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MadhuSudan Astro Group
राधा जी की स्तुति

राधे राधे गोविंद गोविंद राधे राधे I

श्री वृषभानुनंदिनी राधे,

नन्दनंदन गोविंद श्री राधे राधे I

प्रेम रूप रस रूपिणी राधे,

सोइ रूप नंदनंद श्री राधे राधे I

जोई वृषभानुनंदिनी राधे,

सोई जानिय गोविंद श्री राधे राधे I

महाभावरूपिणी श्री राधे,

रस अम्बुधि गोविंद श्री राधे राधे I

अलबेली सरकार राधे,

अलबेली गोविंद श्री राधे राधे I

श्री बरसानो राजति राधे,

नन्दगाम गोविंद श्री राधे राधे I

गहवर कुंजनि विहरति राधे,

गोवर्धन गोविंद श्री राधे राधे I

गोपिन संग विराजति राधे,

गोपन सँग गोविंद श्री राधे राधे I

वृन्दावन विहरति श्री राधे,

संग संग गोविंद श्री राधे राधे I

प्रेम रूप रस धन धन राधे,

गोधन धन गोविंद श्री राधे राधे I

आरत नाम पुकारत राधे,

भजत सुनन गोविंद श्री राधे राधे I

पतितन अपनावति श्री राधे,

निर्मल मन गोविंद श्री राधे राधे I

पायो मादन रस इक राधे,

नहिं पाये गोविंद श्री राधे राधे I

रस अम्बुधि रसिका श्री राधे,

रसिक रास गोविंद श्री राधे राधे I

कीन्यो कृपा दृष्टि जब राधे,

भे कृपालु गोविंद श्री राधे राधे I

श्री कृष्ण जी की आरती

आरती यशुमति शिशु की कीजे I

जय जय जय नंदनंदन की जै II

सुकृत कौन यशुमति अस तेरो I

जासो ब्रह्म भयो शिशु तेरो II

विधि हरि हरहुँ सेव्य शिशु तेरो,

स्वामि सखा सुत पति सोइ मेरो I

मोहिं अपनाय कृपा अस कीजै,

जय जय जय नंदनंदन की जै II

जगत पिता है यह शिशु तेरो,

मैं भी इक जग महँ शिशु तेरो I

भलो बुरो जैसो हूँ तेरो,

कोउ अवलंब और नहिं मेरो I

मोहिं कृपालु अपनो करि लीजै,

जय जय जय नंदनंदन की जै II

Jyotisham

II श्री: II

श्री गणेशगौर्य्यै नमः II श्री मधुसूदनाय नमः II श्री राधाकृष्णाभ्याम् नमः II 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़ चेतः I

यच्छ्रेयः स्यानिश्चितम ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेहम शाधि माम त्वां प्रपन्नम II

-अर्थात गीताजी के एकादश अध्याय में अर्जुन जी भगवन श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक होकर पूछ्तें हैं की प्रभो अनेक दोषों से भरे हुए स्वाभाव वाला मैं आपका शिष्य आपको गुरु रूप मानकर  आपसे अपने जीवन का मार्गदर्शन चाहता हूँ I
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ग्रहों और नक्षत्रों के इस अदभुत संसार में आपका स्वागत है..... मनुष्य की अपने भविष्य आने वाले कल को जानने की प्रबल इच्छा ने ज्योतिष शास्त्र को जन्म दिया, क्योंकि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है I आकाश मंडल में अनंत- अनंत दूरी तक फैले हुए रात्रीकालीन आकाश- तारे- ग्रह- उल्कापिंडों को देखते हुए मनुष्य ने पाया की संसार के सभी पदार्थ यथा समुद्र- नदी- पर्वत- वृक्षों आदि की भांति ये मनुष्य भी कालचक्र और इन ग्रह नक्षत्रों की रश्मियों से बंधा हुआ किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत हुआ संसार के तमाम कर्म करता है I बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जिनको मनुष्य अपनी इच्छा के न होते हुए भी करता है और अनुकूलता और प्रतिकूलता के भंवर में हिलोरे खाता है, इसी को हमनें प्रारब्ध, भाग्य या कर्मफल का नाम दिया I नित्यप्रति हम अपने आसपास के संसार में देखते हैं की एक व्यक्ति तो बिना मेहनत के भी दुनिया के सर्वोत्तम सुखों का उपभोग कर रहा है, दूसरी ओर एक व्यक्ति पहाड़ को तोड़ने जैसा कठोर परिश्रम करके भी अभावों में जी रहा है I एक शहर में दो बच्चे पैदा हुए एक करोडपति के यहाँ एक गरीब के यहाँ, अभी दोनों बच्चों ने कोई कर्म नहीं किया फिर भी एक को विरासत में श्रेष्ठ धन, ऐश्वर्य, उत्तमविद्या, बढ़िया संसाधन प्राप्त हो जाते हैं, दुसरे की झोली में योग्य होते हुए भी अभाव और विपदाएं प्राप्त होती हैं I बस इसी कारण को जाननें का विज्ञान है ज्योतिष I यह विज्ञान हमें भाग्यवादी बनने को नहीं कहता अपितु हमारे जीवन में घट रही घटनाओं का कारण बताकर श्रेष्ठ कर्मों की तरफ प्रवृत करता है ताकि हम अपने भविष्य को बदल सकें I जैसे मौसम वैज्ञानिक समुद्र से उठ रहे तूफानों को सैटेलाईट से देखकर उसके मार्ग में पडनें वाले शहरों को सूचित करके भारी विपदा से बचा सकता है I संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद कहे गए हैं I
उस वेद के छः अंग हैं :-
1. शिक्षा                                                2. कल्प                                       3. व्याकरण
4. निरुक्त                                               5.  छन्द                                       6. ज्योतिष
इन छः अंगों में ज्योतिष नेत्रस्वरूप है, जैसे शरीर में आँखें देखनें का काम करती हैं ऐसे ही ज्योतिष शास्त्र भी आपके जीवन के बीते हुए कल, आज और आने वाले कल को देखने का साधन है इसीलिए कहा गया है कि II वेदस्य निर्मलं चक्षु: ज्योतिष शास्त्रमकल्मषम II ज्योतिष एक वैज्ञानिक चिंतन है I वह यह कहता है की आपका भविष्य आपके अतीत से निकलेगा I आपके पूर्वजन्म से इस जन्म का भाग्य बना है और इस जन्म से आप अपना अगला जन्म बनायेंगे I सबके बीच एक कड़ी है और एक बार हम अपने वर्तमान का कारण ढूँढ पाएं तो उसका निवारण भी कर सकते हैं और यह ज्योतिष से ही संभव है I
भारतीय ज्योतिष शास्त्र के तीन भेद हैं:-
1. सिद्धांत
2. संहिता
3. होरा
आम आदमी की भाषा में ज्योतिष दो प्रकार का है:-
  • गणित ज्योतिष
  • फलित ज्योतिष
गणित ज्योतिष में ग्रहों की गति, अवस्था के आधार पर पंचांग और कुंडली का निर्माण होता है I ये हमारे जीवन की घटनाओं को जानने के लिए एक्सरे का काम करती है I एक्सरे स्पष्ट होगा तभी डाक्टर के लिए इलाज करना आसन एवं संभव होगा I
फलित ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति, समाज, राष्ट्र या विश्व का फलादेश किया जाया है अर्थात उनके भविष्य में झाँका जा सकता है I
अतः कुलमिलाकर ज्योतिष मानव जीवन के कल्याण का एक श्रेष्ठतम साधन है और इसी परिपेक्ष्य में हम आपके लिए इस "ज्योतिष विभाग" को लेकर प्रस्तुत हुए हैं जिसमें आप हमारी संस्था के कुशलतम ज्योतिषीयों से परिवार के बड़े सदस्य की तरह हर प्रश्न, समस्या का छलरहित, श्रेष्ठ समाधान प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को कष्ट रहित बना सकते हैं I इसके लिए नीचे आपको अपना विवरण देना है और अपनी जिज्ञासाएं, अपने प्रशन लिखकर SEND KE OPTION दबाना है - इसके लिए आपको मात्र Rs.250/- का शुल्क अदा करना है I
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प्रणाम पंडित जी,

सबसे पहले आपका बहुत हार्दिक धन्यवाद आपकी कृपा से मेरी बिटिया का विवाह बहुत ही अच्छे घर मे हो गया है I आप अपना आशीर्वाद बनाये रखें I नाम: Mrs. Nagpal

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भक्ति से मुक्ति

भक्ति के लिए जरुरी है अपने प्रभु पर भरोसा वह भी अटूट I भक्ति में चाहिए एक दम निष्कपट मन और भाव अगर भावना उच्च स्तर की नहीं हुई तो क्या फायदा ऐसी भक्ति का I इस विषय में कथा है एक किसान था जो भगवन शिव का अनंत भक्त था जब भी उसे समय मिलता अपना नित्यकर्म करता हुआ खेतों में काम करते समय भी उनको याद करता रहता था I एक दिन इसी तरह प्रभु का भजन कर रहा था तो आकाश मार्ग से जाते हुए नारद जी के कानों में उसके करुणामयी भजन की आवाज़ पड़ी और वे उसके पास चले आये I किसान नारद जी को देख कर बहुत हर्षित हुआ उन्हें प्रणाम करने लगा तब नारद जी बोले की ये तुम किसका भजन कर रहे हो तब किसान बोला की मैं अपने इष्ट देव भगवान भोले नाथ का भजन गा रहा था मैं तो बस उन्ही के दर्शनों की आस लगाये बैठा हूँ की कब बाबा भोले नाथ के दर्शन होंगे और मेरा जीवन सफल होगा I यह सुनकर नारद जी नें किसान को बताया की वे कैलाश पर्वत पर भोले नाथ से मिलने जा रहे हैं और कहा की मैं उनसे पूछुंगा की वे तुम्हारी मुराद कब पूरी करेंगे I तत्पश्चात नारद जी कैलाश पर्वत पहुंचे और भोले नाथ जी को उस भक्त का वृतांत सुनाया और बताया की हे भगवन आपका एक भक्त जो दिन रात आपकी सेवा में लगा रहता है और वो जानना चाहता है की आप उसको दर्शन कब देंगे यह सुनकर शिव जी बोले की हे नारद उस किसान के खेत में एक पीपल का वृक्ष है और उसमे जितने पत्ते उगे हैं उतने जन्मों के बाद उसकी तपस्या सफल होगी और वह मेरे दर्शन कर सकेगा यह सुनकर नारद जी ने वापिस आकर उस किसान को सारा वृतांत बतलाया I यह सुनकर किसान बहुत खुश हुआ और नाचने लगा, किसान को नाचता हुआ देखकर नारद जी बहुत विस्मित हुए और किसान से पूछने लगे की अरे भाई इसमें नाचने वाली कौन सी बात है अभी तो हजारों जन्म लेने के बाद ही तुम्हे भोले नाथ के दर्शन होंगे, इसपर किसान बोला की यह तो पता चल गया न की हजारों जन्मों के बाद ही सही भगवान मुझे दर्शन तो देंगे ना यह क्या कम है? किसान का यह कहना था और इधर बाबा भोलेनाथ उसके सम्मुख प्रकट हो गए यह देखकर नारद जी बोले प्रभु जब आपने अभी दर्शन देने थे तो मुझसे झूठ क्यूँ बुलवाया? इस पर प्रभु बोले की हे नारद मैंने तुमसे झूठ नहीं बोला था मेरे इस भक्त को मेरे दर्शन उतने ही जन्मों के बाद होते लेकिन तुम तो जानते ही हो की जैसे ही मुझे मेरे भक्त में सच्ची भक्ति की भावना उमड़ती दिखाई देती है फिर मैं कहाँ रुकने वाला हूँ I मैं तो भाव का भूखा हूँ और इस किसान की सच्ची, निष्कपट और उच्च कोटि की भक्ति भावना को देखकर मैं बस खिंचा चला आया I मैं तो बस भक्त के अधीन रहता हूँ I इसे कहते हैं सच्ची भक्ति जिसमें हो निष्पाप मन, जिसमें हो भावना की उच्चता, जिसमें हो सम्पूर्ण विश्वास और भरोसा I भक्ति का अर्थ है अंतरात्मा में दिव्य भावनाओं का अनवरत प्रवाह I परम सत्ता से अपने अनन्य प्रेम का स्मरण I सच्चा भक्त मात्र ईश्वरीय ध्यान- छवि को प्यार नहीं करता अपितु ब्रह्माण्ड में व्याप्त ईश्वरीय सत्ता से प्राणी मात्र से अनन्य आत्मीयता भरा प्रेम सम्बन्ध प्रस्थापित कर लेता है तथा यह प्रेम भावना पग-पग पर करुणा, उदारता, सदभावना, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा, सज्जनता के रूप में प्रकट होती रहती है I

कैसे होँ देवगुरु बृहस्पति आपके लिए अनुकूल
देवगुरु जैसे विशिष्ट सम्मान और पद से विभूषित बृहस्पति का ग्रह परिषद् में महत्वपूर्ण स्थान है I इन्हें विद्या, ज्ञान, प्रतिष्ठा एवं सम्मान का करक माना जाता है I पुराणों के अनुसार इनका रथ सूर्य के सामान द्युतिमान है I यह स्वर्ण के सामान पीत वर्ण का है I पीले रंग के आठ घोड़े इस रथ में जुते हुए हैं, जो कि वायु के वेग के समान चलने वाले हैं I ब्रिहस्प्ती देवता के शरीर का वर्ण पीला है I इन्होनें पीले रंग के ही वस्त्र धारण किये हुए हैं I इनके चर हाथों में स्वर्ण निर्मित दण्ड, रुद्राक्ष कि माला, वरदमुद्रा और अभयमुद्रा स्थित हैं I स्कन्दपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार बृहस्पति ने पवित्र प्रभास नमक तीर्थस्थल में जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी I उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर ही शिव ने इन्हें देवताओं का गुरु और ग्रह परिषद् का प्रमुख अधिकारी बनाया I जिस प्रकार अन्तरिक्ष में बृहस्पति का भौतिक पिण्ड अत्यन्त विशाल है, उसी प्रकार बृहस्पति का परिवार भी बहुत विशाल है I इनके परिवार में तारा और शुभा नमक दो पत्नियाँ हैं I शुभा से इन्हें सात कन्याएँ उत्पन्न हुई जिनके नाम भानुमती, राका, अर्चिष्मती, महामती, महिष्मती, सिनीवाली और हविष्मती हैं I तारा से इन्हें सात पुत्र एवं स्वाहा नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई I देवगुरु बृहस्पति के उतथ्य नाम का एक बड़ा भाई और संवर्त नाम का एक छोटा भाई भी है I इनकी एक बहिन भी है, जिसका नाम वरस्त्री है I इनके अधिदेवता इन्द्र और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं I ज्योतिष के अनुसार पीले रंग की वस्तुओं पर गुरु का आधिपत्य होता है I इसे सर्वाधिक शुभ ग्रह माना जाता है I इसकी दृष्टि अमृतमयी मानी जाती है और सर्वविध कल्याणकारी होती है I शरीरावयवों में चर्बी एवं श्रोत्रेन्द्रियों पर इनका अधिकार होता है I शुक्ल पक्ष एवं उत्तरायण में विशेष बली होता है I यह धनु एवं मीन राशियों में स्वराशिगत, कर्क राशि में 5 अंश पर परमोच्च और धनु राशि के 10 अंश तक मूल त्रिकोण माना जाता है I एक राशि में यह लगभग एक वर्ष तक रहता है विंशोत्तरी महादशा के अनुसार पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों पर इसका अधिकार होता है I इसकी विशोंत्तरी महादशा 16 वर्ष तक चलती है I यदि गुरु लग्नेश होकर अथवा लग्न भाव में स्थित होकर व्यक्तित्व का करक बने, तो जातक लम्बी- चौड़ी कद- काठी वाला, गौर वर्ण वाला, गम्भीर प्रकृति वाला, भूरे बालों वाला और बुद्धिमान होता है I
गुरु के कारकत्व

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार गुरु को निम्नलिखित का करक माना जाता है : पुरुषसंज्ञक, आकाश तत्त्व, सत्वगुण, चर्बी अथवा मॉस, कोषागार, मीठा रस, पूर्व दिशा अथवा लग्न, फलदार वृक्ष, पीला वस्त्र, जीव संज्ञा, ब्राह्मण, शिक्षक, ज्योतिष, कर्मकांड, कर्तव्य, गाय, सेना, धन, मीमांसा शास्त्र, बड़ा शरीर, प्रताप, कीर्ति, पुत्र, पेट सम्बन्धी बीमारी, दादा- परदादा आदि पूर्वज, महल, बड़ा भाई, शिशिर ऋतु, तर्क, रत्न व्यापारी, परोपकार, राजा अथवा राज्य की ओर से सम्मान, छाती, देवता, तप, दान- धर्म, गोलाई, पीला रंग, व्याख्यान शक्ति, मित्र, मेद, नवीन घर, वृद्धत्व, तीर्थस्थान, विशिष्ट ज्ञान, सात्विकता, दूसरे के विचारों को भाँपने की कला, स्वर्णाभूषण, शिव की पूजा, बड़प्पन, वाणी अथवा स्वभाव की गंभीरता, अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी होना और अरिष्ट से रक्षा इत्यादि I

गुरु के अनुकूल होने के लक्षण
गुरु के अनुकूल होने पर जातक को उपर्युक्त वर्णित सभी क्षेत्रों एवं कारकों के संबंध में अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं, लेकिन यदि गुरु अनुकूल नहीं है, तो उक्त कारकत्व सम्बन्धी कार्यों में हानि भी प्राप्त हो सकती है I गुरु के अनुकूल होने पर सामान्यत: निम्नलिखित लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं :
 
1. ऐसे व्यक्ति को अध्ययन में अच्छी सफलता प्राप्त होती है I शिक्षा के क्षेत्र से उसका किसी प्रकार से जुडाव होता है और वह अपने जीवन में उच्च अध्ययन करता है I
 
2. ऐसे व्यक्ति के स्वर में गंभीरता होती है I उसमें स्वाभाविक रूप से समझाने की प्रवृत्ति पाई जाती है वह जो भी बात कहता है, वह अत्यन्त विस्तृत रूप में कहता है I
 
3. ऐसा व्यक्ति बहुत महत्त्वाकांक्षी होता है I उसके ख्वाब बहुत ऊँचे होते हैं और उन्हें पाने के लिए वह सदैव प्रयासरत रहता है I
 
4. गुरु के अनुकूल होने पर प्राय: व्यक्ति का रंग गोरा होता है I दादा अथवा अन्य बड़े व्यक्तियों से उसके अच्छे संबंध रहते हैं और वयोवृद्ध व्यक्तियों से उसे स्वत: ही लगाव होता है I
 
5. ऐसे व्यक्तियों में सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा धार्मिकता अधिक होती है I इनका अध्ययन भी किसी ना किसी अध्यात्म, दर्शन अथवा धार्मिक विषयों से जुड़ा हुआ होता है I इतना ही नहीं ज्योतिष, वेद, कर्मकाण्ड आदि विषयों की ओर इनकी रूचि होती है I
 
6. ऐसे व्यक्ति बड़े अथवा सम्मिलित परिवार में रहते हैं और इन्हें कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है I
 
7. ऐसे व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से बड़ा पद अथवा सम्मान प्राप्त होता है I राजनीति में ये विशेष रूप से सफल होते हैं और लोग इनसे सलाह लेकर कार्य करना पसंद करते हैं I
 
8. ऐसे व्यक्तियों की वक्तृत्व शक्ति बहुत अच्छी होती है I सूँघने की क्षमता अच्छी होती है और इनके शरीर पर प्राय: चर्बी थोड़ी अधिक होती है I
 
9. गुरु के अनुकूल होने पर पीले रंग की ओर आकर्षण होता है और यह रंग भाग्यशाली भी सिद्ध होता है I इसके अतिरिक्त गुरुवार के दिन रुके हुए कार्य भी बन जाते हैं I
गुरु के प्रतिकूल होने के लक्षण

गुरु के अनुकूल होने पर उपर्युक्त लक्षण प्रतीत होते हैं और जब गुरु जन्मपत्रिका में अशुभ स्थिति में होता है, तो निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं :

1. ऐसे व्यक्तियों को गुरु की महादशा- अन्तर्दशा प्रारम्भ होने पर मानसिक चिंता, आर्थिक हानि, स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी इत्यादि फल प्राप्त होते हैं I

2. ऐसे व्यक्ति की शिक्षा में अकारण एवं आकस्मिक रूप से अनेक बाधाएँ आती हैं I कई बार तो शिक्षण कार्य बीच में ही बंद हो जाता है I

3. ऐसे व्यक्ति की वृद्ध व्यक्तियों से कम ही बनती है और उसके दादा अथवा अन्य बड़े- बूढ़े व्यक्ति उससे अधिकांशत: नाराज ही रहते हैं I

4. ऐसे व्यक्ति के जीवन में सम्मान की कमी होती है I वह कोई अच्छा कार्य करे, तो भी उसका यश उसे नहीं मिलकर किसी और को मिल जाता है 

5. ऐसे व्यक्ति को सूजन सम्बन्धी, किडनी सम्बन्धी अथवा ऐसी बीमारियाँ, जिनमें मोटापा बढ़ जाता हो, डायबिटीज इत्यादि अधिक होते हैं I

6. ऐसा व्यक्ति यदि शिक्षण कार्य करने लग जाए, स्वयं का स्कुल चलाने लागे अथवा धार्मिक क्षेत्र से संबंधित कोई कार्य करे, तो उसे इसमें हानि की प्राप्ति होती है I

7. गुरु के प्रतिकूल होने पर ब्राह्मण जाति के व्यक्तियों से अथवा साधु- सन्यासियों से वैरभाव हो जाता है अथवा उनके कारण जातक को किसी प्रकार का कष्ट उठाना पड़ जाता है I

बिना जन्मपत्रिका जानें गुरु शुभ है अथवा नहीं
गुरु की शुभता अथवा अशुभता का निर्धारण जन्मपत्रिका में स्थिति के आधार पर किया जाता है, लेकिन अनेक व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जिनकी जन्मपत्रिका बनी हुई नहीं होती है अथवा उसके सही होने में सन्देह होता है I ऐसी स्थिति में निम्नलिखित लक्षणों को देखकर किसी जातक के लिए गुरु अशुभ है अथवा नहीं, इसका निर्धारण किया जा सकता है I यदि निम्नलिखित में से एक से अधिक लक्षण देखने में आएँ, तो समझना चाहिए कि गुरु अशुभ फलदायक सिद्ध हो रहा है :
 
1. ऐसे व्यक्तियों को अध्ययन में प्राय: अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है I कई बार तो फल प्राप्ति के समय अर्थात परीक्षा के समय ही वह बीमार हो जाता है अथवा अन्य किसी बाधा का आने के कारण वह परीक्षा नहीं दे पाता है I
 
2. ऐसे व्यक्तियों को जीवन में कई बार अपयश का सामना भी करना पड़ जाता है I
 
3. गुरु के अशुभ होने पर पुत्र से प्राय: वैचारिक मतभेद ही होते हैं I यह भी हो सकता है कि विवाह होते ही पुत्र पिता से अलग रहना प्रारम्भ कर दे I
 
4. इस स्थिति में खाया हुआ अच्छे से अच्छा खाद्य पदार्थ भी शरीर को नहीं लगता है और अधिकतर ऐसे व्यक्ति दुर्बल शरीर वाले ही रहते हैं I
 
5. ऐसे व्यक्ति जैसे ही साधु- संतों की सेवा के कार्य में लगते हैं, उसका भाग्य विपरीत हो जाता है और उसे लाभ के स्थान पर हानि ही प्राप्त होती है I
 
6. सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार गुरु के अशुभ होने पर व्यक्ति की चोटी के स्थान के बाल कम आयु में ही झड जाते हैं I
 
7. गुरु के प्रतिकूल होने पर व्यक्ति को सदैव माला पहनकर रहने की आदत पड़ जाती है I
 
8. स्वर्ण से संबंधित कार्य में ऐसे व्यक्तियों को नुकसान की प्राप्ति होती है I यह भी हो सकता है कि स्वर्ण से बना कोई बहुमूल्य आभूषण खो जाए I
गुरु को अनुकूल करने के उपाय
गुरु की अशुभता से उत्पन्न दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए उपचार ज्योतिष की सहायता ली जा सकती है I तंत्र- मन्त्र- टोटके आदि की सहायता से गुरु की अशुभ स्थिति को भी अनुकूल किया जा सकता है और उसके शुभ परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं I यहाँ सभी प्रकार के जातकों के लिए गुरु की कृपा प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय दीये जा रहे हैं I
  •  गुरु के अशुभ होने पर निम्नलिखित में से किसी एक मन्त्र का जप कर इसे अनुकूल किया जा सकता है :
गुरु का तांत्रिक मन्त्र :     ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नमः I (जप संख्या 19000)
गुरु गायत्री मन्त्र :          ॐ अन्गिरसाय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नो जीव: प्रचोदयात I (जप संख्या 108 बार प्रतिदिन)
गुरु का वैदिक मन्त्र :    ॐ बृहस्पतेअतियदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु I यद्यीदयच्छवस ऋतप्प्रजात तदस्मासुद्रविणंधेहिचित्रम II (जप संख्या 108 बार प्रतिदिन)
गुरु का पौराणिक मन्त्र : ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरुं कान्चनसन्निभम I बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं गुरुं प्रणमाम्यहम II (जप संख्या 108 बार प्रतिदिन)
गुरु का बीजयुक्त मन्त्र :  ॐ बृं बृहस्पतये नमः I (जप संख्या 108 बार प्रतिदिन)
  • गुरु के अशुभ स्थिति में होने पर बृहस्पति स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए I इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बृहस्पति कवच का नित्य पाठ करने पर भी बृहस्पति अनुकूल रहता है और शुभ फल प्रदान करता है :
सर्व प्रथम हाथ में जल लेकर निम्नलिखित विओनियोग का पाठ करें :
विनियोग : ॐ अस्य श्रीबृहस्पति कवचस्य इश्वर ऋषि:, अनुष्टुप छन्द:, देवगुरु श्रीबृहस्पति: देवता, गं बीजं, श्रीं शक्ति:, क्लीं कीलकं बृहस्पति पीड़ा शमनार्थे पाठे विनियोग: I
अब हाथ में लिया हुआ जल सामने किसी पात्र में अथवा भूमि पर छोड़ दें I अब निम्नलिखित कवच का पाठ करें :


अभीष्ट फलदं देवं सर्वज्ञं सुर पूजितम I
अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम I I
बृहस्पति: शिर: पातु ललाटं पातु मे गुरु: I
कर्णौ सुरगुरु: पातु नेत्रे मे अभीष्टदायक: I I
जिव्हाम पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारग: I
मुखं मे पातु सर्वज्ञो कंठं मे देवता गुरु: I I
भुजौ अन्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रद: I
स्तनौ मे पातु वागीश: कुक्षिम मे शुभलक्षण: I I
नाभिं देवगुरु: पातु मध्यं पातु सुखप्रद: I
कटिं पातु जगद्वंद्य: ऊरु मे पातु वाक्पति: I I
जानु जंघे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा I
अन्यानि यानि चांगानी रक्षेन्मे सर्वतोगुरु: I I
इत्येतत कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर: I
सर्वान कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत I I
 
* गुरु के दान : गुरु की महादशा- अन्तर्दशा के शुभ फल प्राप्त करने के लिए अथवा गुरु के अशुभ फलों को दूर करने के लिए 11 गुरुवार को सवा किलो अथवा सवा पाव गुड, सवा पाव चने की दाल, केले का फल, पीला पुष्प, पीला चन्दन, कांसा धातु, खांड, पीला वस्त्र, हल्दी, धार्मिक पुस्तकें, पीले रंग की कोई मिठाई एवं घी ब्राह्मण को दान करना चाहिए I
 
* गुरु के लिए वनस्पति : गुरु की कृपा प्राप्ति के लिए शुक्ल पक्ष के गुरुवार को केले के पेड़ की जड़ पीले रंग के वस्त्र में बांध कर दाहिनी भुजा में धारण करें I ध्यान रहे की जड़ निकालने से पहले एक दिन पूर्व इसे निमंत्रण दें और पंचोपचार से इसकी पूजा करें I
 
* अन्य उपाय : इन उपायों के अतिरिक्त अन्य उपाय भी गुरु को अनुकूल करने के लिए किये जा सकते हैं :
 
1. ब्राह्मणों को भोजन : सात गुरुवार को 11 ब्राह्मण कुमारों को बेसन के लड्डू एवं केसर मिश्रित खीर का भोजन करवाएं I
 
2. यदि गुरु की महादशा- अन्तर्दशा अधिकतर अशुभ रहती हो, तो ऐसे व्यक्ति को यथा संभव दादा अथवा अन्य वृद्ध जनों को प्रसन्न रखना चाहिए I
 
3. गुरुवार का व्रत : गुरु को अनुकूल करने के लिए गुरुवार का व्रत करना शुभ रहता है I यह व्रत यदि शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से प्रारम्भ किया जाए, तो उत्तम है I कम से कम 16 अथवा 3 वर्ष तक यह व्रत करना चाहिए I व्रत के दिन पीले रंग के पुष्पों से अपने आराध्य का पूजन- अर्चन करने के पश्चात चने अथवा बेसन से बनी मिठाई आदि का उन्हें भोग लगायें और भोजन में स्वयं भी इन्हें ही लें I अंतिम गुरुवार को लघु हवन के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन तथा दक्षिणा आदि प्रदान करें I ध्यान रहे की व्रत के दिन भोजन से पूर्व गुरु के पूर्वोक्त मंत्रों में से किसी एक मन्त्र का जाप करें और भोजन में बिना नमक की ही वस्तुएं ग्रहण करनी है I
 
4. गुरु को अनुकूल करने के लिए नवरात्र, होली, शिवरात्रि, दीपावली अथवा अन्य किसी शुभ मुहूर्त में अपने पूजा स्थल में बड़ा दक्षिणावर्ती शंख, बृहस्पति यंत्र एवं हल्दी की माला स्थापित करें I गुरु हेतु जप इसी की माला से करने चाहिए I
 
5. यंत्र प्रयोग : यंत्रों के प्रोयोगों से भी गुरु की कृपा प्राप्त की जा सकती है I इस हेतु गुरु यंत्र को गुरुवार को धारण करें I
 
6. रुद्राक्ष धारण : गुरु ग्रह को अनुकूल करने के लिए किसी शुभ मुहूर्त में पाँच मुखी रुद्राक्ष की छोटे दानों से बनी माला अथवा पाँच मुखी रुद्राक्ष पीले रंग के धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए I
 
7. गुरु की अनुकूलता हेतु तांत्रिक स्नान : गुरु को विशेष स्नान के माध्यम से भी अनुकूल किया जा सकता है I इस हेतु स्नान के जल में थोडा गुड, हल्दी, शक्कर, नमक, शहद, सफ़ेद सरसों, मुलैठी, पीले पुष्प, स्वर्ण आभूषण इत्यादि डालने चाहिए I इनमें से जो वस्तुएं काम में आ सकें यथा स्वर्ण आभूषण आदि को स्नान के पश्चात धोकर रख देना चाहिए और अगले दिन पुन: इसी प्रकार से उपयोग में लेना चाहिए I
 
8. गुरु ग्रह को अनुकूल करने के लिए गुरुवार से प्रारम्भ कर प्रतिदिन अथवा प्रत्येक गुरुवार को चने की दाल कबूतरों अथवा गाय को जल में भिगोकर खिलानी चाहिए I
 
9. भोजन में विशेष : गुरुवार के दिन भोजन में विशेष रूप से पीले रंग की वस्तुएं, बेसन के लड्डू, केसर मिश्रित खीर को शामिल करके भी गुरु के अनुकूल फल प्राप्त किये जा सकते हैं I
 
10. गुरु ग्रह को अनुकूल करने के लिए अपने इष्ट देवता की हल्दी अथवा स्वर्ण से बनी प्रतिमा को पूजा स्थल में स्थापित करना चाहिए I
 
11. गुरु को अनुकूल करने के लिये ज्योतिषीय परामर्श से शुभ मुहूर्त में पुखराज रत्न अथवा उसका उपरत्न धारण किया जा सकता है I
 
12. यदि गुरु जन्म पत्रिका में नीच राशिगत हो, तो गुरु से संबंधित वस्तुएं अथवा पीले रंग की वस्तुएं उपहार में अथवा दान में नहीं लेनी चाहिए I
 
13. गुरु को शीघ्र अनुकूल करने के लिए गुरुवार के दिन पीपल की समिधा (लकड़ी) से गुरु मन्त्र का उच्चारण करते हुए 108 बार आहुति देनी चाहिए I
 
14. प्रत्येक गुरुवार को विष्णु सहस्त्रनाम, गुरु कवच, विष्णु पुराण, भागवत आदि का वाचन करना चाहिए I
 
15. प्रत्येक गुरुवार के दिन अपने इष्ट देवता को पीले रंग के पाँच पुष्प चढाने चाहिए I
 
16. गुरु को अनुकूल करने के लिए मार्ग में पीपल का वृक्ष लगायें और बड़ा होने तक उसकी सार- सँभाल करें I
 
17. सात गुरुवार तक घोड़े को चने की दाल खिलाएं I
गुरु को अनुकूल करने के लिए लाल किताब के टोटके

1. भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के पश्चात प्रतिदिन नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं I

2. साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा- अर्चना करें I

3. गुरुवार को स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें I

4. पीले रंग के पुष्पों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें I

5. गुरुवार के दिन केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर मे लगाएं I

6. गुरुवार के दिन साबुत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें I

7. शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएँ और साधु- संतों का अपमान नहीं करें I

8. जिस पलंग पर आप सोते हैं उसके चारो कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं I

9. शुभ मुहूर्त में किसी धार्मिक स्थल पर गुप्त दान करें I

10. गुरुवार से प्रारम्भ कर पीपल के वृक्ष की जड़ में थोडा जल, चने की दाल एवं पीले रंग की कोई मिठाई चढाने से भी बृहस्पति अनुकूल रहता है I

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