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Match Making

मंगल विवाह

झाँझि मृदंग संख सहनाई I

भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई II

बाजहि बहु बाजने सुहाए I

जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए II

सखिन्ह सहित हरषी अति रानी I

सूखत धान परा जनु पानी II

जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई I

पैरत थकें थाह जनु पाई II

श्रीहत भए भूप धनु टूटे I

जैसें दिवस दीप छबि छूटे II

सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती I

जनु चातकी पाइ जलु स्वाती II

रामहि लखनु बिलोकत कैसें I

ससिहि चकोर किसोरकु जैसें II

सतानंद तब आयसु दीन्हा I

सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा II

संग सखी सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार I

गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार II

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें I

छबिगन मध्य महाछबि जैसें II

कर सरोज जयमाल सुहाई I

बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई II

तन सकोचु मन परम उछाहू I

गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू II

जाइ समीप राम छबि देखी I

रहि जनु कूँअरि चित्र अवरेखी II

चतुर सखीम लखि कहा बुझाई I

पहिरावहु जयमाल सुहाई II

सुनत जुगल कर माल उठाई I

प्रेम बिबस पहिराइ न जाई II

सोहत जनु जुग जलज सनाला I

ससिहि सभीत देत जयमाला II

गावहिं छबि अवलोकि सहेली I

सियँ जयमाल राम उर मेली II

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहि सुमन I

सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन II

पुर अरु व्योम बाजने बाजे I

खल भए मलिन साधु सब राजे II

सुर किनर नर नाग मुनीसा I

जय जय जय कहि देहिं असीसा II

नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं I

बार बार कुसुमांजलि छूटीं II

जहँ तहँ बिप्र बेद धुनि करहीं I

बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं II

मंगल विवाह

जय रघुबंस बनज बन भानू I

गहन दनुज कुल दहन कृसानू II

जय सुर बिप्र धेनु हितकारी I

जय मद मोह कोह भ्रम हारी II

बिनय सील करुना गुन सागर I

जयति बचन रचना अति नागर II

सेवक सुखद सुभग सब अंगा I

जय सरीर छबि कोटि अनंगा II

करौं काह मुख एक प्रसंसा I

जय महेस मन मानस हंसा II

अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता I

छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता II

कहि जय जय जय रघुकुलकेतू I

भृगुपति गए बनहि तप हेतू II

अपभयँ कुटिल महीप डेराने I

जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने II

देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल I

हरषे पुर नर नारिसब मिटी मोहमय सूल II

अति गहगहे बाजने बाजे I

सबहिं मनोहर मंगल साजे II

जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं I

करहिं गान कल कोकिलबयनीं II

सुखु बिदेह कर बरनि न जाई I

जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई II

बिगत त्रास भइ सीय सुखारी I

जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी II

जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा I

प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा II

मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाई I

अब जो उचित सो कहिअ गोसांई II

कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना I

रहा बिबाहु चाप आधीना II

टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू I

सुर नर नाग बिदित सब काहू II

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारू I

बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु II

दूत अवधपुर पठबहु जाई I

आनहिं नृप दसरथहि बोलाई II

मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला I

पठए दूत बोलि तेहि काला II

एक ह्रदय चाहता है की दूसरे हृदय से संपर्क स्थापित करें, आपस में दोनों का प्यार हो, दोनों हृदय एक मधुर कल्पना से ओतप्रोत हों और जब दोनों हृदय एक सूत्र में बंध जाते हैं तब समाज उसे विवाह का नाम देता है I वास्तव में मानव जीवन की परिपूर्णता तभी मानी जाती है जब उसका जीवनसाथी भी सुन्दर हो, समझदार हो, प्रेम की भावना से भरा हुआ हो, दोनों के हृदय एक दूसरे में मिल जाने की क्षमता रखते हों I और ऐसे दांपत्य से परिपूर्ण घर ही स्वर्ग कहलाता है, किन्तु हम चाहकर भी अपने जीवनसाथी के गुण, दोष, प्रकृति, अपने प्रति आत्मीयता, एक दूसरे के संयोग से होने वाला भाग्य या दुर्भाग्य, सामाजिक, पारिवारिक अनुकूलता, मनचाही संतान इन सबके बारे में नहीं जान सकते, किन्तु ज्योतिष शास्त्र में वर्णित मेलापक (Match Making) विधि के द्वारा हम अपने अनुरूप, भाग्य के अनुकूल जीवनसाथी का चयन कर सकते हैं I

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विवाह
विवाह कमोद्वेग की मर्यादित सामाजिक अभिव्यक्ति है I विवाह से परिवार और परिवार से समाज की संरचना होती है परिवार सामाजिक व्यवस्थाओं तथा आदर्शों की पाठशाला, प्रयोगशाला और कार्यशाला है I विवाह परिवार की प्राथमिक प्रतिज्ञा है I अतएव इसका असंदिग्ध महत्व स्वत: सिद्ध है I विवाह के द्वारा कामसंतुष्टि, मनोवैज्ञानिक स्थिरता, आर्थिक सुरक्षा, व्यक्तित्व संवर्धन, सामाजिक सातत्य व विकास तथा सांस्कृतिक मूल्यों एवं स्थापनाओं के संरक्षण हेतू समुचित अवसर उपस्थित होते हैं I भारतीय संस्कृति में गृहस्थाश्रम की बहुमुखी उपयोगिता है I मनुस्मृति में गृहस्थाश्रम की उपयोगिता को इन शब्दों द्वारा अभिनंदित किया है-
"यथा वायुम समाश्रित्य वर्तन्ते सर्व्जन्तव: I
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः II
यस्मात त्रयोअप्याश्रमिणो ज्ञानेनानैन चान्तहम I
गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्र्मो गृही II
स संन्धार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छ्ता I
सुखं चेहेच्छ्ता नित्यं योअधार्यो दुर्बल इन्द्रियै: II"

अर्थात जिस प्रकार समस्त जंतु अपने जीवन के लिए वायु पर आश्रित हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण आश्रम गृहस्थ आश्रम पर आधारित हैं I क्योंकि ज्ञान तथा अन्न से अन्य तीनों आश्रमों की अपेक्षा ज्येष्ठ- श्रेष्ठ है I स्वर्ग तथा इहलोक में सुखाभिलाषी व्यक्ति को गृहस्थाश्रम का पालन करना चाहिए I दुर्बलेन्द्रिय व्यक्ति इसको धारण नहीं कर सकते I स्पष्ट है की विवाह सामाजिक सक्रियताओं का केन्द्रीय स्थल है I

विवाह- बहुमुखी आवशयकता

1. गृहस्थाश्रम की गरिमा                                 

2. व्यक्तित्व की परिपूर्णता                                      

3. ऋण मोचन

4. धर्म- कृत्य संपादन                                      

5. अर्थोत्पादन                                                          

6. सामाजिक सम्मान

7. कामोपभोग                                                 

8. मोक्ष- प्राप्ति

ऐसे बहुपयोगी,कल्याणकारी दाम्पत्य जीवन को चलाने के लिए श्रेष्ठ, कुशल एवं मनोनुकूल जीवनसाथी की आवश्यकता रहती है और उस साथी के अन्त:प्रकृति, स्वाभाव, गुण आदि की अवलोकन करने की अति आवश्यकता होती है और अल्प समय में हम किसी के व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं जान सकते, इसी लिए अनादिकाल से ही मनुष्य ऐसी किसी विद्या के लिए लालायित था जिससे उसके जीवन में आने वाले शख्स के बारे में जाना जा सके की क्या वो उसके अनुकूल है या नहीं, उसका व्यवहार उसके लिए मित्रवत रहेगा या शत्रुवत ? बस इन्ही जिज्ञासाओं के समाधान हेतु प्राचीन तपस्वी ऋषियों नें ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत मेलापक (गुण मिलान) की परम्परा बनाई जिसमें जीवन के चार आवश्यक अंग स्वाभाव, प्रकृति, संतान, जीवन आदि का मेल किया गया है और आपके समक्ष उसी मेलापक की व्यवस्था की गयी है जिसमें आप अपनी और साथी की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान डाल कर आप दोनों के मध्य भावी संभावनाओं को जान सकते हैं और यदि कोई कमी है तो हमारे संस्थान के विशिष्ट ज्योतिषीयों से इसका निराकरण करवा सकते हैं I

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