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Muhurtam

मुहूर्त क्या है?

मुहूर्त का अर्थ है किसी कार्य विशेष को करने के लिए सही समय का चुनाव I  सही समय में प्रारंभ किया गया कार्य शीघ्र ही पूर्ण होता है और सफल रहता है इसके विपरीत अनुचित समय में प्रारम्भ किया गया कार्य समय पर पूर्ण नहीं हो पाता और उसमें असफलता की सम्भावना भी अधिक बनी रहती है I  उचित मुहूर्त बिना किये गये कार्य में विभिन्न विघ्न आते हैं, अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और कार्य पूर्ण नहीं हो पाता है I  इसीलिए हमारे पूर्वजों नें मुहूर्त की व्यवस्था की, ताकि उचित समय में किसी कार्य विशेष को प्रारम्भ किया जा सके I  समय और ग्रहों का प्रभाव जड़, चेतन, मानव, पशु, पक्षी, प्रकृति आदि सब पर पड़ता है I  संसार का कोई ऐसा पदार्थ नहीं, जिस पर समय अपना प्रभाव न दिखाता हो, समय के वशीभूत हुए बड़े- बड़े पहाड़ टूटकर मिट्टी में तब्दील हो जाते हैं, बड़े- बड़े गड्ढे भरकर समतल हो जाते हैं I  आपमें से कौन ऐसा है जिसने समय के साथ अच्छी- अच्छी चीजों को बदलते न देखा हो, समय ने हर फैशन, संस्कृति, आदतों, डिजाइनों, तकनीकों, तौर- तरीकों सबको बदला है और ये सब आपने, हमने सबने देखा है I  इसीलिए कहते हैं कि "वक्त बड़ा बलवान है" और ये अत्यन्त परिवर्तन शील हैI करोड़ों, अरबों रूपये देकर भी आप एक सैकिंड को भी नहीं खरीद सकते I  हां इस वक्त का सदुपयोग अवश्य किया जा सकता है I  संसार के सभी सफल लोगों को यदि हम पढ़ें तो उनके जीवन में एक ही समानता है कि उन्होनें "सही वक्त पर सही निर्णय लिया" और दुर्भाग्यशाली जिन्हें हम कहते हैं, उनके मुंह से एक ही बात निकलेगी की ओह ! वक्त पर चूक गए I  शास्त्रों में इसी समय के सदुपयोग का नाम मुहूर्त है I  वास्तव में सही समय पर सही कार्य को करने कि कला का नाम मुहूर्त है I  एक बीज भी सही समय पर न बोने से खराब हो जाता है और उचित समय, मौसम, प्रकृति का विचार करके खेती किये जाने पर श्रेष्ठतम समृद्धि कि प्राप्ति होती है I  कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहां आप समय, मुहूर्त का विचार नहीं करते ? किसी भी पर्यटन स्थल पर जाते हुए, पहाड़ पर चढ़ाई करते हुए, यात्रा के लिए निकलते हुए, बच्चे का एडमिशन करने के लिए, इन्वैस्टमेंट करते हुए, बच्चे का करियर चूज़ करते हुए, कहां आप बिना समय को देखे निर्णय लेते हैं I  बस इन्हीं सब जीवन के आवश्यक कार्यों को करने के लिए हमारे प्राचीन ऋषिमुनियों नें कुछ ऐसे नक्षत्र, घडियां, तिथियां, वार आदि का विचार अपने गहन अनुसंधान, अपने तप, अपनी आंतरिक एवं अलौकिक शक्तियों के द्वारा किया है, जिसका उपयोग करने पर आप अदभुत आश्चर्यजनक परिणामों कि प्राप्ति उतने ही परिश्रम, इन्वैस्टमेंट, साधनों के उपयोग के द्वारा कर सकते हैं I  और बस इसी समय का, स्थान का विचार करने को ही मुहूर्त कहा गया है I  रोग होने पर उचित समय में दवाई खाना शुरू करने पर रोग शीघ्र ठीक हो जाता है, मुहूर्त निकालकर आपरेशन करने पर सफलता से कष्ट दूर हो जाता है I  उचित मुहूर्त में केस दायर करने पर जीत की प्राप्ति होती है, शुभ मुहूर्त में वाहन खरीदने पर दुर्घटना से बचाव कर सकते हैं, शुभ मुहूर्त में व्यवसाय प्रारम्भ करने पर अच्छे लाभ की प्राप्ति होती है, जीवन के हर क्षेत्र को एक शुभ मुहूर्त की आवश्यकता है और आपकी इसी जरुरत को समझते हुए "मधुसूदन एस्ट्रोगुरु" आपके लिए लाये हैं ये "मुहूर्तम" प्रकरण जिसमें आप पायेंगे आपके गर्भ में शिशु आने से लेकर उसके सफलता के शिखर पर चढ़ने तक के मुहूर्त, आपके जीवन की हर ख़ुशी लम्बी रहे इसके लिए मुहूर्त, आपके कष्ट, दुःख, विपदाएं जल्दी से आपको छोड़ दें इसके लिए मुहूर्त, आपके हितकारी मित्र की तरह आपका साथ दें ये मुहूर्त आपका हर क्षण शुभ हो इसके लिए मुहूर्त ...........


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साढ़े तीन मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वैशाख शुक्ल तृतीय (अक्षय तीज), आश्विन शुक्ल दशमी (विजया दशमी) एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा ये चार स्वयं सिद्ध मुहूर्त हैं I इनमें कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं पड़ती है I इनमें प्रथम तीन मुहूर्त पूर्ण बली एवं चौथा मुहूर्त अर्धबली होने से इनको साढ़े तीन मुहूर्त कहते हैं I

भूमि के क्रय विक्रय का मुहूर्त

भूमि के क्रय- विक्रय का मुहूर्त

तिथि - 2, 5, 6, 10, 11, 15 (दोनों पक्ष) I

वार - गुरुवार, शुक्रवार I

नक्षत्र - मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, मूल, रेवती I

लग्न - 2, 5, 8 (केन्द्र एवं त्रिकोण में शुभग्रह एवं 3, 6, 11वें पापग्रह होना शुभ होता है) I

वास्तु- शांति मुहूर्त

वास्तु- शांति मुहूर्त

गृह- निर्माण से पूर्व या गृह- प्रवेश से पूर्व वास्तु- शांति अवश्य करनी चाहिए I इसके लिए शुभ नक्षत्र, वार एवं तिथि निम्न प्रकार समझें -

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12 व 13 (दोनों पक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, स्वाति, अनुराधा एवं मघा I

टिप्पणी - चन्द्र बल, लग्न शुद्धि एवं भद्र का विचार कर लेना चाहिए I

षोडश संस्कार मुहूर्त

षोडश संस्कार मुहूर्त

जिस कार्य में मन, रूचि और आचार- विचार को परिष्कृत एवं उन्नत किया जाता है उसे संस्कार कहते हैं अर्थात जिस क्रिया से पदार्थों में विकार हटकर स्वच्छता आ जाती है उसको संस्कार कहते हैं I हिन्दुओं में धार्मिक दृष्टि से शुद्ध और उन्नत करने के लिए होने वाले सोलह विशिष्ट कृत्य षोडश संस्कार के नाम से जाने जाते हैं I

ये निम्न हैं -

1. गर्भाधान                    2. पुंसवन                             3. सीमान्तोन्नयन                   4. जातकर्म

5. नामकरण                  6. निष्क्रमण                         7. अन्नप्राशन                          8. कर्णवेध

9. चूड़ाकर्म                     10. यज्ञोपवीत                       11. विद्यारम्भ                         12. वेदारम्भ

13. समावर्तन                14. उपनयन (व्रतबन्ध)          15. विवाह                              16. अन्त्येष्टि

रजस्वला स्नान मुहूर्त

रजस्वला स्नान मुहूर्त

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12, 15 (दोनों पक्ष) I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु, शुक्र I

नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती I

टिप्पणी - रजस्वला स्नान तीन दिन के बाद ही होना चाहिए क्योंकि इससे पूर्व कन्या शुद्ध नहीं होती है I

पुंसवन संस्कार मुहूर्त

पुंसवन संस्कार मुहूर्त

यह संस्कार गर्भधारण के दूसरे या तीसरे महीने में मनचाही सन्तान की प्राप्ति के लिए किया जाता है I ज्योतिष के अनुसार गर्भ के दूसरे महीने में मंगल ग्रह का तथा तीसरे महीने में गुरु ग्रह का प्रभाव रहता है I शुभ नक्षत्रों का चयन करके मन्त्र पाठ व औषधियों का सेवन इस प्रकार से किया जाता है कि सन्तान उत्तम भाग्य वाली एवं मनचाही हो I आयुर्वेद शास्त्र में कुछ ऐसी आश्चर्यजनक औषधियां हैं जिनके प्रयोग से पुत्र या पुत्री की प्राप्ति भी कि जा सकती है I इन्हीं औषधियों एवं उत्तम मंत्रों के उचित समय में प्रयोग को पुंसवन संस्कार कहा जाता है I प्रस्तुत हैं इनके लिए उत्तम नक्षत्र एवं तिथियां ....

यह संस्कार गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मृगशिरा, श्रवण नक्षत्रों में जब रविवार, मंगलवार एवं गुरुवार का योग हो, शुक्लपक्ष हो, नंदा एवं भद्रा नाम की तिथियां होँ और किये जाने वाले समय में मिथुन, सिंह, कुंभ, धनु और मीन लग्न हो तब इस संस्कार को सम्पन्न किया जाता है I

विष्णु पूजा मुहूर्त

विष्णु पूजा मुहूर्त

गर्भ के आठवें महीने में गर्भ की रक्षा हेतु सृष्टि के पालक शंख- चक्र- गदा- पदमधारी विष्णु की पूजा करके स्वर्ण प्रतिमा का दान किया जाता है I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ वार - सोम, गुरु व शुक्र I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा व रेवती I

लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9 I

टिप्पणी - भद्रा, व्यतिपात, रिक्ता- तिथि को त्याज्य दें एवं पत्नी के चन्द्र बल को महत्ता देने के साथ- साथ लग्न शुद्धि भी देखनी चाहिए I

सूतिका स्नान मुहूर्त

सूतिका स्नान मुहूर्त

प्रथम सूतिका स्नान पुत्र जन्म के सातवें या नौवें दिन होता है I निम्नलिखित वार, तिथि, एवं नक्षत्र में प्रसूता स्त्री को स्नान कराना शुभ रहता है I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ वार - रवि, मंगल, गुरु I

शुभ नक्षत्र - रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाति, अश्विनी एवं अनुराधा I

लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9 I

टिप्पणी - आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृत्तिका, मूला, चित्रा आदि नक्षत्र बुधवार व शनिवार एवं 8, 6, 12, 4, 9, 14 तिथि में प्रसूता को स्नान न कराएं क्योंकि इनमें स्नान कराने से सन्तान नहीं होती है I

पुराने गृह प्रवेश का मुहूर्त

पुराने गृह प्रवेश का मुहूर्त

यदि आपने पुराना घर ख़रीदा हो या किसी कारण से घर के टूट जाने पर उसी स्थान पर उसकी मरम्मत करवाई हो या दूसरा घर बनाया हो तो उस घर में प्रवेश के लिए शुभ नक्षत्र, वार, तिथि एवं मास निम्नवत समझें-

 शुभ मास -  वैशाख, ज्येष्ठ, माघ और फाल्गुन I इसमें कार्तिक, श्रावण और मार्गशीर्ष मास भी ग्राह्य हैं I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11 व 13 (शुक्ल पक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, उफा., चित्रा, अनुराधा, उषा., उभा. और रेवती I ये नक्षत्र न मिलें तो विशेष परिस्थिति में पुष्य, स्वाति, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र भी प्रवेश के लिए शुभ माने गए हैं I यहाँ कलशचक्र शुद्धि की उपेक्षा कर सकते हैं परन्तु पंचांग, चन्द्र एवं लग्न शुद्धि अवश्य करें I

यात्रा मुहूर्त विचार

यात्रा मुहूर्त विचार

यात्रा से ही मानव का सामाजिक व्यवहार चलता है I वस्तुत: शुभ ग्रह की दशा में तथा शुभ मुहूर्त या शकुन में यात्रा करने से, बिना अधिक परिश्रम किये कार्य की सिद्धि होती है जबकि अशुभ मुहूर्त या शकुन में यात्रा करने से हानि होती है I गुरु या शुक्र का अस्त होना यात्रारम्भ के लिए शुभ नहीं माना जाता है I यदि यात्रा आवश्यक हो तो गुरु व शुक्र की उपासना के बाद यात्रा करनी चाहिए I

तिथि - रिक्ता, अमावस, पूर्णिमा, षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी और शुक्ल प्रतिपदा को छोड़कर शेष सभी तिथियां यात्रा हेतु शुभ मानी गयी हैं I अपनी राशि के अनुसार घात तिथियों को भी त्याज्य देना चाहिए I

वार - दिशाशूल त्याज्य कर समस्त वार प्रशस्त हैं I

शुभनक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा और रेवती I

मध्य नक्षत्र - रोहिणी, तीनों उत्तरा, तीनों पूर्वा, ज्येष्ठा, मूला और शतभिषा I

वर्जित नक्षत्र - भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, चित्रा, स्वाति और विशाखा नक्षत्र निन्द्य हैं I

टिप्पणी - पंचक एवं पड़वा में यात्रा कदापि नहीं करनी चाहिए I दिशाशूल विचार सोमवार व शनिवार को पूर्व, गुरुवार को दक्षिण, रविवार व शुक्रवार को पश्चिम, मंगलवार व बुधवार को उत्तर दिशा में दिशाशूल समझकर यात्रा का त्याज्य करना चाहिए I अन्यथा हानि उठानी पड़ सकती है I समय शूल विचार प्रात:काल में पूर्व, मध्याह्न में दक्षिण, गोधूलि में पश्चिम एवं रात्रि में उत्तर दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए I चन्द्र वास विचार मेष, सिंह और धनु राशि का चन्द्रमा पूर्व दिशा में वृष, कन्या और मकर राशि का चन्द्रमा दक्षिण दिशा में तुला, मिथुन और कुंभ राशि का चन्द्रमा पश्चिम दिशा में कर्क, वृश्चिक और मीन का चन्द्रमा उत्तर दिशा में वास करता है I चन्द्र वास फल इस प्रकार है : सम्मुख चन्द्रमा धनलाभ कारक दक्षिण चन्द्रमा सुख- सम्पत्ति देने वाला पृष्ठ चन्द्रमा शोक- संताप कारक वाम चन्द्रमा धन हानि कारक जन्म राशि से 1, 3, 6, 7, 10 व 11वें चन्द्र हो तो शुभ होता है I इसके अतिरिक्त शुक्लपक्ष में 2, 5 व 9वें चन्द्रमा हो तो भी शुभ होता है I

नवीन वस्त्र धारण मुहूर्त

नवीन वस्त्र धारण मुहूर्त

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12, 15 (दोनों पक्ष) I

शुभ वार - बुध, गुरु, शुक्र I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, पूफा., उफा., हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, रेवती I

टिप्पणी - विवाह, यज्ञ, अनुष्ठान, संवत्सराम्भ, राजतिलक, वस्त्रालंकार, विशेषोत्सव एवं श्राद्ध आदि में बिना मुहूर्त के भी वस्त्र पहने जा सकते हैं I

गर्भाधान मुहूर्त

गर्भाधान मुहूर्त

स्त्रियों के मासिक धर्म के प्रारम्भ से सोलह रात ऋतुकाल कही गयी हैं I इनमें से पहली चार रात स्त्री सहवास के योग्य नहीं हैं I शेष बारह रात में 6, 8, 10, 12, 14, 16 वीं रात में सहवास प्रशस्त और पुत्र प्रदायक है I

शुभ तिथि - 4, 6, 8, 9, 14, पूर्णिमा व अमावस्या इनको छोड़ करके शेष तिथियां अनुकूल हैं I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक्र I

नक्षत्र - तीनों उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा आदि नक्षत्रों में गर्भाधान शुभ है I चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी, नक्षत्र गर्भाधान के लिए मध्यम है अर्थात शुभ नहीं है I इनके अतिरिक्त शेष नक्षत्र अधम हैं जिनमें गर्भाधान नहीं करना चाहिए I

लग्न शुद्धि- केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह होँ 3, 6, 11वें पापग्रह होँ एवं लग्न में सूर्य, मंगल, गुरु की दृष्टि हो I विषम राशि या नवांश में चन्द्रमा हो ऐसे लग्न में रजोदर्शन के बाद 6, 8, 10, 12, 14, 16वीं रात में गर्भधारण करना शुभ एवं फलदायी होता है I

टिप्पणी - ऋतुकाल के पहले चार दिन एवं ग्यारहवां व तेरहवां दिन गर्भाधान के लिए वर्जित है I शेष दस दिन ही गर्भाधान के लिए उपयुक्त हैं I पुत्र की कामना हो तो ऋतुकाल के सम दिन और पुत्री की कामना हो तो विषम दिनों में गर्भाधान करना चाहिए I

सिमन्तोन्नयन संस्कार मुहूर्त

सिमन्तोन्नयन संस्कार मुहूर्त

गर्भ के चौथे, छठे या आठवें मास में बालक एवं उसकी माता की रक्षा के लिए बालक के जन्म समय किसी भी दुविधा से बचने के लिए यह संस्कार सम्पन्न किया जाता है I

मृगशिरा, पुनर्वसु, मूला, पुष्य, हस्त, श्रवण नक्षत्रों में गुरु, मंगल या रविवार में भद्रा (6, 8, 12), रिक्ता (4, 9, 14, 30) तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में जब किये जाने वाले समय में केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह होँ, 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रह होँ, पुरुष ग्रह का लग्न हो तब यह संस्कार करना लाभप्रद रहता है I

पितृ गृह जाने का मुहूर्त

पितृ गृह जाने का मुहूर्त

प्रसव के पूर्व जब स्त्री पति गृह से पितृ गृह जाती है या असमय मायके जाए तो इस मुहूर्त को उपयोग में लाना चाहिए I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10 (शुक्लपक्ष) I

शुभ वार - सोम, गुरु, शुक्र I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा व रेवती I

लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9 I

टिप्पणी - भद्रा, व्यतिपात, रिक्ता तिथि को त्याज्य दें एवं पत्नी के चन्द्र बल को महत्ता देने के साथ- साथ लग्न शुद्धि भी देखनी चाहिए I

जातकर्म

जातकर्म

यह संस्कार जातक के जन्म के तुरंत बाद किया जाता है I इसमें बच्चे का मुख देखकर उत्तराभिमुख होकर पिता शीतल जल से स्नान करता है I दुर्बलता की स्थिति में स्वर्णयुक्त गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए I इसके करने से बालक की आयु में वृद्धि होती है I जन्म समय पिता उपस्थित न हो तो 11वें या 12वें दिन करना चाहिए I बच्चा गण्डमूल में उत्पन्न हो तो बिना मुख देखे यह संस्कार करना चाहिए I रिक्ता, 14, 30 व 15 तिथि एवं रवि संक्रान्ति को त्याजना चाहिए I शुभ वारों (चन्द्र, बुध व शुक्र) व मृदु, क्षिप्र और चर नक्षत्र को ग्रहण करना चाहिए I बालक का नाल कट जाए तो सूतक होता है I जबकि जातकर्म सूतक न होने पर ही होता है I आधुनिक युग में नाल काटने से पूर्व यह कर्म असुविधाजनक है I इसलिए जन्म के बाद लग्नशुद्धि देखकर कर लेना चाहिए I

दोलारोहण मुहूर्त

दोलारोहण मुहूर्त

जन्मदिन से दसवें, बारहवें, सोलहवें, अठारहवें, बाईसवें दिन प्रथम बार झूले में झुलाने या सुलाने को दोलारोहण कहते हैं I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, तीनों उत्तरा, रोहिणी I

टिप्पणी - शुभवारों और नक्षत्रों में पहले- पहल बालक को झुला झुलाना शुभ है I सूर्य नक्षत्र से उस दिन तक का नक्षत्र गिन कर फल को विचारें एवं शुभ अवधि में बालक को पहली बार झुलाएं I

नामकरण मुहूर्त

नामकरण मुहूर्त

शास्त्रानुसार बालक का नामकरण संस्कार 11वें दिन होना चाहिए I लेकिन मानव अपनी सुविधानुसार 7वें, 8वें, 10वें, 11वें या 12वें दिन भी कर लेता है I यदि बारहवें दिन तक नामकरण मुहूर्त न हो सके तो 18वें, 19वें व 100वें दिन बीतने पर या छह माह या एक वर्ष में करना चाहिए I शुभ मुहूर्त में ज्योतिष शास्त्रानुसार नवजात शिशु का नाम उसके कान में कहा जाता है I कुछ लोग जन्म नाम नहीं रखते हैं I लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि दो नाम होने से दो राशियों का प्रभाव उस मनुष्य पर पड़ता है जिससे ग्रहों के शुभाशुब प्रभाव से सुख- दुःख का अनुभव अधिक होता है I बच्चे को शुभ मुहूर्त में स्नान कराकर, साफ वस्त्र पहनाकर प्रसन्नता सहित नामकरण संस्कार करना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 7, 10, 11, 13(शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, चित्रा, रोहिणी, उषा., उफा., उभा., अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित I

लग्न शुद्धि - लग्न स्थिर 2, 5, 8 होना चाहिए I लग्न में केन्द्र व त्रिकोण में शुभग्रह होँ, 3, 6, 11वें भाव में क्रूरग्रह होँ एवं 8 व 12वें भाव में कोई ग्रह नहीं होना चाहिए I

टिप्पणी - बालक की पहचान उसके नाम से ही होती है I नाम के आधार पर ही ख्याति, सम्मानादी भी मिलता है I अतः बालक का नाम जन्माक्षर के आधार पर रखना चाहिए I यदि दो नाम होंगे तो दो राशियों के प्रभाव से प्रभावित होने पर एक ही मनुष्य को दो बार शुभाशुभ ग्रहों के प्रभाव से प्रभावित होना पड़ता है I

शिशु निष्क्रमण मुहूर्त

शिशु निष्क्रमण मुहूर्त

बालक को प्रथम बार घर से बाहर ले जाने को निष्क्रमण कहते हैं I यह कर्म बारहवें दिन या चौथे मास में करना शुभ है I बालक को सर्वप्रथम मंदिर ले जाकर पुजार्चन करना चाहिए एवं ब्राह्मणों से शुभाशीष लेने चाहिए I इसके अतिरिक्त बच्चे को पितृकुल के किसी स्वजन के पास ले जाकर आशीर्वाद लेना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध एवं गुरु I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, धनिष्ठा, अनुराधा और रेवती I

लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7 व 11वां I

टिप्पणी - जन्म से बारहवें दिन या जन्म से चौथे मास में शुभ तिथ्यादि में निष्क्रमण अर्थात प्रसूतिका गृह से दूसरे गृह या आंगन में लाना प्रशस्त है I

अन्नप्राशन मुहूर्त

अन्नप्राशन मुहूर्त

शुभ दिन का चयन करके माता- पिता बच्चे को अन्न का स्वाद चखते हैं I जन्म से 5, 6, 7, 8, 10वें महीने में बालक को पहली बार अन्न खिलाया जाता है I यह दिन पुत्र जन्म से 6, 8, 10 और सम मास में और कन्या जन्म 5, 7 आदि विषम मास में शुभ तिथि, नक्षत्रादि में यह संस्कार करना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा I

शुभ लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11

टिप्पणी - शुभग्रह 1, 4, 5, 7, 9 में होँ तथा पापग्रह 3, 6, 11वें भाव में हो या बालक की जन्म राशि से 8 या 12वां भाव ग्रह रहित हो तो यह संस्कार अवश्य कर लेना चाहिए I लग्न शुद्धि एवं चन्द्र बल देखकर ही यह संस्कार करना चाहिए I

चूड़ाकर्म (मुंडन) मुहूर्त

चूड़ाकर्म (मुंडन) मुहूर्त

यह संस्कार विषम वर्ष में लड़के का और सम वर्षों में कन्या का करना चाहिए I चौलकर्म, मुंडन या चूडाकर्म उत्तरायण सूर्य में शुभ समय में करना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 10, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - पुनर्वसु, मृगशिरा, धनिष्ठा, श्रवण, रेवती, पुष्य, चित्रा, अश्विनी एवं हस्त I

शुभ लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7, 10, 12

टिप्पणी - लग्न शुद्धि देखकर दोपहर से पूर्व चूडाकर्म संस्कार करना प्रशस्त है I ब्राह्मण के लिए रविवार, क्षत्रिय के लिए मंगलवार, वैश्य व शूद्र के लिए शनिवार उपयुक्त है, ऐसा कहा गया है I दक्षिणायन, देवशयन, निर्बल चंद्रमास, संध्या, रात्रि या युद्धकाल में यह कार्य नहीं करना चाहिए I माता प्रसूता या रजस्वला हो तब भी यह संस्कार वर्जित है I ऐसा ध्यान रखें की क्षीण चन्द्र होने पर मृत्यु, क्षीण मंगल होने पर दुर्घटना, क्षीण शनि होने पर पंगुता एवं क्षीण सूर्य होने पर ज्वर की सम्भावना बनती है, इसलिए लग्न शुद्धि भली- भाँति अवश्य देख लें I

उपनयन संस्कार मुहूर्त

उपनयन संस्कार मुहूर्त

उपनयन संस्कार को कहीं यज्ञोपवीत संस्कार व कहीं व्रतबन्ध के नाम से जाना जाता है I यज्ञोपवीत संस्कार हो जाने पर मनुष्य द्विज कहलाता है I शास्त्रानुसार ब्राह्मण का पाँच या आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का छठे या ग्यारहवें वर्ष में तथा वैश्य का आठवें या बारहवें वर्ष में उपनयन संस्कार होना चाहिए I

शुभ मास - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, माघ और फाल्गुन I

सूर्य - उत्तरायण में शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 11 (शुक्लपक्ष) एवं 2, 3, 5 (कृष्णपक्ष) I

शुभ समय - पूर्वाह्न शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 7, 12

टिप्पणी - तारा व ग्रह शुद्धि देखनी चाहिए I शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में होने चाहिए I इस दिन संस्कार के बाद सामर्थ्य व श्रद्धानुसार दान करना चाहिए I ब्राह्मण को दिया दान शुभ फलदायी है I ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, आषाढ़ शुक्ल दशमी, पौष शुक्ल एकादशी और माघ शुक्ल द्वादशी में उपनयन संस्कार वर्जित है I

विवाह एवं इससे संबंधित मुहूर्त

विवाह एवं इससे संबंधित मुहूर्त

वाग्दान (सगाई) मुहूर्त :

इस मुहूर्त में पिता या कन्या का कोई संबंधी वर के घर जाकर जब रिश्ते को सुनिश्चित कर आते है अर्थात रिश्ता जुबानी तौर पर पक्का कर आते हैं तो इसे वाग्दान कहते हैं I निम्नलिखित शुभ तिथि, वार और नक्षत्रों में यह शुभ कर्म कर सकते हैं I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उत्तराषाढा, उत्तरा भाद्रपदा और रेवती I

वर को तिलक करने का मुहूर्त

सगाई निश्चित हो जाने के बाद कन्या पक्ष वाले वर का तिलक करने जाते हैं और भेंट आदि देते हैं I ये कार्य भी कुछ शुभ घड़ियों में होना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, पूर्वाभाद्रप, पूर्वाषाढा, पूर्वाफाल्गुनी I

टिप्पणी - भद्रा, गण्डान्त, गुरु- शुक्रास्त एवं निर्बल चन्द्र त्याज्य है I

विवाह मुहूर्त

विवाह मुहूर्त का निर्णय करने से पहले वार के लिए सूर्य बल, कन्या के लिए गुरु बल एवं दोनों के लिए चन्द्र बल विचार कर निम्नलिखित शुभ मास, तिथि, वार, व नक्षत्र आदि में विवाह संस्कार करना चाहिए I

शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष I

शुभ वार - सभी वार ग्राह्य हैं I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती I

शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं I लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है I जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो I

विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :

सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में I

चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में I

मंगल - 3, 6, 11वें भाव में I

बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में I

शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में I

शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में I

टिप्पणी - गुरु व शुक्र अस्त नहीं होने चाहियें I सिंहस्थ गुरु, भद्रा व क्षीण चन्द्र वर्जित हैं I

नोट : वास्तव में वैवाहिक मुहूर्त का निर्णय करना अत्यन्त विद्वत्ता एवं परिश्रम साध्य काम है I इस मुहूर्त को शुद्धि पूर्वक निकालने के लिए लता, पात, युति, वेध, यामित्र, बाण, एकार्गल, उपग्रह, क्रांतिसाम्य एवं दग्धा तिथि आदि दस महादोषों का अनेक प्रकार के ग्रहबलों का राशि दोषों का तथा अनेक शास्त्रीय नियमों का, लोकाचार का, क्षेत्र, जाति, कुल परम्परा एवं आयु आदि का विचार किया जाता है और एक साधारण मनुष्य के लिए इन सब बातों का एक साथ विचार करके शुद्ध मुहूर्त निकालना अत्यन्त कठिन कार्य है I अतः जनसुविधा के लिए प्रत्येक राशि वाले वर एवं कन्याओं के लिए पूरे वर्ष की शुभ तिथियां निकालकर दी गयी हैं I लड़के की जन्मराशी या बोलते नाम की राशि एवं कन्या की राशि मालूम करके नीचे दी गयी तारीखों से एक संयुक्त (common) तिथि निकाल लें और उसे शुभ विवाह मुहूर्त के रूप में पर्युक्त करें I वैसे आप संस्था के विद्वानों से आर्डर करके शुद्ध विवाह मुहूर्त प्राप्त कर सकते हैं I

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पुनर्विवाह मुहूर्त

यदि किसी दम्पत्ति का विवाह अशुद्ध काल में हो गया है तो वह पुन: शुद्ध काल में विवाह कर सकते हैं यह शास्त्र सम्मत है I जब पति की मृत्यु के पश्चात् कोई स्त्री दूसरा पति चयन करके विवाह कर लेती है तो उसे पुनर्विवाह कहते हैं I जब वर में दोष हो, वर कन्या को त्याज्य कर सन्यास ग्रहण कर ले या मर जाए, कन्या की इच्छा के विरुद्ध विवाह कर लिया जाए, इस स्थिति में कन्या का किसी अन्य योग्य वर के साथ पुनर्विवाह कर दिया जाए तो यह सर्वत्र धर्म के अनुकूल माना गया है इसलिए पुनर्विवाह निम्नलिखित शुभ वार, मास, तिथि एवं नक्षत्र में करें-

शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष I

शुभ वार - सभी वार ग्राह्य हैं I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती I

शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं I लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है I जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो I

विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :

सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में I

चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में I

मंगल - 3, 6, 11वें भाव में I

बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में I

शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में I

शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में I

टिप्पणी - गुरु व शुक्र अस्त एवं क्षीण चन्द्रमा वर्जित है I पुनः विवाह करने वाली स्त्री को पुनर्भु कहा जाता है I सूर्य नक्षत्र से साभिजित गणना के अनुसार 4, 11, 18, 25वां नक्षत्र मृत्युदायक माना गया है I शेष नक्षत्र पुनर्विवाह के लिए शुभ हैं I

वेदिका मुहूर्त

विवाह में यज्ञादि हेतु वेदी का निर्माण किया जाता है, यह एक आवश्यक कृत्य है I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरात्रय, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला और रेवती I

वधू प्रवेश मुहूर्त

विवाह के बाद प्रथम बार पति के घर आने को वधू प्रवेश या वधू आगमन कहा जाता है I मुहूर्त निर्णय करते समय निम्नलिखित स्थितियों का चयन करें-

शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती I

शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं I लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है I जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो I

विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :

सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में I चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में I

मंगल - 3, 6, 11वें भाव में I

बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में I

शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में I

शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में I

टिप्पणी - वधू प्रवेश नवीन गृह में सर्वथा त्याज्य है I विषम दिनों, विषम मासों या विषम वर्षों में वर्जित है I इसी तरह भद्रा, व्यतिपात, गुरु- शुक्रास्त, क्षीण चन्द्र भी वर्जित है I

नव वधू द्वारा पाकारम्भ मुहूर्त

ससुराल में आने के बाद वधू द्वारा प्रथम बार रसोई बनवाई जाती है I इस कार्य के लिए ही इस मुहूर्त का विचार किया गया है I निम्नलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में नव वधू का पाकारम्भ (पहली बार रसोई बनाना) करना शुभ होता है I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु व शनि I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरात्रय, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती I

द्विरागमन मुहूर्त

ससुराल से पिता के घर में जाकर फिर से पति- परमेश्वर के घर में आने का नाम द्विरागमन है I यह भी शुभ समय में करने श्रेष्ठ होता है I निम्नलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में द्विरागमन शुभ होता है I

शुभ वर्ष - 1, 3, 5, 7, 9, 11, 13 15 व 17

शुभ मास - वैशाख, मार्गशीर्ष एवं फाल्गुन I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1, 2, 3, 5, 7, 8, 10, 11, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, पुनर्वसु, मृगशिरा, अनुराधा, धनिष्ठा, श्रवण, चित्रा, स्वाति, रेवती, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी, मूला,हस्त व उत्तरात्रय I

शुभ लग्न - 3, 4, 7, 9 , 10 व 12वीं राशि I

टिप्पणी - शनि और मंगलवार, 4, 6, 9, 12, 14, 30 तिथियां त्याज्य हैं I

प्रथम समागम मुहूर्त

अधोलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में वर- वधू का परस्पर प्रथम समागम करना शुभ होता है I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 9, 13, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - इन नक्षत्रों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है

  •  पूर्वाद्ध भोगी नक्षत्र - रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा I
  •  मध्य भोगी नक्षत्र - आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा I
  •  उत्तरार्ध भोगी नक्षत्र - ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद एवं उत्तराभाद्रपद I

शुभ लग्न - 1, 3, 5, 7, 9, 11वीं राशि I

टिप्पणी - पूर्वाद्ध भोगी नक्षत्र में स्त्री- पुरुष का प्रथम समागम होने पर स्त्री पति को प्रिय होती है, मध्य भोगी नक्षत्र में हो तो परस्पर प्रीति होती है और उत्तरार्ध भोगी नक्षत्र में हो तो पति पत्नी को प्रिय होता है I

षष्ठी पूजन

ष्ठी पूजन

बच्चे के जन्म से छठे दिन रात्रि के आरंभ में षष्ठी देवी (कात्यायनी देवी) का चित्र बनाकर पूजा की जाती है I इसको बोलचाल की भाषा में छठी कहते हैं I षष्ठी पूजन के बाद स्थिर लग्न व शुभवार को बिरादरी का, मित्रों एवं सगे- सम्बन्धियों का सम्मिलित सहभोज किया जाता है एवं दानादि करके ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया जाता है I कहीं- कहीं यह पूजन 14, 21 या 31वें दिन में भी होता है I

कुआं पूजन मुहूर्त

कुआं पूजन मुहूर्त

सन्तान के जन्म के एक मास के उपरान्त जल- पूजन किया जाता है I इसमें माता व सन्तान कुंए पर जाकर जल- पूजन करती है I

शुभ वार - सोम, बुध एवं गुरु I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I रिक्ता तिथियां त्याज्य कर अन्य तिथियों में पूजा करनी चाहिए I

शुभ नक्षत्र - श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, मूल एवं अनुराधा I

टिप्पणी - जल- पूजन में श्राद्धपक्ष व दिन, क्षयमास, गुरु व शुक्र अस्त, चैत्र- पौष मास व कुयोगों को त्याज्य देना चाहिए I

शिशु को पहली बार वस्त्र पहनाने का मुहूर्त

शिशु को पहली बार वस्त्र पहनाने का मुहूर्त

इस मुहूर्त में बालक को काले डोरे की करघनी या कोई नया वस्त्र पहनना शुभ फलदायी होता है I

शुभ वार - बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, मघा, तीनों उत्तरा, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं रेवती I

कर्णवेध मुहूर्त

कर्णवेध मुहूर्त

यह संस्कार जन्म से 12वें या 16वें दिन या जन्म से छठे, सातवें, या आठवें मास में शुभ समय चयन करके कर्णछेदन करना चाहिए I बालक का पूर्व की ओर मुख करके पहले दाहिना और फिर बायां जबकि कन्या का पहले बायां और फिर दाहिना कान छेड़ना चाहिए I कर्ण छेदन स्वर्णकार या सौभाग्यवती स्त्री द्वारा शुद्ध धातु की सूई से करना चाहिए I तीसरे दिन गर्म जल से कान को धोया जाता है I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 12, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, पूर्वा फाल्गुनी, रेवती, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा I

शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 7, 9, 12

टिप्पणी - यदि लग्न में गुरु हो तो विशेष शुभ होता है I अष्टम में कोई ग्रह न हो, पापग्रह 3, 6, 11वें होँ तथा शुभ ग्रह 1, 3, 4, 5, 7, 9, 10, 11वें होना उत्तम होता है I कर्णवेध के लिए सम वर्ष 2, 4, 6, 8, 10 त्याज्य होते हैं I विषम वर्ष 3, 5, 7, 9, 11 आदि में यह संस्कार करना उचित है I यह संस्कार दोपहर से पहले करना या बाद में कर लेना चाहिए, किन्तु रात्रि में कभी नहीं करना चाहिए I इसी प्रकार कन्या नासिक छेदन का मुहूर्त भी उक्त प्रकार से ज्ञात कर सकते हैं I इसके लिए भी उपरोक्त तिथि, वार, नक्षत्र आदि प्रयुक्त होते हैं I

अक्षरारंभ मुहूर्त

अक्षरारंभ मुहूर्त

बालक या बालिका को जन्म से पांचवें वर्ष में अक्षरारम्भ या विद्यारम्भ कराना शुभ होता है I

शुभ वार - सोम, बुध एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 10, 11, 12 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी,आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती I

शुभ लग्न - 2, 3, 6, 9, 12

टिप्पणी - सर्वप्रथम गणेश पूजन व सरस्वती पूजन करके गुरु पूजन करें I तदोपरांत 108 बार घृताहुति देकर, गुरु के सामने पूर्वाभिमुख बैठकर अक्षरारम्भ या पाठशाला के लिए भेजना चाहिए I

समावर्तन मुहूर्त

समावर्तन मुहूर्त

जब ब्रह्मचारी गुरु के पास से विद्या प्राप्त कर गृहस्थाश्रम के लिए पुन: घर लौटता है तो समावर्तन का संस्कार करने के बाद स्नातक कहा जाता है I समावर्तन संस्कार का मुहूर्त भी उपनयन संस्कार के अनुसार ही मान्य है I

सामान्य मुहूर्त

सर्वोपयोगी मुहूर्त

यह मुहूर्त प्रत्येक शुभ कार्यों में उपयोगी होता है I इसका उपयोग सर्वत्र किया जा सकता है I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 8, 9, 10, 12, 13, 14, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आश्लेषा, पुनर्वसु, उत्तरात्रय, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती I

शुभ लग्न - लग्न शुद्धि अवश्य करें I

टिप्पणी - चन्द्र बल का एवं गोचर विचार के अतिरिक्त जातक की दशा- अन्तर्दशा भी देख लेनी चाहिए I

मंदिर की स्थापना का मुहूर्त

इस मुहूर्त में मंदिर का निर्माण एवं स्थापना करना शुभ होता है I

शुभ मास - माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, पौष I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11 व 13 (शुक्लपक्ष)

शुभ नक्षत्र - पुष्य, उत्तरात्रय, मृगशिरा, श्रवण, अश्विनी, चित्रा, पुनर्वसु, विशाखा, आर्द्रा, हस्त, धनिष्ठा एवं रोहिणी I

शुभ लग्न - लग्न शुद्धि अवश्य करें I

धार्मिक कार्य मुहूर्त

इस मुहूर्त में कोई भी धार्मिक कार्य करना शुभ होता है I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा व रेवती I

शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 8, 9, 11, 12वीं राशि का होना चाहिए I केन्द्र व त्रिकोण में शुभ ग्रह एवं 3, 6, 11वें पाप ग्रह होने चाहियें I आठवें स्थान में कोई भी शुभ ग्रह नहीं होना चाहिए I

दुकान करने का मुहूर्त

इसमें लग्न शुद्धि देखकर दुकान का मुहूर्त करना शुभ होता है I प्रकाशन, बुक- स्टाल, छापाखाना, नाई, सुनार, लुहार, काष्ठ, मिठाई, जुते या चमड़े की वास्तु की, ड्राईक्लीनिंग, कपडे आदि की दुकान के लिए भी यह मुहूर्त प्रशस्त होता है I शुभ होरा या चौघड़िया भी देख लेनी चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12 व 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, उत्तरात्रय, हस्त, पुष्य, चित्रा, रेवती, अनुराधा, मृगशिरा व अश्विनी I

कृषि कार्य संबंधी मुहूर्त

इस मुहूर्त में बाघ लगाना, बीज बोना, हल चलाना, सिंचाई करना, अनाज काटना, खलियान में दाना, भूसा अलग करना एवं अनाज भरण आदि कार्यों के लिए नीचे लिखे शुभ वार, तिथि व नक्षत्र आदि का उपयोग करना चाहिए I

शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 3, 5, 7, 10, 11, 13, 15 (दोनों पक्ष)

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं रेवती I

लग्न शुद्धि - चन्द्र व शुक्र बली होने चाहिए I लग्न बली होना चाहिए I सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसके पहले नक्षत्र से तीन नक्षत्र अशुभ, अगले आठ शुभ, उससे अगले नौ अशुभ तथा अगले आठ शुभ होते हैं I इस विचार में अभिजित नक्षत्र भी गिना जाता है I बीज बोने के लिए सूर्य नक्षत्र से पहले तीन नक्षत्र शुभ, अगले सोलह नक्षत्र अशुभ एवं बाद के आठ नक्षत्र शुभ होते हैं I इस गणना में भी अभिजित नक्षत्र को गिना जाता है I

यन्त्र- तन्त्र- मन्त्र सिद्धि मुहूर्त

यन्त्र- तन्त्र- मन्त्र की सिद्धि या प्रगोय के लिए अधोलिखित वार, तिथि एवं नक्षत्रादी शुभ समझने चाहियें I

शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 10, 11, 13 (दोनों पक्ष) I

शुभ नक्षत्र - उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, अश्विनी, श्रवण, विशाखा, मृगशिरा I

टिप्पणी - संक्रान्ति, दीपावली, होली, दुर्गाष्टमी, ग्रहण का काल एवं नवरात्री इन कार्यों के लिए शुभ होती है I

लग्न शुद्धि देख लेनी चाहिए व चन्द्र प्रबल होना चाहिए I

बृहद (बड़े) व्यापार का मुहूर्त

इस मुहूर्त में कोई भी बड़ा व्यापार किया जा सकता है I इसके लिए निम्नलिखित शुभ वार, तिथि व नक्षत्र आदि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11 व 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - हस्त, पुष्य, उत्तरात्रय एवं चित्रा I

टिप्पणी - लग्न शुद्धि देखकर या शुभ होरा या शुभ चौघड़िया मुहूर्त में बृहद व्यापार करना चाहिए I

वस्त्र निर्माण मुहूर्त

हथकरघा, सूत मिल, कपड़ा छापी, रेडीमेड गारमेन्ट, दर्जी की दुकान एवं किसी भी प्रकार के वस्त्र बनाने या बुनने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार, नक्षत्र व लग्न आदि को उपयोग में लाना चाहिए I

शुभ वार - शनिवार को छोड़कर शेष सभी वार I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, रोहिणी, उत्तरात्रय, चित्रा I

स्वर्ण आभूषण/ रत्न व्यवसाय का मुहूर्त .

रत्न, सोने- चांदी के आभूषण की दुकान, जवाहारात, बने- बनाए आभूषण बेचने या बनाने संबंधी व्यवसाय के लिए निम्नलिखित तिथि, वार एवं नक्षत्रादि शुभ समझें I

शुभ वार - बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 13, 14 (दोनों पक्ष)

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा एवं रेवती I

लग्न शुद्धि - इसे अवश्य देखना चाहिए I चन्द्र बल भी अनुकूल होने चाहिए I

वाहन क्रय करने का मुहूर्त

वाहन क्रय करने के लिए निम्नलिखित तिथि, वार एवं नक्षत्रादि शुभ समझें I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 4, 9, 12, 14 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा व रेवती I

लग्न शुद्धि - वृष, मिथुन, कर्क, तुला, धनु एवं मीन राशि का लग्न प्रशस्त है I

टिप्पणी - सूर्य नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र तक गणना करके देख लेना चाहिए कि नक्षत्र नेष्ट कारक तो नहीं है I 1 से 9 नक्षत्र तक नेष्टकारक, 10 से 12 नक्षत्र तक श्रेष्ठकारक, 16 से 24 नक्षत्र तक में नेष्टकारक एवं 25 से 27 नक्षत्र तक में श्रेष्ठकारक होता है I शुभ लग्न में शुभ होरा हो तो सर्वश्रेष्ठ है I

पशु- पक्षी क्रय- विक्रय व पालनादि का मुहूर्त

पशु- पक्षी क्रय- विक्रय व पालनादि के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (दोनों पक्ष)

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण एवं रेवती I

वाद्य यन्त्र व्यवसाय का मुहूर्त

वाद्य यन्त्र (तबला, सितार, सारंगी, ग्रामोफोन, एवं रेडियो आदि व्यवसाय के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 8, 10, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण एवं रेवती I

लग्न शुद्धि - लग्न शुद्धि देखनी चाहिए I ताराबल भी देख लेना चाहिए I

नशीले पदार्थों कि दुकान का मुहूर्त

शराब, गांजा, भांग, तम्बाकू आदि मादक पदार्थों कि दुकान करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र व शनि I

शुभ तिथि - 2, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - भरणी, आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूला एवं रेवती I

होटल/रेस्टोरेन्ट खोलने का मुहूर्त

होटल व रेस्टोरेन्ट खोलने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र व शनि I

शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, उत्तरात्रय, स्वाति, विशाखा व रेवती I

गोद लेने का मुहूर्त

बालक को गोद लेने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 8, 10, 12 (दोनों पक्ष)

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं धनिष्ठा I

टिप्पणी - बालक व गोद लेने वाले व्यक्ति दोनों के चन्द्र शुभ एवं बली होने चाहियें I

चुनाव में खड़े होने का मुहूर्त

चुनाव में खड़े होने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 9, 10, 12, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, उत्तरात्रय, एवं रेवती I

टिप्पणी - केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह व 3 , 6 , 11वें पापग्रह होँ I लग्नेश एवं चन्द्र बली होँ और चतुर्थेश का लग्नेश से संबंध होना शुभ है I संसद में जाने के लिए भी उपरोक्त मुहूर्त उपयोगी है I अंतर मात्र इतना है कि लग्न शुद्धि देखते समय लग्न राशि स्थिर होनी चाहिए I

मंत्री पद पर शपथ मुहूर्त

किसी भी पद कि शपथ ग्रहण करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - मंगल, गुरु, शुक्र व शनि I

शुभ तिथि - 2, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, आर्द्रा, मघा, मूला, उत्तरात्रय, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा व शतभिषा I

लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए I

टिप्पणी - लग्नेश, चन्द्र तथा सूर्य शुभभाव में हो एवं चतुर्थेश बली हो I वैधृति, व्यतिपात व भाद्रादि को त्याजना चाहिए I

फिल्म संबंधी मुहूर्त

फिल्म आरम्भ करते समय या उसका प्रदर्शन करते समय मुहूर्त निकलना चाहिए और इसके लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि फिल्म आरम्भ करते समय लग्न राशि चर और फिल्म प्रदर्शन करते समय लग्न राशि स्थिर हो I लग्नेश, चन्द्र एवं शुक्र ग्रह विशेष प्रबल होँ I शुक्र ग्रह लग्न या चतुर्थ में हो तो विशेष शुभ है I केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह होँ और लग्न पर पाप ग्रहों कि दृष्टि नहीं होनी चाहिए I

शुभ वार - बुध, गुरु एवं शुक्र विशेष शुभ है I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 9, 12, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - भरणी, पूफा. एवं पूषा I

लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए I

टिप्पणी - शुभ होरा व चौघड़िया होना चाहिए I

चूल्हा स्थापन मुहूर्त

चूल्हा स्थापन हेतु निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - आर्द्रा, रोहिणी, उत्तरात्रय, एवं पुनर्वसु I

मशीनरी चालू करने का मुहूर्त

मशीनरी चालू करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - गुरु, शुक्र, शनि व रवि I

शुभ तिथि - 1, 7, 8 के अतिरिक्त सभी तिथियां I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, पुष्य, धनिष्ठा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु एवं रेवती I

लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए I

नौकरी संबंधी मुहूर्त

नौकरी के लिए आवेदन शुभ होरा या लग्न में करें I जबकि जन्म राशि से भी चन्द्र बली होना चाहिए I नौकरी प्रारंभ करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए I

शुभ वार - सोम, गुरु, शुक्र व शनि I

शुभ तिथि - 2, 3, 5, 10, 15 (शुक्लपक्ष) I

शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, अनुराधा, श्रवण व रेवती I

टिप्पणी - लग्नेश बली हो, लग्न में चन्द्र या शुक्र हो, शनि 6 , 8 , 11वें हो तथा गुरु केन्द्र- त्रिकोण में हो तो श्रेष्ठ है I

राज्याभिषेक मुहूर्त

राजा की मृत्यु के बाद बिना मुहूर्त के भी तत्काल राजगद्दी ग्रहण कर सकते हैं I तदोपरांत शुभ मुहूर्त देखकर राज्याभिषेक कराना चाहिए I लग्न- शुद्धि देखकर ही यह कृत्य करना चाहिए I मंगल षष्ठ भाव में, गुरु 1, 4, 5, 9, 11वें, शुक्र 5 व 10वें तथा शनि 3, 11 या 12वें हो तो राजा कीर्तिवान, चिरायु एवं राज्यलक्ष्मी से युक्त व यशस्वी होता है I

गंडमूल नक्षत्र - अश्विनी, आश्लेषा, मघा, मूला एवं रेवती I ये छ: नक्षत्र गंडमूल नक्षत्र कहे गए हैं I इनमें किसी बालक का जन्म होने पर 27 दिन के पश्चात् जब यह नक्षत्र दोबारा आता है तब इसकी शांति करवाई जाती है ताकि पैदा हुआ बालक माता- पिता आदि के लिए अशुभ न हो I संस्था में गंडमूल दोष निवारण की विशेष सुविधा उपलब्ध है I 

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, उत्तरा फाल्गुनी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु, अनुराधा और स्वाति ये नक्षत्र शुभ हैं I इनमें सभी कार्य सिद्ध होते हैं I 

मध्यम नक्षत्र - पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठा, आर्द्रा, मूला और शतभिषा ये नक्षत्र मध्यम होते हैं I इनमें साधारण कार्य सम्पन्न कर सकते हैं, विशेष कार्य नहीं I 

अशुभ नक्षत्र - भरणी, कृत्तिका, मघा और आश्लेषा नक्षत्र अशुभ होते हैं I इनमें कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है I ये नक्षत्र क्रूर एवं उग्र प्रकृति के कार्यों के लिए जैसे बिल्डिंग गिराना, कहीं आग लगाना, विस्फोटों का परीक्षण करना आदि के लिए ही शुभ होते हैं I 

पंचक नक्षत्र - धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती I ये पाँच नक्षत्र पंचक नक्षत्र कहे गए हैं I इनमें समस्त शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, यात्रा, गृहारंभ, घर की छत डालना, लकड़ी का संचय करना आदि कार्य नहीं करने चाहियें I