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KAAL SARPAM

जब सभी ग्रह राहु और केतु की धुरी के एक ओर होँ तथा दूसरी ओर कोई भी ग्रह न हो, तो कालसर्प योग स्थापित होता है I नेपच्यून, प्लूटो, युरेनस, जिन्हें हिन्दी में यम, इन्द्र और वरुण की संज्ञा दी गई है, उनकी स्थिति से कालसर्प योग के निर्मित होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता I चाहे यह तीनों ग्रह या इनमें से कोई भी, राहु केतु की धुरी के एक ओर हो अथवा दूसरी ओर हो I

मूलरूप से कालसर्प योग के बारह प्रकार होते हैं परन्तु इन्हें यदि 12 लग्नों में विभाजित कर दें तो 12 x 12 =144 प्रकार के कालसर्प योग संभव हैं I परन्तु 144 प्रकार के कालसर्प योग तब संभव हैं जब शेष 7 ग्रह राहु से केतु के मध्य स्थित होँ I यदि शेष 7 ग्रह केतु से राहु के मध्य स्थित होँ, तो 12 x 12 = 144 प्रकार के कालसर्प योग संभव हैं I इसी प्रकार से कुल 144 + 144 = 288 प्रकार के कालसर्प योग स्थापित हो सकते हैं ईन सभी प्रकार के कालसर्प योगों का प्रतिफल एकदूसरे से भिन्न होता है I मूलरूप से कालसर्प योगों के बारह प्रकार हैं जो विश्वविख्यात सर्पों के नाम पर आधारित हैं I 

अनन्त कालसर्प योग तक्षक कालसर्प योग
कुलिक कालसर्प योग कार्कोटक कालसर्प योग
वासुकी कालसर्प योग शंखचूड कालसर्प योग
शंखनाद कालसर्प योग घातक कालसर्प योग
पदम कालसर्प योग विषाक्त कालसर्प योग
महापदम कालसर्प योग शेषनाग कालसर्प योग

 

 
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1. अनन्त कालसर्प योग

लग्न में राहु तथा सप्तम भाव में केतु स्थित हो तथा अन्य सात ग्रह राहु से केतु के मध्य स्थित होँ अर्थात द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम तथा षष्ठ में से किहीं भावों में स्थित हो, तो अनंत कालसर्प योग की संरचना होती है I इससे ग्रसित जातक मानसिक अशांति, अस्थिरता, कपटी तथा मिथ्याभाषी होता है I जातक को जीवनपर्यन्त अपनी प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करना पड़ता है I इस योग से जातक का गृहस्थ तथा वैवाहिक जीवन दोनों ही प्रभावित होते हैं I जातक को कुटुम्बियों से हानि भी होती है I मानसिक अस्थिरता के कारण वह अनेक प्रकार के कार्यों को भी त्याग देता है I
इस प्रकार का कालसर्प योग जो लग्न से सप्तम भाव तक हो, वैवाहिक सुख के लिए अच्छा नहीं होता I इसके विपरीत यह ग्रह योग आध्यात्मिक खोज के लिए तो सहायक है जिसके कारण जातक वैवाहिक सुख का अनुभव नहीं कर पाता अथवा जातक को कभी- कभी वैवाहिक विसंगतियों और कष्टों का सामना करना पड़ता है I यहाँ पर ज्योतिष शास्त्र का पूर्व अनुमान जातक के जीवन में वैवाहिक विसंगतियों को नष्ट होने से बचा सकता है I ज्योतिष शास्त्र समस्याओं से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करता है I

2. कुलिक कालसर्प योग

द्वितीय में राहु तथा अष्टम में केतु स्थित होँ तथा राहु से केतु के मध्य अन्य सात ग्रह स्थित होँ, अर्थात तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम भावों में किन्हीं में स्थित हो, तो "कुलिक" कालसर्प योग निर्मित होता है I इससे ग्रसित जातक के जीवन में मानसिक चिडचिड़ापन, अपयश, परेशानियाँ तथा व्यय की बाहुल्यता रहती है I जातक को जीवन पर्यन्त धन संचित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है I जातक जीवनपर्यन्त ऋणी रहता है I
"कुलिक" कालसर्प योग धन सम्बन्धी विषयों के लिए अशुभ है I ऐसा बिल्कुल नहीं है कि जातक के पास धन कि कमी होगी, परन्तु वह दूसरों द्वारा अर्जित धन पर आश्रित रहेगा I जातक के पास धन आता- जाता रहेगा I या तो जातक अत्यधिक काम से अपने स्वास्थ्य को नष्ट कर लेता है और इस कारण जातक धन का अपव्यय भी करता है या जातक के शरीर में कार्य करनें कि क्षमता नहीं होती I जातक गुप्त रोगों से भी ग्रस्त रहता है I

3 . वासुकी कालसर्प योग

तृतीय में राहु तथा नवम में केतु स्थित होँ तथा राहु से केतु के मध्य अन्य सात ग्रह स्थित होँ, अर्थात चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम तथा अष्टम भावों में किन्हीं में स्थित हो, तो "वासुकी" कालसर्प योग निर्मित होता है I जातक को अपने भाई- बहन, परिजनों, पारिवारिक सदस्यों के कारण कष्ट सहन करना पड़ता है I मित्र भी कष्ट का कारण बनते हैं I नौकरी या व्यापार में भी अनेक कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ता है I इस योग के कारण भाग्योदय में भी अल्पविराम या अंकुश लग जाता है जिसके परिणाम स्वरुप जातक को अपने भाग्य का सम्पूर्ण फल नहीं मिल पाता I यश, पद, प्रतिष्ठा तथा पराक्रम के लिए संघर्ष करना पड़ता है I जातक नास्तिक होता है I क़ानूनी दस्तावेजों में प्रमाद से कष्ट भोगना पड़ता है I धन के साथ- साथ अपयश भी साथ चलता है I
यह योग वकील, अलोकप्रिय विज्ञान व प्रतिपादित सिद्धांतों में अग्रणी जातकों कि जन्मकुंडली में अधिकतर पाया जाता है I ऐसे जातक अपने बाहुबल व क्षमता के कारण जीवन कि प्रतियोगिता में सबसे आगे आने में सक्षम होते हैं I विशेष रूप से रुढ़िवादी जीवन के अतिरिक्त दौड़ में, परन्तु यह कालसर्प योग उन्हें विकलांग बना देता है I वे जातक जो मात्र भौतिक विदेशी निवेश को अपना लक्ष्य बनाते हैं तो उन्हें अपने स्थान के लिए बहुत मुश्किलें सहन करनी पड़ती हैं I

4. शंखनाद कालसर्प योग

चतुर्थ भाव में राहु तथा दशम में केतु स्थित होँ तथा राहु से केतु के मध्य अन्य सात ग्रह स्थित होँ, अर्थात पंचम, षष्ठ, सप्तम, अष्टम तथा नवमभावों में किन्हीं में स्थित हो, तो "शंखनाद" कालसर्प योग निर्मित होता है I इस योग के कारण जातक का सुख बाधित हो जाता है I जातक को माता, वाहन, नौकर, चल- अचल संपत्ति सम्बन्धी अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है I नौकरी या व्यवसाय में अनेक उतार- चढ़ाव सहन करने पड़ते हैं I लोगों पर अत्यधिक विश्वास करने पर विश्वासघात ही मिलता है I पिता या पति कि ओर से चिंताजनक स्थिति बनी रहती है I विद्याध्ययन भी बाधित हो जाता है I जातक को सुख के लिए जीवनपर्यन्त संघर्ष करना पड़ता है I
चतुर्थ से दशम भाव तक होने वाले कालसर्प योग का प्रभाव प्राकृतिक कालसर्प योग के प्रभाव के कारण अधिक हो जाता है I यह दोनों ही भाव पारिवारिक कार्य- कलाप से भी सम्बन्ध रखते हैं और यह योग कठिनाईयाँ, निराशा, पराजय और कभी- कभी प्रतिष्ठा हानि भी प्रदान करता है, जो जन्मकुंडली कठिनाईयों ओर दुर्घटनाओं का संकेत देती हैं तो यह योग और अधिक संकट बना देता है I इस योग से जातक को अवैध संतान का पिता व स्वयं अवैध पुत्र होने कि सम्भावना होती है I कभी- कभी संतान ही पारिवारिक मनमुटाव का कारण होते हैं I

5. पदम कालसर्प योग

पंचम भाव में राहु तथा एकादश में केतु स्थित होँ तथा राहु से केतु के मध्य अन्य सात ग्रह स्थित होँ, अर्थात षष्ठम, सप्तम, अष्टम, नवम तथा दशम भावों में किन्हीं में स्थित हो, तो "पदम" कालसर्प योग निर्मित होता है I यह योग व्यक्ति कि शिक्षा, बुद्धि और संतान सुख को आक्रान्त करता है I प्राय: राहु के साथ पाप ग्रह स्थित होने पर सर्प श्राप से भी व्यक्ति पीड़ित और दुखी रहता है I संतान सुख नहीं मिलता I वृद्धावस्था में संतान दूर रहती है और युवावस्था में या तो संतान जन्म नहीं होता या संतान होकर जीवित नहीं रहती I इस योग के कारण राजकीय दण्ड भी भी प्राप्त होता है I व्यवसाय में अशुभ ग्रहों की दशा- अंतरदशा में भारी हानि होती है I बुद्धि भ्रमित होती है या व्यक्ति पथ भ्रष्ट या गुमराह हो जाता है I ऐसे व्यक्तियों को शेयर या सट्टा करने का कार्य करने की भूल नहीं करनी चाहिए, अन्यथा उनका सभी धन नष्ट हो जाता है I गुप्त शत्रु बहुत होते हैं, अपयश होता है, मानसिक चिंता, उलझन और भय की स्थिति बनी रहती है I
इस योग में सुस्पष्ट देखा गया है कि जातक के विश्वास व भरोसे का उसके मित्र गल्त उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं I मित्र गणों द्वारा जातक को जीवन में अधिक सहायता नहीं मिलती है I यह ग्रह योग प्रेम से खिलवाड़ करने वाले व्यक्तियों कि जन्मकुंडली में अधिकतर पाया जाता है I यह योग प्रेम से खिलवाड़ में तो सहायक होता है परन्तु विवाह में नहीं I ऐसे  जातकों के अवैध संतानों की सम्भावना अधिक होती है ई यह योग जातक को प्रमादी जीवन लापरवाही से व्यतीत करने के लिए बाधित करता है I

6. महापदम कालसर्प योग

षष्ठ भाव में राहु तथा द्वादश में केतु स्थित होँ तथा राहु से केतु के मध्य अन्य सात ग्रह स्थित होँ, अर्थात सप्तम, अष्टम, नवम, दशम तथा एकादश भावों में किन्हीं में स्थित हो, तो "महापदम" कालसर्प योग निर्मित होता है I ऐसा व्यक्ति विभिन्न व्याधियों से दुखी रहता है I निरर्थक यात्राएँ करनी पड़ती हैं I व्याधि के उपयुक्त कारण का ज्ञान नहीं हो पाता I गुप्त शत्रु सदा पीड़ित करते हैं I जीवन में कर्म, धन और सुख के लिए सदा संघर्ष करना पड़ता है I उदर विकार, किडनी या तिल्ली से संबंधित व्याधि की सम्भावना बनी रहती है I अनेक शत्रु उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति उनके द्वारा पराजय के कारण हीन भावना से भी ग्रसित होता है I
यदि अन्य ग्रह योग भी कारागार योग की पुष्टि करें तो यह योग में भी परिणत हो सकता है I ऐसे व्यक्तियों को रक्षा विभाग, सेना या नौ- सेना अथवा वायु- सेना की नौकरी नहीं करनी चाहिए और इसका निर्णय षष्ठ और द्वादश भाव की राशि द्वारा किया जाना चाहिए कि जलीय, पृथ्वी या वायु तत्वों में से किससे सम्बद्ध है I लम्बी व्याधि के कारण व्यक्ति पीड़ित होता है परन्तु केतु के द्वादशस्थ होने से व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान कि कि ओर अग्रसर होता है I यदि केतु पर बृहस्पति कि दृष्टि हो या केतु तथा बृहस्पति कि द्वादश भाव में युति हो, यो जीवन के अनुसंधान और आत्मज्ञान में रूचि होती है I ऐसे व्यक्ति ऋण देकर अपने लिए शत्रुता उत्पन्न करते हैं और ऋण भी वापस नहीं होता I नारी अथवा प्रेम संबंधों के कारण पीड़ा पहुँचती है I
यह योग जातक को कारागार भेज सकता है I ऐसे जातकों के लिए थल सेना व नौ सेना का कार्य उपयोगी व सहायक नहीं होता I द्वादश भाव गुप्त शत्रु, खेद, अनुपात प्रदर्शित करता है तथा षष्ठ भाव स्वास्थ्य, व्याधि, कार्य व शत्रुओं पर अपना प्रभुत्व साबित करता है I यह जातक को उसकी चरम सीमाओं तक ले जा सकती है, या तो यह योग अत्यधिक शुभ या अत्यधिक अशुभ फल देता है I एक ओर यह योगजातक को सर्वश्रेष्ठ विद्याध्ययन व अध्यात्म में विकासशील बनता है वहीँ दूसरी ओर यह योग जातक को व्याधियों से बहुत पीड़ित करता है तथा अस्वस्थता के कारण लम्बी अवधि तक चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ता है या यह जातक को विकसित देश का शत्रु बना देता है I

7. तक्षक कालसर्प योग

सप्तम भाव में यदि राहु स्थित हो तथा लग्न में केतु स्थित हो तथा अन्य सभी ग्रह राहु से केतु के मध्य स्थित होँ, तो "तक्षक" कालसर्प योग निर्मित होता है I इससे ग्रसित जातक के जीवन में पुत्र का अभाव होता है तथा नारी वर्ग से उसके विचार नहीं मिलते I उसके जीवन में वैवाहिक सुख का अभाव रहता है I कार्यों में लोगों द्वारा किये गए विश्वासघात के कारण जीवन में संघर्ष करना पड़ता है I जातक पैतृक संपत्ति नष्ट कर देता है अथवा दान में दे देता है I जातक को जीवन में कई बार जेल की यात्रा करनी पड़ती है I जातक को गुप्त रोग, पीड़ा देते रहते हैं I  प्राय: नौकरी में भी अनेक प्रकार से नकारात्मक तत्वों, आरोप- प्रत्यारोप का प्रादुर्भाव रहता है I ऐसे व्यक्तियों पर चरित्र सम्बन्धी विषयों में विश्वास नहीं करना चाहिए I जीवन भर संघर्ष करना पड़ता है I सहयोगी और मित्रों द्वारा विश्वासघात प्राप्त होता है अथवा मित्र गुमराह करते हैं, पतन के मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं I

8. कार्कोटक कालसर्प योग

अष्टम भाव में यदि राहु स्थित हो तथा द्वितीय में केतु स्थित हो तथा अन्य सभी ग्रह राहु से केतु के मध्य स्थित होँ, तो "कार्कोटक" कालसर्प योग निर्मित होता है I संभवत: कालसर्प योग की यह स्थिति सर्वाधिक अशुभ होती है I भाग्य प्रतिबंधित हो जाता है या प्रगति में बार- बार अवरोध उत्पन्न होता है I नौकरी या व्यवसाय बाधित  होता है I नौकरी या तो मिलती नहीं या बार- बार छूट जाती है I पिता की आयु अथवा स्वास्थ्य भी आक्रान्त होता है I पैतृक सम्पत्ति प्राप्त होने में भी अनेक झगडे होते हैं I पारिवारिक कलह के कारण मन दुखी होता है I लम्बी बीमारी के कारण शारीरिक कष्ट सहन करने के लिए व्यक्ति विवश होता है I मृत्यु अकस्मात् होने की संभंव रहती है I व्यापार अथवा नौकरी में अर्जित धन नष्ट होता है I

9. शंखचूड कालसर्प योग

नवम भाव में यदि राहु स्थित हो तथा तृतीय में केतु स्थित हो तथा अन्य सभी ग्रह राहु से केतु के मध्य स्थित होँ, तो "शंखचूड" कालसर्प योग निर्मित होता है I नवम भाव भाग्य को संचालित करता है I इसलिए नवम भाव से प्रारम्भ होने वाला "शंखचूड" कालसर्प योग भाग्य को आक्रान्त कर देता है I प्रगति बाधित होती है, उन्नति में अवरोध उत्पन्न होता है I राजदण्ड का भय बना रहता है I न्यायालय में दोषी सिद्ध होने की आशंका को भी नकारा नहीं जा सकता है I अनेक प्रकार के व्यापार करने के उपरांत भी स्थायी सफलता की प्रतीक्षा, मन को विचलित करती है I जातक सभी सुखों से वंचित होता है और पिता का स्नेह आक्रान्त होता है I साझेदारी विफल होती है I प्रशासन में अधिकारियों के साथ कटुता अथवा शत्रुता का भाव उत्पन्न होता है I "शंखचूड" कालसर्प योग यदि चर राशियों में निर्मित हो, तो राहु और केतु की परस्पर अंतरदशाओं में लम्बी यात्रा के समय अत्यधिक सचेत और सावधान रहना चाहिए I

10. घातक कालसर्प योग

दशम भाव से चतुर्थ भाव के मध्य सभी ग्रह यदि राहु और केतु का मध्य होँ, तो "घातक" कालसर्प योग की संरचना होती है I व्यवसाय, व्यापार, नौकरी अथवा आजीविका के सभी द्वार बाधित होते हैं I माता- पिता के संबंधों की मधुरता को ग्रहण लग जाता है I नौकरी में आरोप- प्रत्यारोप की पीड़ा सहन करनी पड़ती है I सुगम सफलता स्वप्नवत होती है इयश प्राप्त नहीं होता बल्कि किसी कार्य में सफलता का श्रेय भी कोई और ले जाता है I व्यापार में भारी उतार- चढ़ाव की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं I साझेदारी में परस्पर मन- मुटाव और कटुता की परिस्थितियां लाभ की परिस्थितियों को भी बाधित कर देती हैं I निरन्तर चिंता बनी रहती है I प्राय: इस योग में उत्पन्न होने वाले जातकों को हृदय सम्बन्धी विकार से कष्ट होता है I

11. विषाक्त कालसर्प योग

इसे "विषधर" कालसर्प योग भी कहते हैं I एकादश भाव से पंचम भाव के मध्य राहु और केतु की धुरी के एक ओर समस्त ग्रहों की स्थितियाँ "विषाक्त" नमक कालसर्प योग का निर्माण करती हैं I भाई- बहनों के साथ सम्बन्ध मधुर नहीं रहते I आय तो बहुत होती है परन्तु धन का सदुपयोग नहीं होता I उदर विकार के साथ मन की अस्थिरता ओर त्रुटिपूर्ण निर्णय व्यक्ति के जीवन को दुखी बना देते हैं I व्यक्ति के जीवन का अंत बी ही रहस्यात्मक ढंग से होता है I इस योग में जन्म लेने वाले बुद्धिजीवी भी कई बार त्रुटिपूर्ण निर्णय के शिकार होते हैं या फिर उनकी बुद्धि नकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर होती है I ऐसे व्यक्तियों को शेयर, लाटरी आदि पर किंचित भी विश्वास नहीं करना चाहिए, अन्यथा हानि उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए I

12. शेषनाग कालसर्प योग

यदि राहु द्वादश भाव में हो तथा केतु षष्ठ भाव में हो तथा शेष सातों ग्रह राहु- केतु की धुरी के मध्य संस्थित हो, तो शेषनाग नमक कालसर्प योग की स्थापना होती है I इस योग के कारण अनेक गुप्त शत्रु होते हैं I घर में चोरी या डकैती की सम्भावना बनी रहती है I यदि अन्य शुभ योग हो, तो भी ऐसे व्यक्ति को ख्याति तो प्राप्त होती है परन्तु मृत्यु के उपरांत I कोई राजकीय सम्मान भी मिलता है तो मरणोपरांत उसकी पत्नी या संतान को दिया जाता है I अपव्यय की स्थिति आर्थिक सुदृढ़ता को निर्बल करती है I यदि द्वादश भाव में शुक्र- शासित राशि हो, तो अग्नि भय या जानवरों से आहात होने का भय होता है I प्राय: पराजय का संताप भोगना पड़ता है I नेत्र पीड़ा, उदर पीड़ा के साथ- साथ स्नायु मंडल के विकार की प्रबल सम्भावना होती है I

मेष लग्न तथा कालसर्प योग

मेष और वृश्चिक लग्न के जन्मकुंडली में यदि कालसर्प योग निर्मित हो रहा हो, तो उस जातक को न तो नौकरी में संतुष्टि मिलती है और न व्यापार में सफलता प्राप्त होती है I नौकरी और व्यापार की अवधि में भारी से भारी उतार- चढाव देखना पड़ता है I उत्तरोत्तर संघर्षों के कारण इनका आत्मविश्वास खंडित हो जाता है I असंतोष और व्याकुलता में वृद्धि करने वाले कई कारण स्वयं ही उत्पन्न होते रहते हैं जोकि कभी आशा तो कभी निराशा देते हैं I

वृष लग्न तथा कालसर्प योग

वृष और तुला लग्न की  जन्मकुंडली में यदि कालसर्पयोग की सम्भावना होती है, तो जातक को हर समय ऐसा आभास होता रहता है कि उनके हाथ में जो व्यवसाय है वह न जाने कब हाथ से निकल जाएगा I ऐसे जातक यह विश्वास नहीं कर पाते कि वे सफलता के कगार तक आ पहुँचे हैं, केवल दो- चार पग और आगे बढ़ना है I विपरीत परिणाम प्राप्त होने का भय मन में स्थित हो जाता है, सफलता के निकट पहुँचते ही इनके मन में तीव्र अशांति और व्याकुलता उत्पन्न हो जाती है कि घबराहट में वे उसी स्थान पर लौट आते हैं, जहाँ से चले थे I परिणाम यह होता है कि पुन: उसी स्थान पर लौटने के बाद उन्हें वह धरातल भी नहीं मिलता, जहाँ वे पहले अपना पैर जमाये खड़े थे, तब तक वह जमीन भी दलदल बन चुकी होती है I इस प्रकार कि घटनाएँ ऐसे जातक के जीवन कि स्मरणीय घटनाएं बन जाती है I

मिथुन लग्न तथा कालसर्प योग

मिथुन और कन्या लग्न की  जन्मकुंडली में यदि कालसर्पयोग बनता हो, तो वैसे जातक, यदि नौकरी से सम्बद्ध हैं, तो उच्च पद प्राप्त करने का स्वप्न अवश्य देखते हैं, पर सफल नहीं हो पाते I स्टील- फर्नीचर- लकड़ी आदि का व्यापार करें या कोई अन्य फैक्टरी लगायें, तो उसमें अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है तथा अत्यंत कठिनाई से मात्र अपने जीवनयापन हेतु आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाते हैं I क्रय- विक्रय, कमीशन, एजेन्सी, दलाली आदि का कार्य करें, तो दस बार का लाभ एक ही बार की हानी में चुकता करना पड़ जाता है I  कागज, कपड़ा, अनाज, किराना, जनरल मर्चेन्ट, ग्रहोपयोगी सामग्री, होटल, रेस्टोरेन्ट आदि के व्यापार में ऐसे जातकों को सफलता प्राप्त होती है, परन्तु श्रेष्ठ जनों की आह तथा शाप से इनकी क्षति भी होती है I  

कर्क लग्न तथा कालसर्प योग

कर्क लग्न की  जन्मकुंडली में यदि कालसर्पयोग हो, तो ऐसे जातक न अच्छी तरह लाभ अर्जित कर पाते हैं तथा न व्यापार में कोई प्रगति ही कर पाते हैं I एक साथ कई कार्य करने का साहस रखते हैं परन्तु सभी कार्य अपूर्ण रह जाते हैं I यदि वे चिकित्सक, अधिवक्ता, ज्योतिषी, अध्यापक, कलाकार आदि स्वतंत्र कार्य क्षेत्र के विशेषज्ञ बन जायेंगें, तो अधिक धन अर्जित करते हैं चारों ओर प्रसिद्धि प्राप्त होती है फिर भी शरीर से स्वस्थ और परिवार से प्रसन्न नहीं रहते I चतुराई और चालाकी से सदैव अपना रंग- ढंग बदलते हुए कार्य करने वाले होते हैं I इनके हाथ में धन कभी स्थिर नहीं रहता I पारिवारिक जीवन विसंगतिपूर्ण होता है I  पत्नी के साथ विचारों में तीव्र मतभेद की स्तिथि उत्पन्न होती है I यदि कालसर्प योग अप्रभावी हो, तो ऐसे व्यक्ति राजनीति में प्रगति करते हैं तथा यदि प्रभावशाली हो, तो राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी उन्नति नहीं कर पाते I कर्क लग्न में कालसर्प योग की जन्मकुंडली में यदि मंगल केतु से पीड़ित हो तथा शनि राहु से संयुक्त हो, तो जीवन में अवरोधों का कोई अंत नहीं होता I निरन्तर असफलता, कई बार व्यक्ति को मानसिक अवसाद की स्थिति में लाकर खड़ा कर देती है I  

सिंह लग्न तथा कालसर्प योग

सिंह लग्न की जन्मकुंडली में यदि कालसर्पयोग हो, तो ऐसे जातक आजीविका तथा अपने परिवार के निमित्त सदैव चिंतित बने रहते हैं I अपने स्वतंत्र उद्योग व्यवसाय में बार- बार लाभ तो अवश्य उठा सकते हैं परन्तु एक ही बार व्यवसाय में गहरी मंदी आने पर अथाह धन हानि भी सहन करने के लिए विवश होना पड़ता है I इनकी संचित धनराशि धीरे- धीरे अवश्य बढती है परन्तु एक- दो बार की हानि में ही संचित धनराशि की भी क्षति होती है I ऐसे जातक की रूचि नौकरी करने में नहीं होती परन्तु परिस्थितियों से विवश होकर पराधीनता भी थोड़ी देर के लिए स्वीकार कर लेते हैं I पारिवारिक संगठन बनाये रखना इनकी मर्यादा का प्रश्न होता है, वे दृढ़ प्रतिज्ञ, कठोर और हठी भी होते हैं I ऐसे जातकों के लिए सर्वोत्तम क्षेत्र राजनीति से संबंधित होता है या फिर ये प्रशासनिक सेवाओं में सफल होते हैं I सिंह लग्न में जन्मे व्यक्तियों की जन्मकुंडली में  विद्यमान कालसर्प योग उनके शरीर में अस्थिरता नहीं ला पाता I उनकी दृढ़ता उन्हें सभी असफलताओं से संघर्ष करके विजयी बनती है I यदि कालसर्प योग में लग्नेश सूर्य आक्रान्त हो अथवा राहु और केतु की धुरी पर स्थित हो, तो सिंह लग्न में जन्म लेने वाले ऐसे जातकों को भारी अपयश तथा अपमान का ग्रास बनना पड़ता है I निरन्तर अपमान के कडवे घूँट संबंधित व्यक्ति के उत्साह को कम तो आवश्य कर देते हैं परन्तु संघर्ष करनें की उनकी शक्ति में न्यूनता नहीं आ पाती है I दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं होता है I ऐसे व्यक्ति की आदर्शवादिता ही कई बार उनकी प्रगति को अवरुद्ध करती है I शनि के राहु- केतु पर स्थित होने से अनेक व्याधि, वात रोग, गठिया, स्पांडलाइटिस अथवा अस्थि सम्बन्धी विकार उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है I

कन्या लग्न तथा कालसर्प योग

कन्या लग्न के जातक की जन्मकुंडली में यदि प्रभावी कालसर्प योग हो, तो उसमें विलक्षण प्रतिभा तथा अनेक गुण विद्यमान होने के उपरांत भी उसे जीवनभर संघर्ष करना पड़ता है I ऐसे व्यक्ति की बुद्धि की प्रखरता तथा क्लिष्ट विषयों का विश्लेषण करने की अदभुत क्षमता अथवा व्यवसाय को व्यवस्थित करने की योग्यता आक्रान्त हो उठती है तथा उसके परामर्श से अन्य लोग लाभान्वित होते हैं परन्तु वह अपने इन्हीं विशेष गुणों का उपयोग अपनी प्रगति हेतू नहीं कर पाता ई नौकरी में ऐसे व्यक्तियों का बार- बार स्थानान्तरण होता है तथा जब तक एक स्थान पर कार्य क्षेत्र पर अपने अधिकार का समुचित प्रयोग करने की स्थिति में आते हैं अथवा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन सफलतापूर्वक करने लगते हैं, तभी उन्हें उस स्थान से स्थानान्तरण का आदेश प्राप्त हो जटा है तथा उन्हें न चाहकर भी आदेश का अनुसरण करने के लिए विवश होना पड़ता है I कन्या लग्न में यदि बुध राहु और केतु की धुरी पर स्थित हो, तो दशम भाव के बलवान होने पर भी व्यक्ति लिपिक, टाइपिस्ट, टेलीफोन आपरेटर अथवा पोस्ट- आफिस में कार्य करने वाला एक सामान्य ढंग से ही जीविकोपार्जन कर पाता है I यदि कालसर्प योग अप्रभावी हो, तो ऐसे व्यक्ति की बौधिक क्षमता बहुचर्चित, बहुप्रशंसित और बहुप्रतिष्ठित होती है तथा देशव्यापी ख्याति प्राप्त होती है I यदि कालसर्प योग अप्रभावी हो तथा बुध और बृहस्पति की युति हो, तो ऐसा व्यक्ति भारतीय प्रशासनिक सेवा अथवा इसके तुल्य प्रतियोगिताएं में शीर्षस्थ स्थान भी प्राप्त करता है I
यदि राहु और केतु केन्द्रगत होकर कालसर्प योग की संरचना कर रहे होँ, तो बुध और बृहस्पति, जो कर्म नियंत्रक ग्रह होंगे, उनकी परस्पर युति कालसर्प योग के अशुभ प्रभाव को खंडित कर देती तथा व्यक्ति इस योग का शुभ फल प्राप्त करने में सफल होगा I कई बार कन्या लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति की जन्मकुंडली में कालसर्प योग विद्यमान होने के उपरांत भी व्यक्ति अरबपति होता है I यदि बृहस्पति राहु और केतु की धुरी पर स्थित ही तथा बृहस्पति और चंद्रमा के मध्य विनिमय परिवर्तन योग की स्थापना हो रही हो अथवा दोनों की युति हो, तो कालसर्प योग प्रभावहीन हो जाता है तथा व्यक्ति यशस्वी उद्योगपति बनता है I

तुला लग्न तथा कालसर्प योग

तुला लग्न में जन्मा व्यक्ति यदि कालसर्प योग से पीड़ित हो तो विवाह सम्बन्धी अवरोध तो उत्पन्न होते ही हैं साथ ही दाम्पत्य सुख में विसंगतियों तथा जीवन के हर्ष और उन्माद पर भी ग्रहण लग जाता है I पत्नी की उपेक्षा के कारण अन्य में रूचि होती है तथा वैवाहिक विघटन का आकार दीर्घ होता चला जाता है I पति- पत्नी में आत्मीयता और विचारों की एकरूपता का अभाव जीवन के अनेक सुखों को आक्रान्त कर देता है I प्राय: विपरीत योनी से विश्वासघात की स्थिति उत्पन्न होती है I व्यवसाय सहसा हानी की ओर बढ़ने लगता है तथा नौकरी में अभिरुचि इसलिए कम हो जाती है क्योंकि उनके कार्य की आलोचना उनसे सहन नहीं होती I धैर्य की अल्पता के कारण जीवन असहज हो उठता है I कई बार ऐसे व्यक्ति अपमान तथा अपयश की कुंठा से भी करह उठते हैं I कालसर्प योग में यदि लग्नेश राहु से संयुक्त हो, तो उदर विकार, पोस्ट्रेट, यूरिनरी ट्रैक से संबंधित कष्ट की भी सम्भावना होती है I इसी प्रकार का कालसर्प योग का निर्माण करने वाले ग्रह राहु ओर केतु यदि शनि ओर चंद्रमा को आक्रांत कर दें, तो व्यक्ति की प्रगति ओर संपत्ति दोनों की ही उपलब्धि अवरोधयुक्त होती है I

वृश्चिक लग्न तथा कालसर्प योग

वृश्चिक लग्न में कालसर्प योग की संरचना पदोन्नति में अवरोध उत्पन्न करती है तथा अधीनस्थ अधिकारी उसे हटाकर उसका स्थान ले लेने में सफल हो जाते हैं I व्यवसाय करने वाले व्यक्ति बार- बार असफल होते हैं I प्रगति में निरन्तर बाधा पड़ती है I विशेष रूप से यदि सूर्य राहु से युक्त हो तथा जन्मकुंडली में कालसर्प योग भी विद्यमान हो, तो व्यवसाय पक्ष पर्याप्त निर्बल तथा बाधापूर्ण हो जाता है I कई बार अपने क्रोध पर नियंत्रण न कर पाने से भारी क्षति होती है I जीवन संघर्षपूर्ण रहता है I यदि बृहस्पति राहु और केतु की धुरी पर स्थित हो, तो संतान पक्ष के कारण अधिक चिंता और पीड़ा जीवन के उत्साह ओर उल्लास को आक्रान्त कर देती है I आर्थिक क्षति के बार- बार होने से आत्मविश्वास निर्बल पड़ने लगता है I शीघ्रता में लेने वाले निर्णय त्रुटिपूर्ण होते हैं I

धनु लग्न तथा कालसर्प योग

धनु लग्न की जन्मकुंडली में यदि कालसर्प योग हो, तो ऐसे जातक पराधीन कार्य या नौकरी आदि में सफल नहीं होते I अन्य स्त्रियों के संयोग से सवतंत्र कार्य क्षेत्र में अपनी स्थिति दृढ़ कर सकते हैं परन्तु परिवार की किसी स्त्री के षड्यंत्र से उनकी सारी उन्नति अवरुद्ध भी हो जाती है I ऐसे जातक दलाली, कमीशन, एजेन्सी या कोई कन्सल्टेन्सी चलाने का कार्य करते हो अर्थात किसी भी व्यवसाय में संलग्न होँ या फिर राजनीतिग्य होँ, तो उसमें अत्यन्त लोकप्रिय और सम्मानित होते हैं I समाज में प्रतिष्ठित होते हैं, परन्तु संकोची स्वभाव के कारण धन का अभाव बना रहता है, अर्जित धन की भी हानि होने की सम्भावना होती है I इनका पारिवारिक जीवन अत्यन्त संघर्षमय होता है I ऐसे जातक अनेक कष्टदायक स्थितियों में भी सदैव प्रसन्न दिखाई देते हैं I सदा दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर रहते हैं I परोपकारी होते हैं और इन्हें अपयश भी प्राप्त होता है I
यदि कालसर्प योग केंद्र में निर्मित हो रहा हो तो तथा बुध और बृहस्पति की परस्पर युति शुभ स्थान पर हो अथवा राहु या केतु के साथ ही क्यों न हो, व्यक्ति की असीम प्रगति होती है तथा अपने बुद्धिबल, अनुशासन, परिश्रम तथा प्रतिभा के आधार पर अपार धनार्जन करने में सफल होता है I परन्तु सूर्य के राहु और केतु की धुरी पर स्थित होने से सरकार द्वारा कई बार अपमानित और दण्डित भी होता है I

मकर लग्न तथा कालसर्प योग
मकर और कुम्भ लग्न की जन्मकुंडली में यदि कालसर्प योग है, तो ऐसे जातक खनिज, पेट्रोलियम, एसिड, कोयला, मेडिकल या केमिकल से संबंधित व्यवसाय अथवा व्यापार करने में उत्तम सफलता प्राप्त करते हैं I परन्तु कभी- कभी अर्जित धन की हानि भी होती है I शेयर्स आदि में कभी- कभी अत्यधिक लाभ होता है I पुराणी सम्पत्ति अथवा पैतृक सम्पत्ति का उचित उपयोग नहीं कर सकते I स्वअर्जित धन से ही सम्पत्ति बनाते हैं परन्तु उससे आत्मसंतोष नहीं प्राप्त होता तथा न ही परिवार को संतुष्ट रख पाते हैं I विदेशों में सफलता प्राप्त होती है I पत्नी और संतान की ओर से प्राय: अशांत रहते हैं I
कुम्भ लग्न तथा कालसर्प योग

कुम्भ लग्न की जन्मकुंडली में कालसर्प योग अत्यन्त कष्टप्रद होता है तथा शुभ योग होने के उपरांत भी ऐसे व्यक्ति को सामान्य स्थिति से ही अपना जीवन प्रारम्भ करना पड़ता है I कई बार तो सफलता प्राप्त हो ही नहीं पाती I यदि ऐसा व्यक्ति परिश्रमी ओर पराजय न स्वीकार करने वाला हो, तो अंत में उसके प्रयास सफलता का स्वरुप ग्रहण करते हैं I संतान सुख मनोनुकूल नहीं होता I धार्मिक कृत्यों में रूचि के साथ- साथ विपरीत योनी की ओर सदा आकर्षण बना रहता है तथा अनेक बार संबंधों को लेकर अपमान ओर अपयश की स्थिति भी उत्पन्न होती है I दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं होता I कई बार शीर्ष स्थान पर पहुँचने के उपरांत भी आरोप लगते हैं तथा पदच्युति होती है I ऐसे व्यक्ति यदि चिकित्सा के क्षेत्र में होँ, तो उन्हें शल्यक्रिया करते समय अधिक सतर्कता रखनी चाहिए I संतान पक्ष की ओर से उनको बाल्यकाल से ही पर्याप्त दूरदृष्टि से कार्य लेना उचित होगा, क्योंकि प्राय: संतान समस्या का कारण बनती है I प्रेम विवाह होने पर भी वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता I सन्तति हानि अथवा सन्ततिहीनता के कारण गोद लेने की स्थिति भी होती है तथा गोद लिए हुए संतान से भी वांछित सुख नहीं प्राप्त होता I स्वार्थ का त्याग करके यदि कर्मयोग में विश्वास करते हुए परिश्रम करे, तो उन्हें अवश्य सफलता प्राप्त होती है I भले ही उस सफलता को प्राप्त करने में उन्हें कितना भी संघर्ष करना पड़े I अन्तत: उनका परिश्रम उन्हें विजयश्री प्रदान करता है I

मीन लग्न तथा कालसर्प योग

मीन लग्न के जातक की जन्मकुंडली में यदि कालसर्प योग की संरचना हो रही हो, तो नौकरी में पदोन्नति के समय आरोप लगते हैं तथा उसकी पदोन्नति न होकर उसके अधीनस्थ व्यक्ति पदोन्नति प्राप्त कर लेते हैं I ऐसे व्यक्ति के गुण ही उसके लिए अभिशाप बनकर उसके सामने आते हैं तथा दाम्पत्य जीवन प्राय: सामान्य रहता है परन्तु जीवनसाथी को दैहिक कष्ट बना रहता है I दूसरों की सहायता करता है तथा वही व्यक्ति उसी की आलोचना करते हैं I अनेक विषमताओं तथा प्रतिरोध के उपरान्त भी ऐसा व्यक्ति अपने गुणों का परित्याग नहीं कर पाता I यदि बुध और बृहस्पति एकदूसरे से युक्त होँ, तो कालसर्प योग यदि केंद्र में निर्मित हो रहा हो, तो खंडित हो जाता है तथा उस व्यक्ति की कालसर्प योग के अशुभ प्रभाव से रक्षा होती है I यदि बुध और बृहस्पति केन्द्रगत होँ तथा कालसर्प योग का निर्माण भी हो रहा हो, तो व्यक्ति के दो विवाह होते हैं अथवा अविवाहित ही रह जाता है I इस पर विचार करने के लिए अन्य ग्रह योगों पर भी विचार करना आवश्यक है I