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ॐ जय अम्बे गौरी

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी I
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री II १ II 
जय अम्बेo

माँग सिंदूर विराजत टीको मृगमदको I
उज्ज्वलसे दोउ नैना, चंद्रवदन नीको II २ II 
जय अम्बेo
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै I
रक्त- पुष्प गल माला, कण्ठनपर साजै II ३ II 
जय अम्बेo
केहरि वाहन राजत, खड्ग खपर धारी I
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुःखहारी II ४ II 
जय अम्बेo
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती I
कोटिक चंद्र दिवाकर सम राजत ज्योती II ५ II 
जय अम्बेo
शुम्भ निशुम्भ विदारे, महिषासुर- घाती I
धूम्रविलोचन नैना निशिदिन मदमाती II ६ II 
जय अम्बेo
चण्ड मुण्ड संहारे, शोणितबीज हरे I
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे II ७ II 
जय अम्बेo
ब्रह्माणी, रूद्राणी तुम कमलारानी I
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी II ८ II 
जय अम्बेo
चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरूँ I
बाजत ताल  मृदंगा और बाजत डमरू II ९ II 
जय अम्बेo
तुम ही जगकी माता, तुम ही हो भरता I
भक्तनकी दुःख हरता सुख सम्पति करता II १० II 
जय अम्बेo
भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी I
मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी II ११ II 
जय अम्बेo
कंचन थाल विराजत अगर कपुर बाती I
(श्री) मालकेतुमें राजत कोटिरतन ज्योती II १२ II 
जय अम्बेo
(श्री) अम्बेजीकी आरति जो कोइ जन गावै I
कहत शिवानँद स्वामी, सुख सम्पति पावै II १३ II 
जय अम्बेo

श्री देवीजी की आरती

जगजननी जय! जय !! (मा ! जगजननी जय! जय!!)
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय! जय!! 
जगo

तू ही सत-चित-सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूपा I
सत्य सनातन सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा II १ II  
जगजननीo
 
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी I
अमल अनन्त अगोचर अज आनँदराशी II २ II
जगo
   
अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी I
कर्त्ता विधि, भर्त्ता हरि, हर सँहारकारी II ३ II
जगo
तू विधिवधू, रमा, तू उमा, महामाया I
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया II ४ II
जगo

राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा I
तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा II ५ II
जगo

दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा I
अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा II ६ II
जगo

तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू I
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू II ७ II
जगo

सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या तू शोभाSSधारा I
विवसन विकटत-सरुपा, प्रलयमयी धारा II ८ II
जगo

तू ही स्नेह-सुधामयि, तू अति गरलमना I
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना II ९ II
जगo

मूलाधारनिवासिनि, इह-पर-सिद्धिप्रदे I
कालातीता काली, कमला तू वरदे II १० II
जगo

शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी I
भेदप्रदर्शिनि वाणी विमले ! वेदत्रयी II ११ II
जगo

हम अति दीन दुखी मा ! विपत-जाल घेरे I
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे II १२ II
जगo

निज स्वभाववश जननी ! दयादृष्टि कीजै I
करुणा कर करुणामयि ! चरण-शरण दीजै II १३ II
जगo

भगवान को, देवी- देवताओं को, ग्रहगणों को अथवा किसी भी पराशक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए विभिन्न रोली, मौली, अक्षत, पुष्प आदि उपचारों के द्वारा उस देव विशेष के मंत्रों सहित, शुभ घडी में, एक निश्चित विधि के द्वारा उपासना करना अर्थात उन्हें प्रसन्न करने को पूजा कहते हैं I वास्तव में श्रेष्ठ वस्तुओं के द्वारा, उत्तम मंत्रों के द्वारा अपने इष्टदेव को प्रसन्न करने की, उनकी कृपा प्राप्ति की विधि का नाम पूजा है I यही पूजा जब निष्काम भाव से की जाती है तो इसमें ज्यादा विधि की जरुरत नहीं होती लेकिन जब इसे हम सकाम रूप से (अर्थात अपने मनोवांछित फलों की प्राप्ति के लिए जैसे धन, स्त्री, पुत्र, सफलता, आयु, आरोग्य आदि की प्राप्ति के लिए) करते हैं तो इसे एक निश्चित विधि से, निश्चित मंत्रों से, विशेष उपचारों से एवं विशेष मुहूर्त में करना होता है, जिसके लिए श्रेष्ठ मन्त्रविद्, कर्मकाण्ड में पारंगत ब्राह्मणों की आवशयकता होती है, जिनका उच्चारण शुद्ध हो, जिन्होनें स्वयं भी जीवन में तप किया हो, विधि का ज्ञान हो, परिश्रमी होँ, शिखा- सूत्र को धारण करने वाले एवं संध्या- वंदन आदि नैमित्यिक कार्यों का पालन करते होँ I

ऐसे विप्रों के द्वारा सम्पन्न की गई उत्तम पूजाएं, मन्त्रजाप, विभिन्न विधान आपके हर मनोकामना को पूर्ण करने में सक्षम हैं I ऐसी दिव्य एवं अदभुत शक्तियों से पूर्ण हैं- पूजाएं
आईये संक्षिप्त रूप में जाने किस पूजा को किस विधान को किस लिए किया जाता है और संस्था के उत्तम ब्राह्मणों के द्वारा इन्हें सम्पन्न करवा कर देवकृपा से अपने जीवन को परिपूर्ण एवं सुखी बनाएं I
                                                       
     पूजा के नियम
पूजन संबंधित जानने योग्य कुछ बातें:

                                               आदित्यम् गणनाथं च देवीम् रुद्रम् च केशवं I
                                        पञ्चदैवत्य मित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत् II

  • सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव एवं विष्णु ये पञ्चदेव कहे गए हैं I पूजा छोटी कर रहे होँ अथवा बड़ी इन पाँच देवताओं की पूजा अवश्य करनी चाहिए I
  • कल्याण चाहने वाले गृहस्थ लोग सिर्फ एक मूर्ति या देव की पूजा न करें I अनेक देवी- देवताओं की (उपरोक्त पञ्च देवों की या इनके रूपों की) पूजा करें I इससे मनोरथ सफल होते हैं I
  • घर में दो शिवलिंग, तीन गणेश जी, दो शंख, दो सूर्य, तीन दुर्गा मूर्तियाँ, दो गोमती चक्र और दो शालिग्राम की पूजा न करें I इससे परिवार में अशांति होती है I
  • शालिग्राम की एवं नर्मदा नाड़ी से प्राप्त होने वाले बाणलिंग (नर्मदेश्वर शिवलिंग) की प्राणप्रतिष्ठा, स्थापना इत्यादि करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यह स्वयं सिद्ध है I
  • घर में मूर्तियों की प्रतिष्ठा चल रूप में एवं मंदिर में स्थिर प्रतिष्ठा करनी चाहिए I
  • पूजा करते समय मुह पूर्व या उत्तर की तरफ होना चाहिए I
  • पूजा- पाठ के लिए बैठते समय शुद्ध आसन जरुर बिछाना चाहिए I
  • पूजा करते समय शुद्ध एवं धुले हुए वस्त्रों में तथा स्वयं भी पवित्र होकर बैठना चाहिए I
  • पूजा के वक्त काले, नीले कपडे नहीं पहनने चाहिए I सफ़ेद, पीले या लाल वस्त्र शुभ माने जाते हैं I
  • पूजा के समय माथे पर तिलक लगाकर बैठना चाहिए I

                                               पूजा एवं उपचार

  • पूजा के लिए विभिन्न उपचारों (सामग्री) की आवश्यकता पड़ती है I पूजाएं तीन प्रकार के उपचारों से की जा सकती है :-

                   (क) पंचोपचार पूजा: गंध(चन्दन या रोली), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (प्रशाद या मीठा) I
                   (ख) दशोपचार पूजा: पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र निवेदन, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य I
                   (ग) षोडशोपचार पूजा:
                                   १. पाद्य अर्थात अपने इष्ट देव के पैरों को धोने के लिए जल I
                                   २. अर्घ्य अर्थात अपने प्रभु के हाथों को धोने के निमित्त जल I
                                   ३. आचमन अर्थात मुख शुद्धि हेतु दिया जाने वाला जल I
                                   ४. स्नान अर्थात अपने इष्ट को नहाने के लिए समर्पित जल I
                                   ५. वस्त्र अर्थात शक्ति अनुसार प्रभु को वस्त्र का समर्पण I
                                   ६. आभूषण अर्थात देव को सजाने की वस्तुएं I
                                   ७. गंध अर्थात अपने इष्ट देव को समर्पित चन्दन या रोली I
                                   ८. अक्षत अर्थात तीन बार धुले अखंडित चावल I
                                   ९.  पुष्प अर्थात तरह- तरह के फूलों से अपने स्वामी को सजाना I
                                   १०. धूप अर्थात अपने आराध्य को सुवासित करने की क्रिया I
                                   ११. दीप अर्थात अपने पूज्य के आगे जलाई गई ज्योत I
                                   १२. नैवेद्य अर्थात अपने इष्ट को समर्पित नानाविध मिष्ठान्न I
                                   १३. आचमन अर्थात मुख शुद्धि हेतु दिया जाने वाला जल I
                                   १४. ऋतुफलम् अर्थात देव के प्रति फलों का समर्पण I
                                   १५. ताम्बूल अर्थात देवताओं को समर्पित मीठा पान I
                                   १६.  दक्षिणा अर्थात शक्ति अनुसार भेंट चढ़ाना I

  • समस्त देवों को पूजा के उपचारों में फूल सर्वाधिक प्रिय हैं अतः मंदिर जाते हुए या घर की पूजा करते हुए फूलों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए I
  • भगवान विष्णु जी, कृष्ण, राम, नृसिंह जी आदि को तुलसी पत्र सर्वाधिक प्रिय हैं I
  • भगवान शिव को बिल्व पत्र सबसे ज्यादा प्रिय हैं I
  • गणेश जी को दूर्वा (हरी दूब) सर्वाधिक प्रिय है I
  • जल पात्र, घंटी, धूप और तेल का दीपक ये बायीं ओर रखने चाहियें I
  • घी का दीपक एवं सुवासित जल से भरा शंख ये दायीं ओर रखने चाहियें I
  • बाकी सभी उपचार देवताओं के सामने रखने चाहियें I
  • स्त्रियों को शाम के समय तुलसी मैया के आगे ज्योत जरुर जलानी चाहिए इससे घर में लक्ष्मी का वास होता है I
  • ज्यादा व्रत न रख सकें तो एकादशी का व्रत अवश्य रखना चाहिए I

गणगौर महापूजा

ग्रह दोषों के प्रभाव से अथवा कमज़ोर भाग्य के कारण यदि जीवन के साधारण से कार्यों में भी अत्यधिक अडचनें आती होँ तो व्यक्ति को अपने जीवन में ये दिव्य पूजा अवश्य सम्पन्न करवानी चाहिए I ऋद्धि- सिद्धि एवं शुभ लाभ के स्वामी भगवान गणेश जी एवं उनकी माता महा गौरी को समर्पित ये अनुष्ठान जीवन को सरल एवं सफल बनाने में अत्यन्त उपयोगी है I इससे माँ ऋद्धि प्रसन्न होकर धन प्रदान करती है माँ सिद्धि प्रसन्न होकर सफलता, गणेश पुत्र 'शुभ' प्रसन्न होकर अशुभताओं को दूर करते हैं दूसरे पुत्र 'लाभ' प्रसन्न होकर हर कार्य से श्रेष्ठ प्राप्ति कराते हैं I 5 दिन चलने वाली इस पूजा में भगवान गणेश जी के "विघ्नहारी महामंत्र" का 5 ब्राह्मणों द्वारा सवा लाख जाप किया जाता है एवं छठे दिन दशांश हवन किया जाता है I संस्था का छूट सहित शुल्क Rs. 15000 /-
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

नवग्रह मंगल विधान

"ग्रहा: राज्यं प्रयच्छन्ति ग्रहा: राज्यं हरन्ति च" अर्थात आपकी जन्म कुण्डली में विराजमान हुए ग्रह गण यदि प्रसन्न हैं तो बिना परिश्रम के भी राज्य सुख दे सकते हैं और यदि प्रतिकूल हो जाएं तो सब कुछ छीन भी लेते हैं I वास्तव में मनुष्य का जीवन ग्रहों के अधीन है और आपके जीवन को इन ग्रहों की दशाओं एवं प्रतिकूलता से बचाकर राजयोग जैसे उत्तम सुखों की प्राप्ति के लिए शास्त्रों में नौ ब्राह्मणों के द्वारा नौ दिनों में सम्पादित होने वाला यह ग्रह शांति विधान बतलाया गया है I आपके और पूरे परिवार के ग्रह दोषों के शमनार्थ यह मंगल विधान रामबाण सिद्ध हो सकता है I

उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

महामृत्युंजय विधान

मृत संजीवनी विद्या के अधिष्ठाता भगवान शिव के अमृत स्वरुप का नाम महामृत्युंजय है I ऊपर के दोनों हाथों में अमृत कलश लेकर अपना सिंचन करने वाले ये भगवान महामृत्युंजय अकल मृत्यु रूपी महादोष को नष्ट करने में समर्थ हैं I अनादि काल से ही मृत्यु शैय्या में पड़े हुए, गम्भीर रोगों से पीड़ित तथा घोर कष्टों से कराहते लोगों ने जब- जब भी भगवान महामृत्युंजय के दिव्य मंत्र का जाप सम्पन्न करवाया है उन्हें चमत्कार महसूस हुआ है I आज भी बड़ी विपदा के आ जाने पर, असाध्य रोगों के लग जाने पर, मृत्यु का भय प्रकट होने पर, जटिल ग्रह दशाओं के कारण जीवन में व्यवधान उत्पन्न होने पर श्रेष्ठ ज्योतिषी एवं ब्राह्मण गण इसी विधान को अपने यजमानों से विधिपूर्वक सम्पन्न करवा कर उन्हें कष्टों से राहत दिलाते हैं I बंधनोंसे मुक्ति के लिए भी यह मंत्र अदभुत कार्य करता है I आवश्यकता है तो इसे विधि- विधान से सम्पन्न कराने की I संस्था के ब्राह्मण इस कार्य में दक्ष हैं I

उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

पुत्रेष्टि यज्ञ

हमारे भारतीय समाज में सामाजिक और धार्मिक दोनों कारणों से पुत्र की महत्ता सदैव से रही है I पुत्र की प्राप्ति के लिए यहाँ पर दंपत्ति तरह- तरह के औषधि उपचार से लेकर मन्नतें मांगने तक अनेक प्रयत्न करते हैं किन्तु अनेक बार कुण्डली में सन्तान स्थान में दोषों के प्रभाव से पुत्र प्राप्ति नहीं हो पाती I शास्त्रों में इसके लिए अनेकों विधान जैसे चंडी विधान, सन्तान-गोपाल विधान, हरिवंश पुराण आदि विधानों का वर्णन किया गया है किन्तु इन सबमें निश्चित परिणाम देने वाला पुत्रेष्टि यज्ञ विधान है I रामायण में अपने सुना होगा राजा दशरथ जी ने इसी विधान के द्वारा राम सरीखे चार पुत्रों को पाया I द्रौपदी के पिता ने धृष्ट दयुम्न को इसी यज्ञं से पाया आज भी संस्था के माध्यम से अनेकों गृहस्थियों को पुत्र लाभ हुए हैं I आप भी गुणी, योग्य एवं भाग्यशाली सन्तान (विशेषकर पुत्र) की प्राप्ति के लिए इस विधान को सम्पन्न करा कर लाभान्वित हो सकते हैं I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

पञ्च लोकपाल पूजा विधान (सम्पूर्ण परिवार में सुख- शांति, उन्नति, प्रगति प्राप्ति हेतु)

जब लगें की परिवार को तरह- तरह की अशान्तियाँ, परेशानियाँ, बीमारियाँ तंग कर रही हैं कुछ ऐसा चल रहा है जो ख़तम होने का नाम नहीं ले रहा, एक व्यक्ति के सिर से मुसीबतें टली तो पाता चला की दूसरा सदस्य किसी दूसरी उलझन में पड़ गया है, एक अभी मुश्किल से उभरा नहीं की उससे पहले ही दूसरे के साथ कुछ दुर्घटना घट गई I कुछ ऐसा चल रहा है जोकि किसी की कुण्डली में भी नहीं लिखा है कुल मिलाकर कुछ अनहोनी हो रही है I इस तरह की नानाविध परेशानियों को समूल समाप्त करने के लिए आईये सृष्टि के आधारभूत लोक अर्थात संसार की रक्षा करने वाले इन पाँच देवताओं की शरण लें I कुछ ऐसी पूजा करें जिससे ये उत्तम देवगण प्रसन्न होँ I विघ्नों को हरने वाले गणेश जी, रक्षा करने वाली शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा, जीवन के प्रवाह को यथावत बनाए रखने वाले महाराज वायुदेव, आर्थिक अथवा सामाजिक उन्नति को देने वाले, अनन्त विस्तार वाले आकाशदेव, रोग, कष्ट, अरिष्ट, चिंताएं, क़ानूनी उपद्रव को शांत करने वाले, पारिवारिक स्नेह को बढ़ाने वाले दिव्यदेवों की जोड़ी अश्विनी कुमार ये पञ्च लोकपाल गण प्रसन्न होने पर पूरे परिवार की रक्षा करने में समर्थ हैं तो फिर किस बात की देरी ? इनकी शरण में आने से किस बात की झिझक.........
 
मात्र पाँच दिनों में सम्पन्न होने वाली ये पूजा आपके परिवार को किस तरह से चुटकियों में समस्याओं से मुक्त कर देगी ये तो आपको करवाने के बाद ही पता चलेगी......
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

पितृ शांति विधान

हमारे कुल के वे दिवंगत पूर्वज जो किसी अशुभताओं के वशीभूत होकर अंतरिक्ष मण्डल में भटकते फिरते हैं अति अशुभ कर्मों के कारण अथवा अपने वंशजों के श्राद्ध तर्पण आदि शुभ क्रियाओं के अभाव के कारण दूसरा जन्म लेने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें प्रेत कहा जाता है I क्योंकि जन्म लेने के लिए अथवा किसी अन्य योनि में प्रवेश करने के लिए एक निश्चित एवं न्यूनतम शुभ कर्मों की पूंजी जरुरी होती है जिसके अभाव में अगला जन्म मिलना कठिन होता है इसलिए व्यक्ति को सदैव शुभ कर्मों का संचय अवश्य करना चाहिए I ये शुभ कर्म हम दूसरों को भी प्रदान कर सकते हैं I अकाल मृत्यु जैसे अग्नि, शस्त्र, दुर्घटना, डूबना, भयंकर रोग, आत्महत्या या मर्डर आदि के द्वारा असमय मृत्यु के प्राप्त हो जाने पर भी प्रेत योनि की प्राप्ति होती है क्योंकि ईश्वर ने सबको एक निश्चित आयु प्रदान की है I जैसे किसी की आयु प्रारब्ध वश 65 वर्ष की प्राप्त हुई किन्तु 35वें वर्ष में ही यदि किसी दुर्घटना के कारण उस जीव का शरीर नष्ट हो गया तो उसकी जीवनी शक्ति अगले 30 वर्षों तक भूत प्रेत आदि बनकर भटकती रहेगी क्योंकि विधान के अनुसार 65वें वर्ष से पहले उसको अगला जन्म नहीं मिल सकता अतः उनके वंशजों का कर्तव्य बनता है की उनकी मुक्ति या सदगति करवाएं I इस प्रकार की अतृप्त जीवात्माएं अपनी अशुभताओं के प्रभाव से परिवार में तरह- तरह के उपद्रव एवं अशान्तियाँ फैलाती हैं I कभी धन हानि, कभी पशु हानि, कभी रोगों की बहुलता तो कभी- कभी तो इन क्रुद्ध आत्माओं की तरंगों से घर में असमय एवं अकाल मृत्यु होने लगती हैं I
 
एक साधारण इंसान इन चीजों को नहीं समझ पाता और लगता है अपने हिसाब से कारण ढूंढने लगता है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है तो आईये अविलंब अपने घर में हो रही अशुभताओं के निवारण के लिए संस्था के विद्वानों के द्वारा पितृ शांति विधान सम्पन्न करवाएं I जिसके अंतर्गत प्रेतत्व मुक्ति से लेकर पितृयों की सदगति तक समस्त कार्य सम्पन्न करवाए जाएंगे I
 
अभी आपने प्रेतों के बारें में जाना आईये पितृयों के बारे में भी बताएं I वे दिवंगत जीवात्माएं जिनके इतने शुभ कर्म नहीं हैं की वे मुक्ति को प्राप्त होँ और इतने अशुभ भी नहीं हैं की उन्हें नरक जाना पड़े I जिन्होंनें सन्तुष्ट भाव से मृत्यु की प्राप्ति की है, अंत समय में जिनकी कोई इच्छा शेष न थी उनको बुजुर्गों के एक विशेष लोक की प्राप्ति होती है जिसे पितृलोक कहा जाता है और उस लोक को प्राप्त करने वाले को पितृ या पितर कहा जाता है I ये पितृ गण अपनी संतानों के द्वारा अपने लिए श्राद्ध, भगवत प्राप्ति के श्रेष्ठ कर्म जैसे गीता पाठ, भागवद पाठ, पितृ गायत्री जाप आदि शुभ कर्मों की चाहना करते हैं जिससे उन्हें बल की प्राप्ति हो और उनके निमित इस प्रकार के पितृ शांति विधान करा दिए जाने पर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को धन- धान्य, श्रेष्ठ संतानें, उत्तम व्यापार, गृह शांति, बरकत एवं यश- कीर्ति- प्रतिष्ठा आदि का मुक्त कंठ एवं मुक्त हस्त से आशीर्वाद देते हैं I आईये एक कदम बढ़कर इस प्रकार के शुभ कर्मों को संस्था के माध्यम से सम्पन्न करवाकर उन पितृलोक वासी अपने बुजुर्गों को गुदगुदाने पर मजबूर करें I उनके हाथ उठें हमेशा आपके प्रति सुफलों की वर्षा में...............
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

सहस्त्रविष्णु विधान

शास्त्र कहते हैं की जिन लोगों ने पूर्व जन्म में शुभ कर्म या पुण्य किये हैं वे आज सुख का उपभोग कर रहे हैं और जिन लोगों ने पूर्व जन्म में पाप किये हैं आज वे दुःख भोग रहे हैं अर्थात शुभ कर्मों का प्रतिफल सुख एवं पाप कर्मों का प्रतिफल दुःख होते हैं अतः मनुष्य को सदैव शुभ कर्मों में लगे रहना चाहिए I धर्मपूर्वक धन का अर्जन करिये ताकि शांति एवं संतोष प्राप्त हो I संसार के हर कर्म को प्रभु की सेवा मानकर करिये ताकि अशांति न हो I प्रभु को हाजिर- नाजीर मानकर कर्म करने से पाप एवं इसको करने की इच्छा कम होती चली जाती है I जीवन से चिंताएं, विषाद एवं अवसाद कम होते चले जाते हैं I अपने जीवन का रथी ईश्वर को बनाइये, खुद को कर्ता मानकर, अहं को पालकर अपने रथ को दुःख के अपार सागर में मत डूबोइये I
 
यह तो इस जीवन के लिए, आगे के लिए, आपके काल के लिए निर्देश हुआ लेकिन उन पापों, अशुभताओं, दुष्कर्मों का क्या करें ? जिनको आप अनेकों जन्मों से अज्ञान वश करते आये हैं, जिनकी वजह से आपके इस जीवन में पग- पग में बाधाएं हैं अच्छा करने के पश्चात् भी बुरा ही होता है अथाह संघर्ष, अथाह तपिश लाख कोशिश करने के बावजूद भी पीछा नहीं छोडती हैं I कभी सम्बन्धियों से परेशानी तो कभी आर्थिक पेशानी तो कभी अपनी ही औलादों से जिल्लत, खूब नियम परहेज रखने के बाद भी शरीर में रोगों की बहुलता, ये सब हमारे पापों का प्रतिफल नहीं तो और क्या है ? क्योंकि शुभाशुभ कर्मों की एक उर्जा बनती है जिसको हमें स्वयं भुगत करके ही नष्ट करनी होती है I परोपकारी मुनियों ने एवं दयालु शास्त्रों ने इस अकाट्य कष्ट का भी निवारण बताया है ताकि अनजाने में हुए अपराधों के प्रति उस दयालु ईश्वर से माफ़ी मिल जाये वे असह्य पापकर्म एवं उनके परिणाम जो दुःख अथवा कष्ट हैं वे बिना भुगते ही नष्ट हो जाएं और ऐसा संभव है भगवान विष्णु की उत्तम अनुकम्पा के द्वारा....... विधि के विधान को रचने वाले पूरे के पूरे इस संसार के सिस्टम को बनाने वाले वे श्री हरि कुछ विशेष विधानों के द्वारा प्रसन्न होकर साफ्टवेयर मे परिवर्तन करके आपके अशुभ कर्मों को बाइपास कर देते हैं और आपके जीवन में सुख उपजने लगते हैं, ऐसे उस उत्तम विधान का नाम है सहस्त्रविष्णु विधान जिसमें भगवान नारायण के सहस्त्र नामों की पूजा, उपासना एवं वंदना की जाती है I उस करूणामय ईश्वर को इस प्रकार से रिझाया जाता है ताकि वे माता पिता की तरह आपके लिए दयालु बनें I आपके वे लाखों पाप सहस्त्र सुख की तरह बरसें I दस दिन दस ब्राह्मणों के द्वारा चलने वाला ये विधान आपके जीवन के बोझ को कितना हल्का कर देता है आईये इसका अनुभव करिये I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

उपरीदोष नाशक विधान

नज़र, टोना-टोटका, हाय, किया- कराया आदि के द्वारा एवं भूत- प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, बेताल, जिन्न, मसान आदि के द्वारा उत्पन्न होने वाले दोषों को उपरी दोष कहा जाता है I ये नकारात्मक उर्जाएँ (Negative energies) या तो किसी की जलन भारी निगाहों से या किसी के तंत्र प्रयोग से उत्पन्न होती हैं I चौराहों पर पैर पड़ने से अथवा भटकती आत्मा के आगोश में आने से एवं किसी को इस प्रकार की तंत्र क्रिया करते हुए देख लेने मात्र से ही ये उपरी दोष लग सकते हैं अतः सदैव सावधान, पवित्र एवं अपने इष्टदेव का स्मरण रखिये I गले अथवा हाथ में हमेशा कोई रक्षा कवच धारण किये रखिये किन्तु फिर भी यदि आप इस चपेट में आ ही चुके हैं, उपरी दोषों के कारण ठीक न होने वाली बीमारियाँ, असंतुलित व्यवसाय, लगातार न थमने वाले घाटे, अकारण खर्चे, बच्चे का अचानक पढ़ाई में कमज़ोर हो जाना, मन में हमेशा भय रहना, परेशानियों का दूर न होना, बनते कामों में बिगाड़ पड़ना, जरुरी कामों का समय पर न होना आदि पीडाओं को भुगत रहे हैं तो तुरंत संस्था से अपने घर की मिट्टी अथवा अपने सिरहाने रखा पानी या पीड़ित का चित्र आदि भेजकर इस दोष को चेक करवायें एवं इसकी पुष्टि होने पर यथाशीघ्र महाकाली, भैरव, क्षेत्रपाल, बजरंगी आदि कठोर प्रवृति के देवताओं की समुच्चय उपासना से सम्पन्न होने वाली उपरीदोष नाशक विधि को संस्था के माध्यम से यथाशीघ्र सम्पन्न करवाएं I कहीं ऐसा न हो कि आपकी लापरवाही किसी बड़ी परेशानी को न्योता न देदें I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

नौकरी प्राप्ति हेतु पूजा

पूर्व काल में विद्या प्राप्ति का सीधा सा अर्थ ज्ञान प्राप्ति से होता था, विद्वान बनना होता था, स्वयं की आत्मशांति एवं दूसरों को ज्ञानी बनाने हेतू कोई विद्वान बनता था धन कमाना मुख्य बात नहीं थी किन्तु आज समय बदल गया I आज एजुकेशन को प्रोफेशनल एजुकेशन कहा जाता है अर्थात विद्या प्राप्ति का लक्ष्य ज्ञान की प्राप्ति, सदगुणों का विकास, विनयता, परोपकार, आत्मानुभव न रहकर के मात्र हाई इनकम की प्राप्ति रह गया है I पढ़ाई वही ठीक मानी जाती है जिससे आमदनी अच्छी हो I समय ने साधनों का इतना विस्तार कर दिया है की थोड़े में गुजारा चलता नहीं और खर्चों की अधिकता ने व्यक्ति को अधिक से अधिक कमाने में मजबूर कर दिया है I इसमें किसी का कोई कसूर नहीं, समय का ही दोष है I किन्तु समस्या यहां आती है की आज आपने बच्चे का अच्छे से अच्छा करियर सलेक्ट किया, बच्चे ने पूरे जीजान से पढ़ाई भी की किन्तु 5 -7 वर्ष बाद बच्चा जब डिग्री लेकर निकला तो पता चला की समय के बदलाव ने उस पढ़ाई के ट्रेंड को या मार्किट वेल्यू को ही ख़त्म कर दिया है अब बच्चा कहां जायें, इधर से जिम्मेदारियों का बोझ सिर पर खड़ा है कमाना, नौकरी करना, अपने पैर पर खड़ा होना बहुत जरुरी हो गया है I थोड़े रुपयों से बिजनेस होता नहीं I इस प्रकार रोजगार प्राप्ति की विकट समस्या ने लाखों युवक- युवतियों को परेशान किया हुआ है I ऐसे में Madhusudan Astroworld आपके लिए पेश करते हैं रोजगार प्राप्ति विधान जिसको सम्पन्न करवाकर आप यथाशीघ्र मनचाही नौकरी प्राप्त कर सकते हैं I
सबको वृत्ति प्रदान करने वाली, सबको रोजगार प्रदान करने वाली माँ दुर्गा जी का ध्यान करके लाल चन्दन की माला से पवित्र आसन में बैठकर निम्नलिखित मंत्र की 40 दिन तक 5 माला जाप करें I
मंत्र: 
 या देवि सर्व भूतेशु वृत्ति रूपेण संस्थिता I
       नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः II
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

सिद्ध लक्ष्मी पूजा

जन्म जन्मान्तर की घोर दरिद्रता रूपी अभिशाप को मिटाने के लिए दोष, दुःख एवं दुर्भाग्य के बदले सुख सौभाग्य एवं सम्पन्नता की प्राप्ति के लिए भगवती महालक्ष्मी के इस दिव्य स्वरुप की पूजा की जाती है I जीतोड़ परिश्रम के पश्चात् भी यदि आप अपने जीवन का उत्थान न कर पाए होँ तो महालक्ष्मी के इस रूप की विधिवत पूजा करें I इस अनुष्ठान में महालक्ष्मी के आठों स्वरूपों की उनके मंत्रों से आराधना की जाती है I आठ ब्राह्मणों द्वारा आठ दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में 328000 मंत्रों का जाप किया जाता है I व्यापार वृद्धि के लिए, वैभवशाली जीवन की प्राप्ति के लिए, जीवन को सम्पूर्ण बनाने के लिए इस अनुष्ठान का विशेष महत्त्व है I

उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

आयुष्य विधान

पूर्वजन्म कृत अशुभ कर्मों अथवा जन्मकुण्डली के आयु कारक ग्रहों के पीड़ित होने के कारण अथवा मारक दशाओं के प्रभाव से आयु संबंधित कोई दोष हो अथवा हथेली में जीवन रेखा में कोई कमी हो तो शास्त्रों में इन दोषों को दूर करके दीर्घायु की प्राप्ति के लिए अनेक विधान वर्णित हैं I वेदों में लम्बी आयु को एवं निरोगी शरीर को धर्म एवं अर्थ का मुख्य साधन बताया है एवं आज्ञा दी गई है कि मनुष्य ईश्वर की प्राप्ति के श्रेष्ठतम साधन इस शरीर की हर संभव रक्षा करें और लम्बी आयु की प्राप्ति के लिए कुछ दिव्य मंत्र बताये गए हैं जिन्हें आयुष्य मंत्र कहा जाता है I विधिपूर्वक इन मंत्रों का अनुष्ठान सम्पन्न कराने से व्यक्ति सौ वर्ष की रोग रहित आयु भी प्राप्त कर सकता है अतः आपके या किसी अपनों की जन्मकुंडली में यदि ऐसा कोई अल्पायु दोष हो तो इस दिव्य आयुष्य विधान को संस्था के वैदिक ब्राह्मणों से सम्पन्न करवा कर इस अमूल्य जीवन की रक्षा करें I

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त्र्यम्बक विधान

ग्रह दोष, शत्रु दोष एवं पितृ दोष ये तीन जीवन के महादोष कहे गए हैं I एक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों में से किसी एक अथवा तीनों दोषों के कारण ही कष्ट, अरिष्ट अथवा पीड़ा की प्राप्ति होती है I यदि ये तीनों दोष शांत रहें अर्थात ग्रह अनुकूल चलें, प्रत्यक्ष शत्रु द्वेष न रखें, गुप्त शत्रु तांत्रिक क्रियाओं से पीड़ित न करें और प्रेत दोष आदि शांत होकर पितरों की शुभ कृपा प्राप्त हो तो व्यक्ति के जीवन में कोई दुःख नहीं हो सकता I यदि आप इन तीनों दोषों से पीड़ित हैं तो आपके लिए इस त्र्यम्बक विधान से बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है I अविलंब इस अनुष्ठान को सम्पन्न करवा कर तरह- तरह के उपायों के झंझट से बचें और अपने जीवन को शीघ्र सुखी बनाएं I इन तीनों दोषों के बदले सुख, सौभाग्य और सम्पदा की प्राप्ति करें I

उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

मातृका विधान (नौकरी प्राप्ति, समयानुसार प्रगति एवं पदोन्नति हेतु)

गौरी, पद्मा, शची, मेधा आदि श्रेष्ठतम षोडश मातृकाओं एवं तीव्र प्रभाव वाली चौंसठ योगिनियों को समर्पित ये दिव्य पूजन जीवन को सुख- समृद्धि से परिपूर्ण करने के साथ ही नौकरी अथवा रोजगार संबंधित समस्याओं को दूर करने में, मनचाही आजीविका दिलाने में अपना अचूक प्रभाव लिए हुए है I गणेश जी को भी गोदी में खिलाने वाली, उनको पाल-पोस कर बड़ा करने वाली ये सोलह देवियाँ स्वयं में जीवन की सोलह संपदाओं जैसे निरोगी काया, आकर्षक रूप, श्रेष्ठ एवं कुलीन परिवार, सामाजिक सुप्रतिष्ठा, आय के अधिकाधिक स्रोत, राजकीय अथवा प्रशासनिक सेवा, मनोवांछित जीवनसाथी, उत्तम सन्तान आदि को देने में समर्थ हैं I आदिकाल से ही कार्य-व्यवसाय, नौकरी- पेशा प्राप्ति के लिए, राजाओं की कृपा प्राप्ति के लिए इनका पूजन किया जाता है I विप्रगण सोलह दिन तक इन मातृकाओं की तथा चौंसठ योगिनियों की विधि- विधान से पूजा करके इनके मंत्रों का जाप तथा अंत में दशांश हवन, तर्पण, मार्जन एवं अवभृथ स्नान कराते हैं इसके प्रभाव से व्यक्ति के रोजगार संबंधित ग्रह दशाएं शांत होकर शीघ्र ही उत्तम रोजगार की, नौकरी चाहने वालों को नौकरी की प्राप्ति होती है I

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वास्तु विधान(गृह रक्षा, वास्तु दोष निवारण एवं सुखमय आवास हेतु)

भूखंड एवं इसमें निर्मित होने वाले किसी भी प्रकार के परिसर जैसे मकान, दुकान, फैक्ट्री, स्कूल, हस्पताल आदि में वास्तु का प्रभाव रहता है यदि निर्माण कार्य को वास्तु एवं दिशाओं के अनुरूप बनाया जाएँ तो प्रकृति के आशीर्वाद से सुख शांति एवं उन्नति की प्राप्ति होती है इसके विपरीत बनाए जाने पर दोष उत्पन्न होकर जीवन में तरह- तरह के संघर्ष एवं विपदाओं का सामना करना पड़ता है किन्तु लाख चाह कर भी स्थान के अभाव के कारण अथवा आर्थिक प्रतिबद्धता के कारण या कभी सरकारी नियमों के तहत व्यक्ति चाह करके भी वास्तु के अनुकूल गृह निर्माण नहीं कर पाता और पुराने बनाए हुए अथवा बिल्डरों के बनाए हुए मकानों में तो वास्तु की कल्पना भी नहीं हो पाती I ऐसी विकट स्थिति से उभरने के लिए अपने जीवन को अपने परिसर को सुख-समृद्धिमय बनाए रखने के लिए दुःख, कष्ट अथवा रोग को मिटाने के लिए संस्था के द्वारा वास्तु शांति विधान सम्पन्न करवाए जाते हैं जिसके प्रभाव से बिना तोड़- फोड़ के ही वास्तु एवं इसके अंगभूत समस्त देवता प्रसन्न होकर घर को वास्तु दोष रहित बना देते हैं जिससे व्यक्ति दोष युक्त मकान में भी अबाधित सुख- शांति से परिपूर्ण जीवन यापन कर सकता है I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान में रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

शीघ्र विवाह विधान

जैसे- जैसे हम तकनीकी तौर पर उन्नति प्राप्त करते जा रहे हैं हमारे जीवन में व्यवसायिकता बढ़ गई है सामाजिक ताने-बुने कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं I कल तक जहां विवाह एक साधारण सी प्रक्रिया थी आज मानवीय संवेदनाओं की कमी के चलते एवं प्रोफेशनलिज्म के बढ़ने के कारण केवल अच्छा कमाने वाले या यूं कहें की सिर्फ सेटल्ड बच्चों का ही विवाह हो पाता है I थोडा कमाने वाले या अन्सेटल्ड बच्चे बड़ी उम्र के हो जाने के बावजूद भी विवाह के सुख से वंचित हैं I यह तो एक साधारण दृष्टि है किन्तु कई बार हर तरीके से योग्य, सुन्दर, सुशील होने के बावजूद भी गुरु शुक्र ग्रहों की अशुभताओं के प्रभाव से 34- 35 वर्ष की आयु तक भी विवाह संभव नहीं हो पाता I बातें तो बहुत चलती हैं रिश्ता नहीं जुड़ पाता, सगाई तो हो जाती है शादी नहीं हो पाती, क्या करें ऐसे में ? मानव जीवन की इन वैवाहिक परेशानियों के निवारण हेतु शास्त्रों में अनेक प्रकार के शीघ्र विवाह विधान बताये गए हैं जिनको विधिपूर्वक सम्पन्न करवाकर यथा शीघ्र विवाह सुख प्राप्त किया जा सकता है, देरी को दूर किया जा सकता है I ऐसे में कन्याओं के वैवाहिक विलम्ब को दूर करने के लिए शास्त्रों में मंगलचंडी विधान, त्रयम्बक विधान, कात्यायनी पूजन, गौरी पूजन एवं लड़कों के शीघ्र विवाह हेतु, सुन्दर एवं मनोनुकूल पत्नी की प्राप्ति के लिए मनोरमा पत्नी प्राप्ति विधान, विश्वावसु गन्धर्व विधान, संपुटित चंडी विधान आदि का वर्णन किया गया है जिनको सम्यक् रूपेण करवाकर आप अपने विवाह योग्य बच्चों को उनका श्रेष्ठ जीवनसाथी प्रदान कर सकते हैं और खुद को भी भागदौड़ से एवं बारम्बार मीटिंग से बचा सकते हैं I इन विधानों की एक खासियत यह भी है की इनके पश्चात् होने वाले विवाह शुभ, शांतिकारक, मंगलमय एवं श्रेष्ठ संतानों से युक्त होते हैं अर्थात ऐसे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ होती हैं I मैं कहता हूँ की फिर इन खुशियों को पाने में और जहां बात अपने लाडलों की खुशी की हो तो उसमें भी देरी कैसी ? संस्था के विद्वान आपके निमित इन क्रियाओं को करवाने हेतु आपका सहर्ष स्वागत कर रहे हैं I 
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

घंटाकर्ण विधान

ॐ घंटाकर्ण: महावीरो सर्वव्याधि विनाशक: I
विस्फ़ोटकं भयं प्राप्ते रक्ष रक्ष महाबल II
 
स्तम्भन, वशीकरण, मारण हो अथवा मोहन तंत्र की कौन सी ऐसी क्रिया है जो इस घंटाकर्ण विधान के द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकती किन्तु फिर भी राजनैतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, कठिन चुनाव जितने के लिए, संस्था का मुखिया बनने के लिए अथवा पोलिटिकल स्टैण्ड की प्राप्ति के लिए हम इस विधान को सम्पन्न कराते हैं और अपने विशिष्ट यजमानों को हमने चमत्कारिक परिणाम दिए हैं I बड़े- बड़े नेता अपने प्रतिद्वंदियों को परास्त करने के लिए सुनिश्चित विजय की प्राप्ति के लिए ये दिव्य पूजा हर चुनाव में सम्पन्न करवाते हैं I कठोर श्रम से एवं बड़े खर्चे से सम्पन्न होने वाली ये पूजा हमें भी आश्चर्यचकित कर देती है I यदि आपने भी कभी राजनैतिक सुप्रतिष्ठा का ख्वाब लिया हो तो एक बार संपर्क अवश्य करें I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

दशा शांति विधान

मनुष्य एवं ग्रहों का अविच्छिन्न संबंध है I पूर्व जन्म के संचित कर्म प्रारब्ध बनते हैं और प्रारब्ध का प्रतिफल हमें ग्रहों के माध्यम से दिखाई देता है I अब कुण्डली में जैसे ग्रह होंगे वैसा जीवन में शुभाशुभ फल प्राप्त होगा I जन्मकालीन ग्रहों की गति के आधार पर ही किसी व्यक्ति के जीवन को गति की प्राप्ति होती है I जन्मकुंडली में बैठे ये ग्रह भी अपनी दशाओं, महादशाओ, अंतर्दशाओं आदि में अपने फलों को प्रकट करते हैं I जन्मकुंडली में बैठा हुआ ग्रह कितना भी शुभ क्यों न हो अपनी दशा आदि के आने पर ही जागृत होकर अपने शुभ फल को प्रकट करता है जैसे धरती पर पड़ा हुआ बीज उचित मौसम या परिवेश के प्राप्त होने पर ही अंकुरित होता है इसी भाँति अशुभ ग्रह जोकि कुण्डली में सोया हुआ लगता है अपनी दशा महादशा आदि के प्राप्त होने पर अचानक जागृत होकर अपने अशुभ फलों के द्वारा जीवन को विपदा एवं घोर संकट में डाल देता है I एक श्रेष्ठतम ज्योतिषी ये पहले से ही बता देता है की अमुक ग्रह की दशा अमुक समय में शुरू होगी और उसके द्वारा ये अमुक फल प्राप्त होंगे I शास्त्रों में इस प्रकार के अशुभ ग्रहों के निवारण हेतु उनके अशुभ फलों को घटाने के लिए विपरीत दशाओं में भी जीवन के सुखद प्रवाह को बनाए रखने के लिए कुछ विधि- विधान दिए गए हैं, इसे दशा शांति विधान कहा जाता है I
इस विधान की यह भी एक विशेषता है की इस क्रिया के द्वारा शुभ ग्रहों के शुभ फलों को उनकी दशा महादशा आदि में पूर्ण रूपेण प्राप्त किया जा सकता है I कई बार किसी अन्य दोष की वजह से बहुत शुभ फल को देने वाला ग्रह भी फल को पूरी तरह से न देकर के चला जाता है जैसे पानी से भरे हुए बदल सावन के महीने में बिना बरसे चले जाते हैं I
 
संस्था के ज्योतिषीयों एवं कर्म काण्डियों के संयुक्त प्रयास से सम्पन्न होने वाली ये पूजा अपने आप में अदभुत फल को देने वाली है I आप जीवन में हर समय किसी न किसी महादशा, अन्तर्दशा आदि में चल ही रहे हैं अतः आज ही अविलंब इस विधान को सम्पन्न करवाकर अपने जीवन की अशुभताओं को नष्ट करें या फिर एक शुभ ग्रह प्रसन्न होने पर आपके जीवन में कितने सुख की, धन- धान्य की, उन्नति एवं ऐश्वर्य की वर्षा करता है I इसको स्वयं ही अनुभव करें I
 
उत्तम सदाचारी, मन्त्रविद, कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणों के द्वारा आपके कल्याण हेतु कार्यों को सिद्ध कराने वाली विशिष्ट पूजाएं अत्यन्त मनोयोग के साथ आपके दुखों को ध्यान उमें रखकर सम्पन्न कराई जाती हैं I हजारों व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं I

रोजी रोजगार की दिशा में सफलता मिलेगी। आर्थिक तथा व्यावसायिक योजना सफल होगी। शासन सत्ता का सहयोग मिलेगा। धन, पद, प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। ससुराल पक्ष से लाभ मिलेगा। किसी अभिन्न मित्र से मिलाप होगा। तुला राशि के लिए अपने मोबाइल के मैसेज बॉक्स में लिखेंरोजी रोजगार की दिशा में सफलता मिलेगी। आर्थिक तथा व्यावसायिक योजना सफल होगी। शासन सत्ता का सहयोग मिलेगा। धन, पद, प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। ससुराल पक्ष से लाभ मिलेगा। किसी अभिन्न मित्र से मिलाप होगा। तुला राशि के लिए अपने मोबाइल के मैसेज बॉक्स में लिखें