी, जल एवं अग्नि I
जिस प्रकार शरीर में जब इन पांचों तत्वों का असंतुलन हो जाता है तो व्यक्ति के शरीर में शारीरिक एवं मानसिक तनाव तथा अस्वस्थता उत्पन्न हो जाती है I इसी प्रकार भवन में इन पांच तत्वों के असंतुलन होने पर भवन में रहने वालों को शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता का सामना करना पड़ता है I
आकाश :  यहाँ आकाश का तात्पर्य अनंत शून्य से है इआकाश अनंत है I इस अनंत शून्य में ही समस्त संसार का अस्तित्व है I वास्तुशास्त्र में आकाश का स्थान भवन के आंगन को माना जाता है I आंगन प्राय: भू- खण्ड- भवन के मध्य भाग में बनाया जाता है, भू- खण्ड- भवन के मध्य भाग को ब्रह्म का स्थान माना जाता है जिसे खुला रखने का वास्तुशास्त्र में निर्देश दिया गया है ईसके खुला रहने से भवन में सूर्य- उर्जा भी प्राप्त होती है ईसी वजह से वास्तुशास्त्र में निर्देश किया गया है कि भवन में पूर्व एवं उत्तर का भाग दक्षिण एवं पश्चिम के भाग कि अपेक्षा नीचा रहना चाहिए, ताकिअपराह्न के पश्चात् सूर्य की हानिकारक किरणों से स्वास्थ्य से रक्षा हो सके I
खुले आकाश से नैसर्गिक ऊर्जाओं का प्रवाह निर्वाध रूप से होता रहता है I सामान्यत: यह सुनने में आता रहता है कि अमुक भवन में प्रेत का वास है I इसका मुख्य कारण भावं में आकाश एवं वायु तत्व का असंतुलित होना पाया जाता है I इसलिए भवन में आकाश तत्व के महत्व को नकारा नहीं जा सकता I
वायु :  वायु का महत्व सर्वविदित ही है I इस ब्रह्माण्ड में समस्त प्राणियों के जीवन का आधार वायु ही है ईस पृथ्वी के चारों ओर  वायु स्थित है I वायु में अनेक प्रकार की गैसें भी सम्मलित होती हैं I इनमें प्राण- वायु (आक्सीजन) का प्रवाह निर्वाध रूप से बना रहे, इसके लिए वास्तु शास्त्र में विभिन्न सिधांतों को अपनाया गया है I इसी तथ्य को ध्यान में रखकर ही वास्तुशास्त्र में यह सिधांत बनाया गया है कि पूर्व और उत्तर दिशा का भाग ज्यादा खुला रहना चाहिए तथा इस दिशा की सतह भी नीची ही रखनी चाहिए, जिससे भवन में प्रात:काल के सूर्य का प्रकाश एवं वायु आसानी से प्रवेश कर सके I भवन के पश्चिम- उत्तर दिशा जो वायव्य कोण के नाम से जनि जाती है, वायु के लिए विशेष रूप से जानना चाहिए इभावन के पश्चिम और उत्तर दिशाओं में वायु सेवन का स्थान रखना चाहिए I वायु तत्व की प्राप्ति इस दिशा की ओर से प्राप्त करना स्वास्थ्य और भवन के लम्बे समय तक बनने के लिए आवश्यक है I
वायु- संचरण के लिए भवन में दरवाजों, खिडकियों, रोशनदान, बरामदा, बालकनी, कूलर आदि की दिशा निर्धारण हेतु वास्तुशास्त्र में विभिन्न नियम दिए गए हैं I वास्तुशास्त्र में वायु के लिए वायव्य कोण की दिशा निश्चित है I
जल :  जल ही जीवन का आधार है I जल के अभाव में जीवन की गति रुक जाती है I हमारे प्राचीन ग्रंथों में जलदान करने का पुण्य विशेष रूप से वर्णित है कि एक कुआं बनवाने से व्यक्ति को अग्निहोम के तुल्य फल की प्राप्ति होती है I जलदान ऐसा पुण्य कार्य है जिसके करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है I गृहस्वामी को भवन में निवास करने वाले अपने परिवार के लिए जल कि व्यवस्था करना अति आवश्यक है I
वास्तुशास्त्र में इस बात के सिद्धांत भी निर्धारित किये गए हैं कि भवन- भू- काण्ड की किस दिशा में पीने का पानी लिया जाए तथा अनुपयोगी जल कि निकासी किस दिशा में होनी चाहिए I ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड में जल और भूमि का उचित संतुलन किया हुआ है I जब कभी इस संतुलन में परिवर्तन होता है तो उसी के परिणाम स्वरुप बाढ़ और सूखा जैसी स्थितियां पैदा होती हैं I
अग्नि :  पंचतत्वों में अग्नि तत्व का विशेष महत्व है, अग्नि मानव का मुख्य आधार है I वैदिक काल में अग्नि को देव मानकर यज्ञों द्वारा पूजन, देवता आदि को आराधना कि जाती थी I आज भी प्रत्येक शुभ कार्य में हवं करने का विशेष महत्व बताया गया है हवं में मुख्य रूप से अग्नि ही प्रज्ज्वलित की जाती है I अग्नि का अर्थ है- ताप, तेज अथवा उर्जा I इस ब्रह्माण्ड में उर्जा का मुख्य स्त्रोत है- सूर्य I पृथ्वी पर सूर्य की किरणों से प्रकाश के साथ उर्जा भी प्राप्त होती है, सूर्य की इसी प्रकाश और उर्जा से पृथ्वी पर स्थित सभी वनस्पतियों का जीवन- चक्र चलता है I
वास्तुशास्त्र में पूर्व- दक्षिण दिशा अर्थात अग्नि कोण अग्नि का स्थान निर्धारित है I अतः भवन- निर्माण के समय अग्नि स्थान का निर्धारण अग्नि कोण में ही निर्धारित करना चाहिए I भवन में अग्नि से संबंधित समस्त कार्य- रसोइघर, बिजली का मित्र आदि को आग्नेय कोण में ही स्थापित करना चाहिए I
पृथ्वी :  सर्वप्रथम पृथ्वी का गुणात्मक दृष्टि से तथा आकार एवं प्रकार को ध्यान रखकर ही चयन करना आवश्यक है I पृथ्वी तत्व की शुद्धता एवं गुनात्म्कता के लिए मिट्टी का रंग, गंध, आर्द्रता, उर्वरा शक्ति आदि के आधार पर करना चाहिए, ताकि पृथ्वी तत्व का भवन- निर्माण के लिए सही चयन किया जा सके I
पृथ्वी तत्व में भूखंड की भूमि, शल्य- दोष, आकार आदि भी देखा जाना चाहिए I भवन में दक्षिण- पश्चिम दिशा अर्थात नैर्ऋत्य कोण को मुख्यत: पृथ्वी तत्व का स्थान माना गया है I इसीलिए वास्तुशास्त्र में इस कोण को अन्य दिशाओं की अपेक्षा भारी रखने का प्रावधान बतलाया गया है I
भवन- निर्माण में उपरोक्त पंचतत्वों का संतुलित प्रयोग करने से वहां निवास करने वाले मनुष्य को आरोग्यता, समृद्धि एवं मानसिक शांति प्राप्त होगी I वास्तुशास्त्र के सिद्धांत इन्हीं पंचतत्वों पर आधारित हैं, अतः भवन- निर्माण में इनका उचित संतुलन बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है I
पंचतत्वों के संतुलित अनुपात के परस्पर संबंध को ही वास्तु कहते हैं I व्यक्ति की परिधि में सुधार व संवारने को तीन तत्व हैं- अग्नि, भूमि और जल I यदि व्यक्ति ने अपने भवन में इन तीनों तत्वों को नियमानुसार स्थापित कर लिया तो शेष दोनों तत्व, आकाश और वायु अपने आप अनुकूल हो जाते हैं I

वास्तु एवं दिशाएं

वास्तुशास्त्र में दिशाओं और उसके कोणों का विशेष महत्व है I वास्तु शास्त्र के नियमों का निर्धारण दिशाओं एवं पंचतत्वों के आधार पर ही किया गया है ताकि मनुष्य वास्तु सिद्धांतों के अनुसार भवन- निर्माण करके सुख- समृद्धि, आरोग्यता और मानसिक शांति के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर सके I 
पूर्व दिशा : प्रात:काल सूर्य जिस दिशा में उदय होता है वह दिशा पूर्व होती है I यह दिशा सूर्योदय की है I यह दिशा अग्नि तत्व को प्रभावित करती है I यह पितृ स्थान की भी सूचक है I इस दिशा को बंद कर देने से सूर्य की किरणों का गृह में प्रवेश रुक जाता है और इस प्रकार के भवन में निवास करने से भिन्न- भिन्न प्रकार की व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं I ऐसे भवन में निवास करने वाले मनुष्य को मान- सम्मान की हानि होती है I ऋण का बोझ बढ़ता है, पितृ दोष लगता है I घर में मंगलीक कार्यों में बाधाएं या रुकावट उत्पन्न होती है I 
पश्चिम दिशा : सांयकाल सूर्य के अस्त होने की दिशा पश्चिम होती है I यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है I इसका देवता वायु माना गया है I वायु चंचलता का प्रतीक है I यदि घर का दरवाजा पश्चिमाभिमुखी है तो इसमें रहने वाले का मन सर्वथा चंचल रहता है I उसे किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिलती है I बच्चों की शिक्षा में रुकावट पैदा होती है I मानसिक तनाव बना रहता है I धन का आवागमन बना रहता है I यदि इस मुख की दुकान हो तो प्राय: लक्ष्मी ठहरती नहीं है I लेकिन परिश्रम करने से यश व उन्नति प्राप्त होती है परन्तु धन का ठहराव प्राय: न के बराबर होता है I
उत्तर दिशा : प्रात:काल सूर्य की ओर मुख करके खड़े होने पर बायें हाथ (Left Hand) की ओर वाली दिशा उत्तर दिशा होती है I यह दिशा मत्री भाव की दिशा मानी जाती है I इस दिशा में जल तत्व का होना माना गया है I उत्तर दिशा में खाली स्थान होना चाहिए I इस दिशा का स्वामी कुबेर को माना जाता है I यह दिशा धन- धान्य, सुख- सम्पत्ति एवं जीवन में सभी प्रकार का सुख देती है I विद्या- अध्ययन, चिन्तन- मनन या कोई भी ज्ञान संबंधी कार्य इस दिशा की तरफ मुख करके करने से पूर्ण लाभ होता है I उत्तर- मुखी दरवाजे एवं खिडकियां होने से कुबेर की सीधे दृष्टि पड़ती है I
दक्षिण दिशा : प्रात:काल सूर्य की ओर मुख करके खड़े होने पर दायें हाथ (Right Hand) की ओर वाली दिशा दक्षिण दिशा होती है I दक्षिण दिशा को पृथ्वी तत्व माना गया है I यह मृत्यु के देवता यं की दिशा है I यह धैर्य एवं स्थिरता का स्वरुप है I यह दिशा समस्त बुराइयों का नाश करती है ओर सब प्रकार की अच्छी बातें सूचित करती है I इस दिशा से शत्रु भय भी होता रहता है I यह दिशा रोग भी प्रदान करती है इस दिशा को बंद रखना उत्तम होता है I यदि इस दिशा में दरवाजे या खिडकियां होँ तो उन्हें बंद रखें I
उत्तर- पूर्व या ईशान कोण : उत्तर दिशा और पूर्व दिशा का मध्य भाग ईशान कोण कहलाता है I इस दिशा को उत्तर एवं पूर्व दोनों दिशाओं के मध्य होने के कारण ईश्वर की भाँति पवित्र माना गया है I यह कोण बुद्धि, ज्ञान, विवेक, धैर्य, साहस प्रदान करती है और सभी तरह के कष्टों से मुक्त रखती है I भवन में यदि यह दिशा दूषित होती है तो घर में भिन्न- भिन्न प्रकार के कष्ट उत्पन्न होते रहते हैं, बुद्धि भ्रष्ट होती है, घर में प्राय: कलहपूर्ण वातावरण बना रहता है I
दक्षिण- पूर्व या आग्नेय कोण : पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा का मध्य भाग आग्नेय कोण होता है I इस दिशा में अग्नि तत्व का प्रभुत्व माना गया है I इस दिशा का संबंध स्वास्थ्य से भी है I यदि भवन में यह दिशा दूषित है तो इसमें रहने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य किसी न किसी रूप में ख़राब रहता है I प्राय: परिवार का कोई न कोई सदस्य सदैवरोग ग्रस्त रहता है I इस कोण के दूषित होने से अग्नि द्वारा हानि का भय भी बना रहता है I
दक्षिण- पश्चिम या नैर्ऋत्य कोण : दक्षिण- पश्चिम दिशा के मध्य स्थित कोण को नैर्ऋत्य कोण कहते हैं I यह दिशा शत्रु के भय का नाश करती है, चरित्र और मृत्यु का कारण भी होता है I यह दिशा दूषित होने से इसमें रहने वाले व्यक्तियों का चरित्र प्राय: कलुषित होता है I सर्वदा शत्रुओं का भय बना रहता है I उन पर शत्रुओं का प्रभाव अधिक होता है I भवन में भूत- प्रेत बाधा में उत्पन्न होने की संभावनाएं बनी रहती हैं I आकस्मिक दुर्घटना होने की सम्भावना होती है I
उत्तर- पश्चिम या वायव्य कोण : पश्चिम एवं उत्तर दिशा के मध्य स्थित यह दिशा वायव्य कोण होती है I यह कोण वायु का स्थान माना जाता है I यह कोण दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है I यह दिशा व्यवहारों में परिवर्तन का सूचक है I भवन में यह दिशा दूषित होने पर मित्र भी शत्रु बन जाते हैं I शक्ति का ह्रास होता है I आयु क्षीण होती है I अच्छे व्यवहारों में परिवर्तन हो जाता है I कोण के दूषित होने पर भवन में निवास करने वालों में घमंड की मात्रा अधिक हो जाती है I
आकाश : आकाश का अर्थ क्षितिज से है I यदि किसी वृक्ष, खम्बे, भवन आदि की छाया भवन की छत पर पड़ रही है, तो इसका भी प्रभाव पड़ता है I वास्तु शास्त्र में इसकी भी विवेचना की गयी है I
पृथ्वी (पाताल) : पाताल, पृथ्वी के नीचे I भूमि की परत कुछ निश्चित गहराई तक वास्तु शास्त्र के अधीन मानी जाती है I भूमि की इस परत की स्थिति एवं इसके नीचे दबी सामग्रियों का प्रभाव भवन पर पड़ता है I ऐसा भूमि के नीचे दबे हुए किसी अवांछित पदार्थों के कारण होता है I इसका प्रभाव दो- तीन मंजिलों तक पड़ता है I

मुख्य वास्तुदेव

सभी प्रकार के मंगलीक कार्यों में नवग्रह पूजन के साथ- साथ दासों दिशाओं के स्वामियों के पूजन का भी विधान है I निऋति देव नैऋत्य  दिशा (उत्तर- पश्चिम कोण) के स्वामी है I ये विशालकाय शरीरधारी, काजल की तरह काले रंग के और परम वीर हैं I इनके आभूषण पीले रंग के और आयुध खडग है I ये राक्षसों के अधिपति हैं किन्तु ये जाति से ही राक्षस है I इनके आचरण पूरी तरह से शुद्ध हैं और ये श्रुति व स्मृति द्वारा निर्देशित मार्ग का ही अनुसरण करते हैं I ये प्रतिदिन व्रत और देवताओं की पूजा करते हैं I दिशा स्वामिनी निऋति की उत्पत्ति अमृत- मंथन के समय समुद्र से पाप की अधिदेवी के रूप में हुई I लक्ष्मी से पहले उत्पन्न होने के कारण ज्येष्ठा हैं I उनका निवास पीपल के वृक्ष में है I 
वरुण
इनके पिता कश्यप ऋषि और माता अदिति होने के कारण बारह आदित्यों में इनकी गणना की जाती है I वेदों में इन्हें प्रकृति के नियमों का व्यवस्थापक बताया गया है I पृथ्वी और अंतरिक्ष में जल के जितने भी रूप हैं, उनका स्वामी वरुण देव को ही माना गया है I इनका रंग स्वर्णिम है I ये आदित्य के रूप में दिन में सारे संसार को प्रकाशित करते हैं तथा रात्रि में तारों को अपने प्रकाश से प्रकाशित कर सभी प्राणियों की अंधकार से रक्षा करते हैं I इनका रथ सूर्य की तरह चमकने वाला है, जिसे कई घोड़े खींचते हैं I इनका वाहन मकर भी है I ये पश्चिम दिशा के स्वामी हैं I
कुबेर
विश्रवा की दो पत्नियां थी- इडविडा और केशिनी I केशिनी के पुत्र रावण, कुंभकर्ण और विभीषण थे और इडविडा के पुत्र कुबेर देव हैं जो 9 निधियों (पदम्, महापदम, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व) के स्वामी कहे जाते हैं I कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर नें इन्हें यक्षों का अधिपति बनाया I इनका तपस्या स्थल कुबेरतीर्थ के नाम से जाना जाता है I इनकी राजधानी कैलास स्थित अलकापुरी है I श्रीमद्भागवत में इन्हें भगवान शंकर का सखा कहा गया है I यक्षों और राक्षसों की विशाल सेना इनके पास है I ये खडग, त्रिशूल और गदा धारण करते हैं I
राजा कुबेर समस्त ब्रह्माण्ड के धनाधिपति होते हुए भी देवताओं के धनाध्यक्ष के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं इईसा माना जाता है कि धनपति कुबेर के साथ शुक्र व धनिष्ठा नक्षत्र की कृपा के बिना संसार का वैभव व गुप्त धन की प्राप्ति नहीं हो सकती I धन और अनंत ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए इन तीनों की उपासना करनी चाहिए I
विश्वकर्मा
इंद्र की नगरी अमरावती के निर्माता तथा वास्तु के अठारह आचार्यों में से एक 'विश्वकर्मा' का उल्लेख 'समरांगण सूत्रधार' में मिलता है I
वेदों में आठ वस्तुओं का उल्लेख किया गया है तथा उनको विभिन्न कलाओं का विशेषग्य माना गया है I इनमें आठवें वसु 'प्रभास' के पुत्र विश्वकर्मा संसार के प्रथम शासक महाराज पृथु के समकालीन हैं I
भवन निर्माण व शिल्पशास्त्र अत्यन्त प्राचीन समय से भारत में हैं तथा भारत की यह विशेषता रही है कि भारतीयों ने भवन निर्माण कला को 'स्थापत्य वेद' मानते हुए निराकार ब्रह्म को साकार रूप में प्रतिस्थापित कर दिया है I पुराणों के एक आख्यान संहदेवाधिकार अनुसार देवताओं व मनुष्यों को एक साथ पृथ्वी पर रहना बताया गया है I मनुष्यों द्वारा देवताओं की आज्ञा की अवहेलना के फलस्वरूप देवता अपने स्थान पर वापस चले गए तथा पृथ्वी को मनुष्यों के लिए छोड़ दिया I
ब्रह्मा द्वारा महाराज पृथु को समस्त प्राणियों के आवास की रचना का तथा 'विश्वकर्मा' को राजदण्ड के भय से रहित होकर सामान्य व्यक्तियों के लिए "वास्तु" के नियमों का तकनीकीपूर्ण प्रावधान करने का आदेश दिया गया I
मंडन सूत्रधार के अनुसार हंसवाहन वाले विश्वकर्मा त्रिनेत्र व चतुर्भुज हैं जिनकी चार भुजाओं में क्रमश: अक्षमाला, पुस्तक, शंख एवं कमंडलु है I
किसी भी व्यक्तित्व को असीमित सत्ता देने पर उसके निरंकुश होने की सम्भावना रहती है, अतः ब्रह्मा द्वारा 'विश्वकर्मा' को असीमित सत्ता प्रदान न करते हुए वास्तु पुरुष की सत्ता के रूप में उन पर अंकुश लगा दिया गया I
वास्तु पुरुष ने ब्रह्मा से वरदान व अभयदान पाया था, अतः विश्वकर्मा को वास्तु पुरुष की सीमाओं में रहकर कार्य करना होता है I
पुराणों के पृथु गौदोहन वृत्तांत के मूल में विश्वकर्मा को निर्माण तकनीकी पक्ष की सर्वश्रेष्ठ सत्ता माना गया है तथा शासक वर्ग से यह अपेक्षा की गयी है कि वह तकनीकी मापदंडों का उल्लंघन न करें I
शास्त्रों में यहां तक वर्णन है कि नियम विरुद्ध कार्य करने पर स्थापित (Architect) का भी नाश हो जाता है I वर्तमान स्थापित (आर्किटेक्ट एवं बिल्डर्स) विश्वकर्मा के श्रेष्ठ प्रतिनिधि माने जा सकते हैं अतः उनका यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वे आज भी शासन के भय के बिना निर्माण के नैतिक व तकनीकी पक्षों का निर्भय होकर प्रकटीकरण करें तथा शासक वर्ग का यह कर्तव्य है कि वह निर्माण के सार्वभौमिक नियमों का पालन करें I
सूर्य
सूर्य का नाम 'सविता' भी है, जिसका अभिप्राय है सृष्टि करने वाला I वस्तुत: सूर्य सारे संसार के प्रेरक, उत्पादक और परमात्मस्वरुप है I मार्कंडेय पुराण के अनुसार जब ब्रह्माजी अंड का भेदन कर उत्पन्न हुए, तब उनके मुख से ॐ शब्द उच्चारित हुआ I यह ओंकार परब्रह्म है और यही सूर्य देवता का शरीर है I
सनातन विधान के अनुसार दैत्यों, दानवों एवं राक्षसों ने संगठित होकर देवताओं को पराजित कर दिया I देवताओं कि माता अदिति ने दुखी होकर सूर्यदेव कि उपासना कर उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने कि कामना की I सूर्यदेव ने इस कामना को फलीभूत किया I अदिति के पुत्ररूप में वे आदित्य कहलाये I उन्होनें शत्रुओं का नाश कर वेदमार्ग को पुर्नस्थापित किया, इनका वर्ण लाल है I वाहन रथ है जिसे सात घोड़े खींचते हैं I इनकी दो पत्नियां हैं - एक का नाम संज्ञा है जो विश्वकर्मा त्वष्टा की पुत्री है I दूसरी का नाम छाया या निक्षुभा है I संज्ञा के वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्विनी कुमार और रैवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि और सावर्णिमनु - ये दस संतानें हुई I सूर्य की 12 शक्तियां, कही जाती हैं I
ब्रह्माजी के पुत्र का नाम मरीचि है I मरीचि से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ I महर्षि कश्यप सूर्यदेव के पिता और माता अदिति हैं I
सभी ग्रह, नक्षत्र, योग, राशियों, करण, आदित्यगण, वसुगण, रूद्र, अश्विनी कुमार, वायु, अग्नि, शक्र, प्रजापति, समस्त लोकों, पर्वतों, नाग, नदियों, समुद्र तथा समस्त भूतों के समुदाय के हेतु सूर्य देव ही हैं I ये ही कालचक्र के प्रणेता हैं, समस्त संसार के प्रकाशक हैं, जीवन, तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, श्रोत्र आत्मा और मन भी ये ही हैं I
नाग
नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू से हुई I वेदों एवं पुराणों में साक्ष्य मिलते हैं I इनका निवास पटल में है जिसे नागलोक भी कहा जाता है I अदिति के पुत्र आदित्यों के सौतेले भाई होने के नाते ये भी देवताओं की श्रेणी में आते हैं I
भगवान विष्णु की शैय्या नागराज अनंत की है I भगवन शंकर और गणेश जी पर भी सर्प शोभायमान है I भगवान सूर्य के रथ में बारह महीनों बारह नाग  बदल- बदल कर रथ का भर उठाते हैं I इस प्रकार देवताओं नें नागों को धारण किया हुआ है I
कश्मीर की सम्पूर्ण भूमि 'नीलनाग' की ही देन है I 'अनंतनाग' शहर का नाम इसकी पुष्टि करता है I अनंत, वासुकी, शेष, पदमनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिय ये 9 नाग देवता हैं, इनका दोनों समय प्रतिदिन स्मरण करने से नाग विषय भय नहीं रहता और सदा विजयश्री प्राप्त होती है I
ऋषि- मुनियों नें नागोपासना, व्रत, पूजा आदि के साथ- साथ प्रत्येक नगर व ग्राम में नाग का स्थान रखने का विधान किया है I श्रावण मास में पंचमी के दिन नाग की पूजा और व्रत किया जाता है I
संध्यावंदन के बाद नागों को नमस्कार करने की परम्परा है इईसा माना जाता है कि समस्त प्राणियों में कुण्डलिनी शक्ति सर्पिनी का ही स्वरुप है I सोते समय इनके स्मरण मात्र से ही घर में सर्प, उपसर्प नहीं आते I आस्तिक मुनि से वचनबद्धता के कारण नागदेवता चारपाई पर नहीं चढ़ते और उनके मन्त्र के उच्चारण से सर्प विष उतर जाता है I इसीलिए पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी नागों कि पूजा विशेष रूप से की जाती है I
वायु देवता
वायु देवता की उत्पत्ति विराट पुरुष के प्राण से हुई है I प्राणियों में जो प्राण है, उसके अधिष्ठातृ देवता वायु ही है I शरीर के पांचों प्राणों में देव भाव वायु देवता से ही प्राप्त होता है I वेद में बताया है कि वायु देवता में अमरता की विधि स्थापित है I आधिभौतिक दृष्टि से विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि सांस द्वारा वायु को ग्रहण न किया जाए तो मृत्यु निश्चित है I वायु देवता बल के अंशी हैं I संसार में जितने बल हैं, सबका केन्द्र ये ही हैं I महाभारत में कहा गया है कि वायु के समान किसी का बल नहीं है I इंद्र, अग्नि, यम, कुबेर तथा वरुण आदि देवता बल में वायु की क्षमता नहीं कर सकते हैं I उनके पुत्र हनुमान और भीम हैं I
इंद्र
महर्षि कश्यप कि पत्नी अदिति से इंद्र का जन्म हुआ था I ये भू: भुव: तथा स्व: इन तीनों लोकों के अधिपति हैं I इनकी पत्नी का नाम शचि है I इनके पुत्र का नाम जयंत तथा पुत्री का जयंती है I राहु के उपराग से सूर्य प्रकाशहीन हो जाते हैं तब देवराज इंद्र इस असुर को पराजित कर सूर्य को प्रकाशयुक्त कर देते हैं I सूर्य के न रहने पर ये सूर्य बनकर जगत को प्रकाशित करते हैं I इसी प्रकार आवश्यकता पड़ने पर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु बनकर विश्व कि स्थिति बनाए रखते हैं I सन्तुष्ट हो जाने पर इंद्र समस्त प्राणियों को बल, तेज, सन्तान और सुख प्रदान करते हैं I ये दुराचारियों को दण्ड देते और सदाचारियों कि रक्षा करते हैं I मित्र (सूर्य) के नेत्रों से ही देखते हैं I
यमराज      
विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से सूर्य के पुत्र यमराज जी, श्राद्ध देव मनु और यमुनाजी हुई I यमराज परम भागवत, द्वादश भगवताचार्यों में है I ये जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं I दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनी समस्त प्राणियों के लिए जो अशुभकर्मा है, बड़ी भयप्रद है I यम, धर्मराज, मृत्यु आतंक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दग्ध, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त इन चतुर्दश नामों से इन महिषवान दण्ड धर की आराधना होती है I यम देवता की आंखें लाल हैं इनके साथ पाश रहता है I शरीर वर्ण नीला है, भैंसा इनकी सवारी है I
आकाश देवता
आकाश की गणना पंचभूतों में से सबसे प्रथम है I गृह निर्माण के समय गृह के बाहरी भाग में आकाश देवता की पूजा होती है I भगवान शंकर की आठ मूर्तियों में इनकी गणना है I वायु की उत्पत्ति का कारण भूत आकाश सप्तस्वरुपमय नाद ब्रह्मा से व्याप्त है I जहां आकाश एक रूप से मूर्तिमान देवता के रूप में अपने उपासकों का कल्याण करते हैं, वहीँ दूसरे रूप से सर्वत्र व्याप्त रहकर सम्पूर्ण ब्रह्मन तथा समस्त प्राणियों के जीवन के प्राण रूप में स्थित रहते हैं I अतः ये परमात्मा के ही रूप हैं I
वेदांत ग्रंथों में प्राय: सर्वत्र घटाकाश, मढाकाश, महाकाश- ये आकाश के तीन भेद बतलागे गए हैं I
आकाश देवता पंच लोकपालों में आते हैं I श्रुति ने बतलाया है कि आकाश की उत्पत्ति विराट पुरुष की नाभि से हुई है I
अग्नि देवता
अग्नि देवता कि गणना पंचभूतों में की जाती है I भगवान के मुख से अग्नि देवता कि उत्पत्ति हुई है I अग्नि देवता ब्रह्माण्ड में व्याप्त है I अग्नि देवता से ऋग्वेद का आविर्भाव हुआ है I (मनुस्मृति) अग्नि पुराण भी इनकी ही देन है I अग्नि देवता का वर्ण लाल है I इनके भौं, इनके केश तथा नेत्र रक्त- पीत मिश्रित वर्ण के हैं I अग्नि देवता कि पत्नी का नाम स्वाहा है I अग्नि देवता भिन्न- भिन्न रूप से स्थिर रहते हैं I पार्थिव अग्नि के रूप में ये काष्ठ के इंधन से, मध्य अग्नि के रूप में जल के इंधन से और उत्तम अग्नि के रूप में जलाघात रूप (गैस) से उत्पन्न होते हैं I अग्नि देवता प्रत्येक जीव में अनुस्युत है I जो इन्हें उच्च हव्य या भोजन पदार्थ का भोग प्रदान करता है उस पर इनकी अपार कृपा दृष्टि रहती है I
अष्टवसु गण
आठ देवताओं का एक विशिष्ट गण विशेष है, जिसे 'अष्टवसु' कहा जाता है I
पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति नें अपनी साठ कन्याओं में से दस का विवाह धर्म के साथ किया I उनमें से 'वसु' से उत्पन्न होने के कारण ये 'वसु' कहलाये I ये संख्या में आठ है I श्रीमद्भागवत में इनके नाम इस प्रकार है - द्रोण, प्राण, ध्रव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु तथा विभा वसु I
विष्णु पुराण के अनुसार इनके नाम इस प्रकार है : आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्युष तथा प्रभास I
श्रीमद्भागवत में उल्लेख आया है कि सभी प्रकार के एश्वर्यादि   की प्राप्ति के लिए भी वसु देवताओं की उपासना की जाती है I स्मृतियों तथा कहीं- कहीं पुराणादि में वसुओं को पितृस्वरुप भी बतलाया गया और श्राद्धादि कर्म में तर्पण तथा पिण्डादि दान से इनकी पूजा कर पितरों के रूप में इन्हें आप्यायित किया जाता है I
वसुगण पितरों के अधिष्ठातृ देवता हैं - वसुगण धर्म के पुत्र होने के कारण साक्षात् धर्म स्वरुप ही है I
गन्धर्व
देवताओं कि एक जाति का नाम गन्धर्व है I दक्ष सुता प्राधा ने प्रजापति कश्यप के द्वारा दस देव गन्धर्वों को उत्पन्न किया था- उनके नाम हैं- सिद्ध, पूर्ण, वरही, पूर्णायु, ब्रह्मचारी, रतिगुण, सुपर्ण, विश्वावसु, भानु और सुचंद्र I गन्धर्वों में हा हा, हू हू और तुम्बुरु बहुत प्रसिद्ध हुए हैं, ये भी प्राधा के ही पुत्र हैं I कश्यप की अन्य पत्नी अरिष्टा से कुछ गन्धर्व उत्पन्न हुए I इनमें विश्वावसु गन्धर्वों के राजा हुए हैं I ऋग्वेद में इन्हें दिव्य गन्धर्व कहा गया है I
गन्धर्वों का पृथक एक लोक है, जहां ये मुख्य रूप से निवास करते हैं I ये धर्म का आचरण करते हैं, देवताओं के गायक, कत्थक और स्तुति पाठक होते हैं I ये निरंतर गीत में तल्लीन रहते हैं और इनका चित्त नाट्यशास्त्र के श्रम साध्य सुरों में ही लगा रहता है I देवर्षि नारद ने गन्धर्वों से संगीत सीखा था तथा इस विद्या के प्रभाव से वैष्णव लोक में महामान्य हुए और भगवान शंकर के बहुत प्रिय हो गये I तुम्बरू और नारद की महामान्यता का कारण यही नाद तत्त्व है क्योंकि शिव ही साक्षात् नाद स्वरुप  है I
गन्धर्व शब्द की व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'गम' अर्थात संगीत रूप वाणी को 'धर्व' अर्थात धारण करने वाला I
पूषा
ये पशुओं के अधिष्ठाता, दण्डहस्त, बकरे पर आरूढ़ तथा इन्द्रजाल क्रियाओं के मुख्य देवता हैं I द्वादश आदित्यों में ये भी एक आदित्य है I सूर्य मण्डल में स्थित होकर निश्चितकाल में ये जगत का परिदर्शन करते हैं और पशु सम्पत्ति की अभिवृद्धि करते हैं I दक्षयज्ञ में वीरभद्र ने इनके दांत गिरा दिए थे क्योंकि ब्रह्मसभा में इन्होंने भगवन शंकर को दांत दिखाकर हंसते हुए अपमान किया था I इनको यज्ञ में चावल का चूर्ण दिया जाता है I वीरभद्र ने इन्हें नेत्रहीन कर दिया इसलिए ये सूर्य के नेत्रों से ही देखते हैं I

वास्तु एवं उर्जा

वास्तुशास्त्र में अनेक सकारात्मक ऊर्जा स्त्रोतों का वर्णन किय गया है, उनमें से एक शक्तिशाली ऊर्जा का स्त्रोत है, 'आभामंडल' (Aura) I जिसे 'तेज' के नाम से भी जाना जाता है I
संसार में प्रत्येक सजीव, निर्जीव एवं चल- अचल वस्तुओं एवं जीव- जंतुओं का भी एक आभामंडल होता है, जोकि उस वस्तु की सकारात्मकता एवं नकारात्मकता की मात्रा एवं तीव्रता दर्शाता है I प्राचीन समय में साधु- संत, महात्मा एवं ऋषि- मुनि आदि इस 'ओरा' को साधारण आँखों एवं अपनी छठी इन्द्रिय शक्ति से पहचान लेते थे, परन्तु वर्तमान समय में कुछ वास्तुशास्त्री इसी आभामंडल को स्कैन करने एवं देखने के लिए कम्प्युटराइज्ड एनर्जी प्रेजेंटर का प्रयोग करते हैं I
इस टेक्नीकल डिवाइस के द्वारा लिए गए भिन्न- भिन्न आभामंडल दर्शाते हैं कि यदि हम अपने एवं अपने भवन में कुछ छोटे- मोटे निम्नलिखित प्रयोग करते हैं, तो 'ओरा' में बड़ी आसानी से सकारात्मकता को बढाया जा सकता है I
यदि किसी भी परिवार में सभी सदस्य ब्रह्ममुहूर्त में उठकर योग, प्राणायाम, पूजा- पाठ, मंत्रोच्चारण करते हैं, तो सभी सदस्यों के 'ओरा' में सकारात्मकता बढ़ जाती है, जिससे सभी का आचार- विचार सकारात्मक होता है I
वास्तुशास्त्र के अनुसार यदि किसी भी भवन कि सम्पूर्ण पूर्व, उत्तर एवं पूर्वोत्तर कि दिशाओं में तुलसी के पौधे उगाए जाएं, तो उस भवन में ज्यादातर वास्तुदोषों का निवारण हो जाता है, क्योंकि इससे इन दिशाओं में एक शक्तिशाली पाजिटिव एनर्जी फील्ड बनता है, जो कि भवन को सकारात्मक बनाता है I  
वास्तु के अनुसार किसी भवन की सम्पूर्ण पूर्व एवं उत्तर दिशाओं से सकारात्मक ऊर्जाओं का प्रवाह होता है, जो कि क्रमश: पश्चिम एवं दक्षिण दिशाओं की ओर चलती है, अतः यदि किसी भी भवन में पूर्वोत्तर दिशा में पूजा स्थान बनाया जाए, तो इस सम्पूर्ण भवन के आभामंडल में सकारात्मक रंगों कि वृद्धि होती है एवं उसमें रहने वाले परिवार को हर प्रकार कि सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है I
यदि किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान या व्यवसाय में तरक्की नहीं हो पा रही हो या घर में पैसे की बरकत नहीं होती हो, तो इसका एक कारण भवन की उत्तर दिशा में नकारात्मक आभामण्डल भी हो सकता है, जिसे ठीक करने के लिए आप भवन की उत्तर दिशा में पानी का एक छोटा फव्वारा या फिश एक्वेरियम रखें, जिसे उत्तर दिशा का एनर्जी बूस्टर भी कहते हैं I इससे भवन की उत्तर दिशा का आभामण्डल सकारात्मक हो जाएगा एवं आपको धन की बरकत एवं व्यवसाय में लाभ मिलेगा I
जिन भवनों में पूर्व, पूर्वोत्तर, दक्षिण- पूर्व में कोई टायलेट, गन्दा पानी, कूड़ा- कबाड़ आदि रहते हैं, तो ऐसे भवन में पूर्व दिशा का आभामण्डल दूषित हो जाता है, जिससे संसार का सुख एवं विद्या की प्राप्ति के सभी रास्ते बंद हो सकते हैं I इसको ठीक करने के लिए सुबह के समय पूर्व की दिशा के दालान एवं ऐसे ही खुले स्थान को भली- भाँति धोएँ एवं शाम को भी यहाँ पानी का थोडा छिडकाव करें I वास्तुशास्त्र में वर्णित वाटर थैरेपी का यह एक अदभुत प्रयोग है, जो कि तीव्र गति से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि करता है I

वास्तु एवं राशि

मेष
मेष राशि का स्वामी मंगल ग्रह है I इस राशि वाले साहसी, उग्र एवं चंचल स्वभाव के होते हैं I इनके लिए रेड, येलो, पिंक व आरेंज कलर्स शुभ माने जाते हैं I अपने घर कि सजावट के लिए अगर ये इन्हीं रंगों के बेड कवर, चादर व परदे आदि का इस्तेमाल करेंगे, तो इनके घर में शांति व खुशहाली बनी रहेगी I इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि कमरे के दक्षिण- पश्चिम (नैऋत्य) दिशा के कोने में कोई भारी समान न रखें I तरक्की के लिए पूर्व दिशा को साफ- सुथरा रखें व सूर्य का प्रतीक चिन्ह लगाकर घर को उर्जावान बनाएं I
वृष
शुक्र इस राशि का स्वामी ग्रह है I स्वभाव से इस राशि के लोग शांत व वस्त्र- आभूषण में रूचि रखने वाले होते हैं I इनके लिए ब्लू और व्हाइट कलर्स शुभ माने जाते हैं I होम डेकोर में ब्राइट कलर्स का इस्तेमाल करें I ये आपके लिए लकी होंगे I इन्हीं रंगों के सोफा कवर या पिलो कवर इस्तेमाल करें I घर कि दीवारों को येलो, क्रीम या व्हाइट कलर से पेंट करने पर घर में सकारात्मक उर्जा बनी रहती है I इस राशि के लिए नैऋत्य दिशा में भारी वजन के फर्नीचर रखना शुभ माना जाता है और इससे आकस्मिक दुर्घटनाओं से भी बचा जा सकता है I
मिथुन
बुध ग्रह इस राशि का स्वामी है I मिथुन राशि के लोग स्वभाव से बुद्धिमान, वाकपटु, आत्मकेंद्रित व कठोर हृदय होते हैं I इन्हें अपने घरों में लाइट ग्रीन, लाइट ब्लू, आरेंज और रेड कलर्स का इस्तेमेल करना चाहिए क्योंकि ये इनके शुभ रंग हैं I अपने पहनावे में भी इन्हें ज्यादातर इन्हीं रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए I जहां एक ओर उत्तर- पश्चिम (वायव्य) दिशा में हल्का सामान या फर्नीचर रखने से इनके घर में हमेशा सुख- समृद्धि बनी रहती है, वहीं इस दिशा के दूषित होने से दोस्त भी दुश्मन बन जाते हैं I
कर्क
इस राशि वाले के लिए व्हाइट, सिल्वर और क्रीम कलर्स शुभ होते हैं , क्योंकि ये चन्द्रमा के जैसे सफ़ेद होते हैं और चन्द्रमा इस राशि का स्वामी ग्रह है I स्वभाव से ये लोग भावुक, सौम्य, कल्पनाशील व रिश्तों के प्रति ईमानदार होते हैं I जल तत्व प्रधान होने के कारण इस राशि वालों को अपने कमरे के उत्तर- पूर्व (ईशान) दिशा के कोने में पानी का घड़ा या बहते हुए पानी का चित्र अवश्य रखना चाहिए I
सिंह
इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य है I इस राशि में जन्मे लोग स्वभाव से परिश्रमी, महत्वकांक्षी, उग्र व थोड़े से अहंकारी होते हैं I व्हाइट, सिल्वर और गोल्डन येलो इनके लिए लकी कलर्स हैं I परदे, चादर आदि में इन कलर्स का इस्तेमाल करने से इनके घर में सुख- समृद्धि बनी रहेगी I इनके लिए घर के कोने बहुत महत्वपूर्ण होते हैं I अग्नि तत्व प्रधान होने के कारण इस राशि वालों को घर के दक्षिण- पूर्व (आग्नेय) दिशा में रसोईघर बनानी चाहिए I ऐसा करने से आग से जुडी दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है I लेकिन ध्यान रखें कि इस दिशा के दूषित रहने से घर का कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार ही रहता है I
कन्या
इस राशि का स्वामी ग्रह बुध है और इनके मूल गुण लगभग मिथुन राशि से मेल खाते हैं I स्वभाव से कन्या राशि के लोग सौम्य, निरंतर क्रियाशील, आलोचक व दोहरे व्यक्तित्व के होते हैं I इस राशि वालों के लिए लाइट ग्रीन, लाइट ब्लू, पिंक, क्रीम और आरेंज कलर्स शुभ माने जाते हैं I इनके कमरे के नैऋत्य दिशा के कोने में वजनदार फर्नीचर या सामान रखने से व अपने पूर्वजों के चित्र लगाने से इनके घर में खुशहाली का माहौल बना रहता है I घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाने से ये कई बीमारियों से बच सकते हैं I
तुला
शुक्र इस राशि का स्वामी ग्रह है I तुला राशि वालों का स्वभाव मास्टर माइंड, खोजी व अहंकारी होता है I इनके लिए क्रीम, व्हाइट, लाइट येलो, पिंक व लाइट ब्लू कलर्स शुभ माने जाते हैं I खासकर चमकदार रंग, जिसमें कांट्रास्ट मैच हो, इनके लिए अच्छा होता है I इन्हें अपने घर में इन रंगों के परदे, सोफा कवर या पिलो कवर का इस्तेमाल करना चाहिए I इस राशि वालों के लिए उत्तर- पश्चिम (वायव्य) का कोना शुभ होता है I वहां ये हल्के वजन के सामान या सजावट कि वस्तुएं रख सकते हैं, ताकि इनके जीवन में किसी प्रकार कि चिंता या कलह न हो I घर के उत्तर- पश्चिम (वायव्य) कोण को साफ़- सुथरा और रंगीन फूलों से सजाने से इन्हें अच्छा स्वास्थ्य एवं लम्बी उम्र मिलती है I
वृश्चिक
इस राशि का स्वामी ग्रह मंगल है I इस राशि वाले स्वभाव से निडर, समीक्षक, प्रकृति प्रेमी, शांत, परन्तु छेड़े जाने पर प्रतिशोध कि भावना रखने वाले होते हैं I इनके लिए रेड, पिंक, क्रीम, लाइट येलो और आरेंज कलर्स शुभ माने जाते हैं I ये दीवारों को अगर हल्के पीले रंग से रंगें, तो बुद्धिमता बढ़ती है I इस राशि के लोगों को अधिक से अधिक इन्हीं रंगों के कपडे, गहने आदि का इस्तेमाल करना चाहिए I अगर महिलाएं इन रंगों कि बिंदी लगाएं, तो उनके सुहाग के लिए यह शुभ माना जाता है I अपने घर के ईशान दिशा में पानी कि व्यवस्था इनके लिए काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है I अगर चाहें, तो चांदी के घड़े में पानी भरकर मोती कि माला से सजाकर रख सकते हैं I इससे इनकी संतान को शिक्षा, कामयाबी और समृद्धि मिलेगी I इस दिशा को हमेशा साफ़- सुथरा रखकर पूजा करने से इनके जीवन में सुख व शांति बनी रहती है I
धनु
धनु राशि का स्वामी ग्रह बृहस्पति यानी गुरु है I धनु राशि वाले बुद्धिमान, तर्क- वितर्क करनेवाले, अध्ययनप्रिय, लक्ष्य प्राप्ति में लीन, परन्तु संवेदनहीन होते हैं I इनके लिए येलो कलर शुभ माना जाता है I पहनावे और घर कि सजावट में पीले रंग का इस्तेमाल इनके लिए शुभ होता है I इसके आलावा घर कि सजावट में आरेंज व रेड कलर्स को शामिल करने से परिवार में प्रेम व विश्वास बना रहता है I इस राशि का प्रधान तत्व अग्नि है I इन्हें हमेशा आग या अन्य ज्वलनशील पदार्थों को अपने घर के आग्नेय दिशा में रखना चाहिए I इस दिशा में अगर रोज मिट्टी का दीया जलाएं, तो यह परिवार में सुख और समृद्धि लाता है I  
मकर
शनि इस राशि का स्वामी ग्रह है I मकर राशि वाले स्वभाव से सरल, सौम्य, परोपकारी, प्रशासक व कठोर परिश्रम करने वाले होते है I इनके लिए डार्क ब्लू, डार्क ग्रीन, ब्लैक व ब्राउन कलर्स का इस्तेमाल शुभ माना जाता है I इन रंगों के चादर, सोफा- कवर व परदे आदि के प्रयोग से इन्हें जीवन में सफलता मिलती है I घर के दक्षिण कोने में भारी फर्नीचर या सामान व वायलेट कलर के इस्तेमाल से वैभव कि प्राप्ति होती है I पहनावे में लाइट ब्लू कलर से जहां दया भाव रहता है I वहीँ लाइट आरेंज के प्रयोग से कार्यशैली में तीव्रता आती है I
कुंभ
मकर राशि की ही तरह कुंभ राशि का स्वामी ग्रह शनि है I स्वभाव से कुंभ राशि के लोग संवेदनशील व मेहनती होते हैं I डार्क ब्लू, डार्क ग्रीन, ब्लैक व ब्राउन कलर इस राशि वालों के लिए शुभ है I अपने कमरे की दीवारों व सजावट की वस्तुओं के लिए इन रंगों का प्रयोग इनके लिए हितकारी साबित होता है और इससे इनको सफलता भी मिलती है I घर के हल्के सामान या वस्तुएं हमेशा उत्तर- पश्चिम (वायव्य) दिशा में रखना फायदेमंद साबित हो सकता है I इस दिशा को लाइट ब्लू, येलो व वायलेट कलर्स के फूलों से सजाना चाहिए I यह कोना गेस्ट रूम के लिए परफेक्ट रहता है I
मीन
धनु राशि के समान मीन राशि का स्वामी ग्रह बृहस्पति यानी गुरु है I मीन राशि के लोग स्वभाव से सौम्य, सज्जन व कल्पनाप्रिय होते हैं I येलो, क्रीम व गोल्डेन कलर्स इस राशिवालों के शुभ माने जाते है I इन्हें अपने पहनावे और घर की सजावट में अधिक से अधिक येलो कलर का इस्तेमाल करना चाहिए I इस राशि का प्रधान तत्व जल होने के कारण इन्हें अपने कमरे के ईशान दिशा के कोने में पानी भरकर रखना चाहिए या फिर बहते हुए पानी की पेंटिंग लगा सकते हैं, जो समृद्धि का द्योतक है I इससे इनके घर में सुख- शांति बनी रहती है I

वास्तु एवं मुख्यद्वार

कोई भी भवन या इसका नक्शा बनवाते हुए सर्वप्रथम मुख्य द्वार निर्धारित किया जाता है I वास्तु के अनुसार प्रत्येक दिशा के भवनों के लिए कुछ शुभ अथवा अशुभ दिशाएं निर्धारित की गयी हैं I 

उच्च कोटि के मुख्य द्वार

  • भूखंड के उत्तरी ईशान कोण में बनाया गया मुख्य द्वार उच्च कोटि का होता है I इससे भवन के स्वामी को अनेक प्रकार से लाभ पहुंचता है I इससे दक्षिण- पश्चिम भारी हो जाएगा एवं पूर्व- उत्तर हल्का हो जाएगा I वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम के अनुसार मकान अत्यन्त शुभ फलदायी हो जाएगा I
  • प्लाट या भूखंड के पूर्वी- ईशान कोण में बनाया गया मुख्य द्वार भी उच्च कोटि का होता है I इस भवन में निवास करने वाले अत्यन्त बुद्धिमान, ज्ञानवान, समय और धन का सदुपयोग करके अपने जीवन को सफल बनाने वाले होते हैं I
  • प्लाट के दक्षिणी- आग्नेय कोण में बनाया गया मुख्य द्वार भी शुभ कहा गया है I वास्तु के अन्य सभी नियमों का पालन करने पर यह दिशा शुभ फल प्रदान करके कार्यों में शीघ्र सफलता प्रदान करती है I
  • भूखंड के पश्चिमी- वायव्य कोण में बनाया गया मुख्य द्वार भी उच्च कोटि की श्रेणी में आता है I यदि प्लाट की चारदीवारी का मुख्य द्वार पश्चिम में है तो यह मुख्य द्वार इस प्रकार से बनवाया जाना चाहिए की यह उत्तर दिशा की तरफ आयें और उत्तरी दीवार के साथ का हिस्सा खाली रखें ताकि धन- धान्य और समृद्धि की वृद्धि हो I यदि आपके प्लाट का मुख्य द्वार दक्षिण में है तो इसे पूर्व दिशा की दीवार की तरफ रखें और पूर्वी दीवार के साथ के हिस्से को खाली और खुला रखें ताकि यह मकान शुभ रहें I
  • घर में द्वार बनवाते समय ध्यान रखें की द्वार की चौखटें दीवार से सटी हुई न होँ I दीवार और चौखट के बीच में कम से कम चार इंच का अंतर हो I
  • लगाये गए दरवाजे हमेशा दो पल्लों वाले होँ एवं अन्दर की ओर खुलने चाहिए I घर के अन्दर द्वार, खिड़कियाँ एवं अलमारियां एक- दूसरे के सामने बनवाएं I
  •  जिस मकान में बहुत से मुख्य द्वार एवं खिड़कियाँ होँ वहां द्वार का कोई नियम नहीं होता अर्थात जिस तरफ चाहें उस तरफ दरवाजे लगवा सकते हैं I
  • यदि घर का मुख्य द्वार पश्चिम में हो तो पूर्व में एक द्वार लगाने से इसका दोष दूर हो जाता है और यदि मुख्य द्वार दक्षिण में हो तो उत्तर की तरफ एक दरवाजा लगाने से दोष दूर हो जाता है I
  •  दरवाजे अपने आप खुल जाएं या बंद हो जाएं तो भय दायक होता है I
  • चौखटों का छोटा- बड़ा होना भी अशुभ माना जाता है I
  • दरवाजों को खोलते बंद करते वक्त आवाज नहीं आनी चाहिए I
  • मुख्य द्वार के सामने बड़े पेड़ का होना द्वारवेध नाम का दोष उत्पन्न करता है I यह बच्चों के लिए दोषकारक होता है I
  • मुख्य द्वार के समक्ष कोई बड़ा गड्ढा या कुआं होना भी गृहस्वामी के लिए अशुभ होता है I
  •  मुख्य द्वार के सामने किसी देवता का मंदिर होना भी द्वारवेध होता है इससे गृहस्वामी विनाश की ओर अग्रसर होता है I
  • यदि रास्ता सीधा मुख्य द्वार पर आकार समाप्त होता है तो यह दोष गृहस्वामी को अवनति की ओर ले जाता है I
  • मुख्यद्वार के सामने गंदे पानी का बहाव या कीचड़ का बने रहना भी धन का अपव्यय एवं शोककारक होता है I

वास्तु एवं पूजाघर

  • पूर्व, ईशान एवं उत्तर दिशा की तरफ पूजाघर बनवाना चाहिए I
  • पूजाघर को सदैव शुद्ध, स्वच्छ एवं पवित्र रखें I
  • पूजाघर में कभी भी धन एवं बहुमूल्य वस्तुएं नहीं छिपानी चाहिए I
  • पूजाघर का फर्श सफ़ेद अथवा हल्के पीले रंग का होना चाहिए I
  • पूजाघर की दीवारों का रंग सफ़ेद, हल्का पीला, केसरिया अथवा हल्का नीला होना चाहिए I
  • पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लायी गयी प्रतिमा एवं स्थिर प्रतिमा की स्थापन नहीं करनी चाहिए I
  • पूजाघर में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, सूर्य एवं कार्तिकेय का मुख पूर्व अथवा पश्चिम की तरफ होना चाहिए I
  • पूजाघर में गणेश, कुबेर एवं दुर्गा जी का मुख दक्षिण की ओर होना चाहिए I
  • धन प्राप्ति के लिए पूजा उत्तर की तरफ मुख करके एवं ज्ञान की प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर मुख करके करनी चाहिए I
  • पूजाघर में हनुमान जी का मुख नैर्ऋत्य एवं दक्षिण की तरफ होना चाहिए I
  • पूजाघर कभी भी शयनकक्ष में नहीं होना चाहिए, यदि मज़बूरी में रखना पड़े तो रात्रि समय में उसे ढ़ककर रखना चाहिए I
  • निवास स्थान के पूजाघर में प्रतिमाएं सवा फुट से कम की होनी चाहियें I
  • पूजाघर को साफ करने का पौंचा अथवा झाड़ू अलग से होना चाहिए I

वास्तु एवं रसोईघर

  • भवन में रसोईघर का निर्माण आधे पूर्व से लेकर आधे दक्षिण के बीच में आग्नेय कोण में करवाना चाहिए I
  • ईशानकोण में चूल्हा रखा जाना वर्जित है इससे धन हानि एवं सन्तान हानि होती है I
  • चूल्हा सदैव आग्नेय कोण की तरफ ही रखें I
  • रसोई के आग्नेय कोण में जल कदापि न रखें I
  • उत्तर दिशा में चूल्हा रखने से अर्थ हानि होती है I
  • रसोईघर में खाली एवं अतिरिक्त गैस सिलेंडर आदि नैर्ऋत्य कोण में रखे जाने चाहियें I
  • रसोईघर में भारी समान, बर्तन आदि दक्षिण दीवार की ओर रखें I
  • भवन के मुख्यद्वार से रसोईघर का चूल्हा, गैस, बर्नर आदि नहीं दिखाई देना चाहिए I
  • रसोईघर में रैक्स आदि समान रखने के स्थान दक्षिण एवं पश्चिम दीवारों पर ही बनाए जाने चाहियें I
  • यदि डाइनिंग की व्यवस्था रसोईघर के साथ ही करनी है तो इसे पश्चिम दिशा की तरफ बनवाना चाहिए I
  • रसोई में अनाज, मसाले आदि रखने के स्थान उत्तर पश्चिम के मध्य में बनवाने चाहियें I इस वायव्य कोण में अन्न आदि रखने से घर आदि का अभाव नहीं रहता I
  • रसोई घर में माइक्रोवेव ओवन, मिक्सर ग्राइन्डर, जूसर आदि दक्षिण दीवार के समीप रखे जाने चाहियें I
  • रसोई घर में पीने का पानी ईशान कोण में अथवा उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए I

भोजनकक्ष और वास्तु

  • भोजन कक्ष को भवन के पश्चिम दिशा में बनया जाना चाहिए I इस दिशा में भोजन करने से असीम सुख, शांति एवं संतोष की प्राप्ति होती है I
  • यदि भोजन कक्ष पश्चिम दिशा के अतिरिक्त किसी अन्य दिशा में बना हुआ है तो उस कक्ष में पश्चिम की ओर बैठकर पूर्व की ओर मुह करके भोजन करना चाहिए I
  • यदि भोजन कक्ष रसोईघर के साथ बनवाना हो तो इसे पश्चिम दिशा की तरफ बनवाया जा सकता है I

वास्तु और शयनकक्ष

  • बच्चों, अविवाहितों एवं मेहमानों के लिए पूर्व दिशा में बेडरूम होना चाहिए I
  • गृहस्वामी का शयनकक्ष दक्षिण- पश्चिम कोण में अथवा पश्चिम दिशा में होना चाहिए I इस कोण में पृथ्वी तत्व अर्थात स्थिरता का वास है अतः इस स्थान पर शयन कक्ष बनवावे से लम्बे समय तक निवास होता है I
  • शयनकक्ष में पलंग इस प्रकार से हो की उस पर सोने से सिर पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा की तरफ रहे ईस तरह सोने से सुबह उठने पर मुख पूर्व की तरफ अथवा उत्तर दिशा की तरफ रहेगा क्योंकि पूर्व दिशा सूर्योदय की एवं उत्तर दिशा धनपति कुबेर की मानी गयी है I
  • यदि गृहस्वामी का कार्य क्षेत्र अधिकतर घर से बाहर है तो शयनकक्ष वायव्य कोण में होना चाहिए I
  • उत्तर दिशा की तरफ सिर करके कभी भी नहीं सोना चाहिए I
  • शयनकक्ष का द्वार एक पल्ले का होना चाहिए I
  • यदि भवन में एक से अधिक मंजिलें होँ तो गृहस्वामी का शयनकक्ष ऊपर की मंजिल में होना चाहिए I
  • सोते समय पैर मुख्य द्वार की तरफ नहीं होने चाहियें I
  • ईशान कोण में छोटे बच्चों के शयनकक्ष का निर्माण कर सकते हैं बड़ों का नहीं I
  • जहां तक संभव हो तिजोरी शयनकक्ष में न रखें I यदि रखनी ही पड़े तो शयनकक्ष के दक्षिणी भाग में इस तरीके से रखें की खोलने पर उत्तर की तरफ दृष्टि पड़ें I
  • शयनकक्ष में पलंग के ठीक ऊपर छत में कोई शहतीर या बीम नहीं होना चाहिए I यदि ऐसा है तो इस पर फाल्स सीलिंग करवा लें I
  • घडी पूर्व या उत्तर की दीवारों पर ही लगवाएं I
  • शयनकक्ष में टेलीविजन, हीटर एवं अन्य विद्युत् उपकरण कक्ष के आग्नेय कोण में होने चाहियें I
  • ड्रेसिंग टेबल उत्तर दिशा में पूर्व की ओर रखी जानी चाहिए I ड्रेसिंग टेबल को पश्चिम दिशा में भी रखा जा सकता है I

वास्तु एवं ड्राइंग रूम

ड्राइंग रूम को हिन्दी में स्वागत कक्ष कहा जाता है I घर छोटा अथवा बड़ा हो स्वागत कक्ष जरुर बनाया जाता है I ड्राइंग रूम की व्यवस्था पूर्व, उत्तर एवं वायव्य दिशा में श्रेष्ठ मानी जाती है I इसको बैठक भी बोला जाता है और यह घर का महत्वपूर्ण हिस्सा है I वास्तु के अनुसार इसके निर्माण में इन नियमों का पालन करना चाहिए I

  • इस कक्ष में बैठने की व्यवस्था इस प्राकार से होनी चाहिए की घर के मुखिया का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर हो और मेहमान का मुख पश्चिम अथवा दक्षिण की तरफ हो I
  • ड्राइंग रूम में रखा जाने वाला फर्नीचर वर्गाकार अथवा आयताकार ही होना चाहिए I कक्ष में फर्नीचर आदि पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए I
  • मज़बूरी वश यदि फर्नीचर को पूर्व अथवा उत्तर दिशा में रखना पड़े तो यह वजन में हल्का एवं लाईट कलर का होना चाहिए I साथ ही फर्श और फर्नीचर के बीच में स्टैंड आदि लगाकर उसे थोडा उंचा रखना चाहिए I
  • ड्राइंग रूम में झाड़- फानूस (झूमर) आदि बिल्कुल सेंटर में न लगाकर थोडा पश्चिम या दक्षिण की ओर लगाना चाहिए I
  • ड्राइंग रूम में यदि टेडी बिअर आदि कम वजन की वस्तुएं हल्के पदार्थों से बने जानवर आदि रखने होँ तो इसे वायव्य (नोर्थ-वेस्ट) कोण में रखने चाहियें I
  • ड्राइंग रूम में यदि दीवान रखना हो तो वह पश्चिम अथवा दक्षिणी दीवार के साथ रखें एवं इसमें लेटते समय सिर दक्षिण अथवा पश्चिम की ओर हो I
  • ड्राइंग रूम का दरवाज़ा ईशान कोण में हो तो श्रेष्ठ, नहीं तो इस कोने को खाली रखना चाहिए I
  • ड्राइंग रूम में पशु- पक्षियों के चित्र, स्त्रियों के चित्र, रोते हुए बच्चों के चित्र एवं युद्ध के चित्र नहीं लगाने चाहियें I
  • घडियां दक्षिण की ओर न लगाएं I
  • टीवी आदि मनोरंजन के समस्त साधन आग्नेय कोण, पश्चिम अथवा वायव्य कोण में रखने चाहियें I
  • ड्राइंग रूम में ए.सी. एवं रूम हीटर आदि बिजली के उपकरण आग्नेय कोण में रखने चाहियें I
  • टेलीफोन, मोबाईल आदि वायव्य एवं पश्चिम दिशा में रखने शुभ होते हैं I
  • ड्राइंग रूम में भारी अलमारी, बुक- शेल्फ, भारी मूर्तियाँ आदि भारी वस्तुएं पश्चिम या दक्षिण दिशा में रखी जानी चाहियें I
  • ड्राइंग रूम में म्यूज़िक सिस्टम, स्पीकर आदि सुनने के यन्त्र वायव्य कोण अथवा पश्चिम दिशा में रखने चाहियें I
  • ड्राइंग रूम में यदि स्टडी टेबल लगानी हो तो पूर्व, ईशान एवं उत्तर दिशा में एवं डाइनिंग टेबल लगानी हो तो पश्चिम दिशा में रखनी चाहिए I

वास्तु एवं गेस्ट रूम

  • गेस्ट रूम जोकि मेहमानों को ठहराने के लिए प्रयुक्त किया जाता है वह घर के west , south -west , south एवं south-east में कभी नहीं बनाने चाहियें I इससे अतिथि देर तक ठहरता है, गृह- क्लेश होता है और अतिथि के आने का प्रयोजन भी पूर्ण नहीं होता I
  • गेस्ट रूम हमेशा north -west, north, north-east में बनाने से अतिथि कम समय में ही प्रसन्नता पूर्वक चला जाता है I घर में सुख- शांति बनी रहती है I
  • इस कक्ष में अतिथि के सोने की व्यवस्था दूसरे कमरों की तरह ही उचित दिशा में होनी चाहिए I

वास्तु एवं सीढियां

  • सीढ़ियों के नीचे कोई भी महत्त्वपूर्ण चीज नहीं बनानी चाहिए I शौचालय भी नहीं बनाना चाहिए I मज़बूरी वश बनाना पड़े तो शौचालय की छत एवं सीढ़ी के बीच में गैप छोड़ना चाहिए I
  • सीढ़ी हमेशा क्लोक-वाईस डायरेक्शन में अर्थात सीधे हाथ की तरफ घुमती जानी चाहियें I
  • सीढियां दक्षिण अथवा पश्चिम दिशाओं में होँ, पूर्व तथा उत्तर की तरफ न होँ I
  • सीढियां हमेशा विषम संख्या मेंबनानी चाहियें I सीढ़ियों की संख्या ऐसी हो कि उसे तीन से भाग देने पर शेष दो बचें I जैसे 5, 11, 17, 23, 29 आदि I
  • सीढ़ियों का द्वार पूर्व या दक्षिण दिशा में होना शुभ होता है I
  • याद रखें कि सीढ़ियों के ऊपर पाजिटिव एनर्जी एवं इसके नीचे नेगेटिव एनर्जी उत्पन्न होती है I


 

वास्तु एवं कोषागार

  • धन, संपदा, गहने, जवाहरात आदि का स्वामी कुबेर जी को माना गया है और इनकी दिशा उत्तर है I अतः धन- सम्पत्ति एवं महत्वपूर्ण कागज़ात जैसे फिक्स्ड- डिपोजिट, इन्वेस्टमेंट्स, रजिस्ट्री के कागज, विरासत के कागज, सर्टिफिकेट आदि रखने के लिए अर्थात कोषागार (खजाना रखने की जगह) बनाने के लिए सर्वोत्तम दिशा उत्तर दिशा ही है I
  • ईशान कोण में भारी तिजोरी रखने से धन हानि होती है I
  • आग्नेय कोण में तिजोरी होने से अनावश्यक खर्चों की बढ़ोत्तरी होती है I
  • साउथ-वेस्ट में तिजोरी रखने से एक बार तो धन बढ़ता हुआ दिखाई देता है किन्तु जल्दी ही किसी नुकसान आदि में खर्च होता है I
  • यदि कोषागार के लिए अलग से जगह की व्यवस्था न हो पाएं तो इस कार्य के लिए प्रयुक्त होने वाली अलमारी, सेफ या तिजोरी को उत्तर दिशा वाले कमरे में रखना चाहिए I
  • उत्तर दिशा के कमरे में रखी हुई तिजोरी दक्षिण दिशा में इस प्रकार से रखें की तिजोरी का मुह उत्तर की ओर खुलें और इसमें खजाना रखते हुए अपना मुह पूर्व की ओर रखें I

वास्तु एवं जल व्यवस्था

  • घर में प्रयुक्त किये जाने वाले जल का स्त्रोत ईशान कोण में होना चाहिए I जमीन से निकलने वाला पानी हो अथवा सरकारी वाटर लाइन हो पानी घर के ईशान कोण से ही आना चाहिए I
  • दक्षिण में पानी के लिए बनाया गया गड्ढा स्त्रियों के लिए बहुत अशुभ होता है I यदि किसी कारण से इसको बंद कराना संभव न हो तो ईशान कोण में इससे अधिक गहरा गड्ढा बनवा देना चाहिए I
  • कुआं, हैन्डपम्प अथवा सबमर्सिबल के लिए पूर्व, उत्तर एवं ईशान दिशाएं शुभ होती हैं और इनसे सुख, सम्पन्नता, वंश वृद्धि व प्रसिद्धि प्राप्त होती है I
  • दक्षिण अथवा नैऋत्य कोण में कुआं अथवा पानी निकालने के गहरे गड्ढे के होने से तरह- तरह के नुकसान होते हैं I
  • घर के बिल्कुल मध्य में इस प्रकार का गड्ढा होने से गृह स्वामी का विनाश होता है I
  • अग्नि कोण में इस प्रकार का गड्ढा या जल स्त्रोत होने से बीमारियों, अग्नि भय एवं चोरियों का दार रहता है I
  • छत पर रखी जाने वाली पानी की टंकी पश्चिम, नैऋत्य अथवा दक्षिण दिशा में होनी चाहिए I
  • जमीन के अन्दर रखी जाने वाली टंकियां या भूमिगत पानी की टंकी पूर्व, उत्तर या ईशान में होनी चाहिए I

यदि आप जीवन में वास्तुदोष के कारण तरह- तरह के कष्टों से जूझ रहे हैं और किसी कारणवश तोड़- फोड़ करने में असमर्थ हैं तो शीघ्र ही अपने घर, दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेन्ट, होटल, हस्पताल या किसी भी स्थान विशेष का नक्शा भेजकर बहुत कम खर्च में, बहुत कम तोड़- फोड़ में अपने वास्तु को अनुकूल बनाकर अपने घर, व्यवसाय को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण बना सकते हैं और वह भी मात्र Rs. 500 /- के कम शुल्क में I
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