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DIVINE SPEECH

  
 
संसार वैसा ही है जैसा हम सोचते हैं
संसार वैसा ही है जैसा हम सोचते हैं I अपने ही अंदर के भावों की प्रतिच्छाया ही बाहर देखते हैं I हम जो भी देखते या करते हैं, वह पानी के ऐसे गिलास की तरह है, जो आधा भरा हुआ है और आधा खाली I अगर हम निराशावादी हैं और केवल किसी बात का नकारात्मक पक्ष देखते हैं, तो संसार के प्रति हमारा दृष्टिकोण भी आनन्द रहित होगा I और यदि हम आशावादी हैं तो हमें चारों तरफ सब कुछ सकारात्मक दिखाई देगा I 
एक बार महान दार्शनिक सुकरात एथेंस के द्वार के बहर बैठे थे, तभी एक व्यक्ति नें उनके पास आकार पूछा " में सोचता हूँ की यहाँ आकार रहने लगूँ I क्या आप बता सकते हैं की यहाँ के लोग कैसे हैं ? सुकरात नें उत्तर दिया- तुम्हें यहाँ के बारे में बता कर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी, परन्तु यह बताओ की तुम्हारा पहला आश्रय कैसा था? वह व्यक्ति बोला- ओह, बिलकुल बकवास I वहां के लोग पीछे से वार करते हैं, जीना दूभर हो गया था I सुकरात थोडा उदास होकर बोले, तब तो आप कहीं और चले जायें, यहाँ भी वैसे ही लोग हैं I 
थोड़ी देर में वहीँ एक और व्यक्ति आया I उसने भी पहले व्यक्ति जैसा प्रश्न सुकरात से पूछा I सुकरात ने भी पहले की तरह प्रश्न दोहराया की उसका पहला आश्रय स्थल कैसा था ? वह व्यक्ति मुस्करा कर बोला, वहाँ के लोग बहुत ही स्नेही हैं, वहाँ का वातावरण बहुत ही स्वस्थ है I सब एक दूसरे का आदर, सहायता करते हैं I सुकरात ने कहा, मित्र ! एथेंस में तुम्हारा स्वागत है, यहाँ भी वैसा ही वातावरण है I 
बहुत सी स्थितियों का सीधा सम्बन्ध हमारे अपने व्यवहार से है I दूसरों के साथ हमारे कैसे सम्बन्ध हैं, हमारे अन्दर कैसी भावनाएँ हैं, मित्रों, परिवारजनों या अपने सहकर्मियों से हम खुद कैसा व्यवहार करते हैं I हम दूसरों के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखते हैं वह भी कुछ हद तक हमारे अंदर की सोच का नतीजा है I साधारणतया हम दूसरों को या दुनिया को हर बात के लिए दोषी ठहराते हैं I जिस वस्तु को हम यथार्थ समझते हैं, वह केवल हमारी अपनी धरनों व विचारों का ही निकास है I जो कुछ भी हम देखते हैं, सुनते हैं, अनुभव करते हैं, छूते हैं, सूंघते हैं, वह सब हमारे अन्दर का ही प्रतिबिम्ब है I व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है I जिन विचारों, विश्वासों, अनुभवों आदि की ओर हम आकर्षित हो रहे हैं, वे हमारे अपने ही विचारों, विश्वासों का नतीजा है और उन्हें हमें स्वयं ही संयमित करना होगा I जो व्यक्ति यह सोचता है की वह किसी काम का नहीं है, उसमें कोई योग्यता नहीं है, तो उसे वैसा ही प्राप्त भी होगा और वह जो कुछ भी कहेगा, वह महत्वहीन साबित होगा I जब हम यह सोचते हैं की हम कुछ उंचा या अच्छा लक्ष्य प्राप्त कर सकते है, तब कुछ न कुछ पा सकते हैं I समय बीतने के साथ वह विश्वास स्वत: हमारे हर काम में झलकेगा I हम आगे बढ़ते जाएंगे और आदर सम्मान पाते रहेंगे I 
हमारा मस्तिष्क विचार पैदा करने वाली वर्कशाप है, जिसमें दिन भर अनगिनत विचार पैदा होते रहते हैं I हमें केवल अपना आत्म- अविष्कार करना होता है और एक सकारात्मक रह पर चलने का निश्चय करना होता है I 
हमारे विचार, हमारी सोच हमारे जीवन पर घर प्रभाव छोड़ते हैं I अगर वे नकारात्मक हैं तो वे हमें असंतोष और असफलता की ओर ले जाते हैं I हमारे अपने अंदर के भाव जैसे होंगे उसके अनुरूप वे हमारे इर्द गिर्द वातावरण बना लेंगे I कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी बन जाती हैं, जब हम दुःख प्राप्त करते हैं, पर अपने नकारात्मक विचारों से हम उस दुःख को और बढ़ा लेते हैं I जो कुछ हम चाहते हैं वह है नहीं और जो है उससे हम संतुष्ट नहीं I हम इसलिए दुखी हैं की हम अब जिस स्थिति में हैं उससे अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए छटपटाते रहते हैं I जब हमारा मन शांत, संतुलित, स्वस्थ और सकारात्मक होगा, हम जहाँ भी जाएँगे, प्रसन्नता और शांति बिखेरेंगे I 
 
आंधियों से लड़ने का संदेश देता है दीप
आज पहले दीप के बारे में बताता हूँ I किसी मंगल कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व दीप जलाने का विधान है I जैसी- जैसे सभ्यता का विकास हुआ,  वैसे- वैसे दीप के रूप में बदलते गए I अब ये सोने से लेकर अन्य सभी धातुओं के बनने लगे हैं, हीरे जड़े दीप भी होते हैं, लेकिन पहला दीप जो इस संसार में जला, वह माटी का ही था I माटी के उस दीप ने हम सबको यह संदेश दिया की मैं माटी का दीप हूँ, प्रकाशित होने जा रहा हूँ और तुम भी माटी के ही दीप हो, इसलिए प्रकाशित होकर धरती पर रहना I 
वह हमें बताता है कि मैं बहुत छोटा हूँ, तुम बहुत बड़े हो I लेकिन मैं केवल इसलिए जल रहा हूँ कि मेरा छोटा- सा प्रकाश, यदि तुम्हें थोड़ी भी प्रेरणा दे पाये, तो मेरा जलना सार्थक हो जायेगा I दीप अपने कर्तव्य का पूरी तरह से पालन करता है I वह जलता है, तो बुझता भी है I आप निश्चित मानिए कि किसी दीप को लाख प्रयत्नों से जलाकर रखने का यत्न किया जाये, लेकिन काल संसार में प्रत्येक दीप को बुझाता ही है I 
माटी का दीप थोडा-सा स्नेह लेकर, थोडा सा तेल लेकर जलता है और मानवता से कहता है कि मैं प्रकाश देने के लिए प्रस्तुत हूँ, जाग्रत हूँ, पुरुषार्थ कर रहा हूँ, अंधकार से लड़ रहा हूँ, प्रमाद को पराजित कर रहा हूँ  I है मानव ! मुझसे एक प्रेरणा लेना, तुम भी जलना अँधेरे के सामने, अन्याय के सामने अपने पुरुषार्थ के दीप को, अपने विवेक को निरन्तर प्रकाशित रखने का प्रयत्न करना I 
यह तो आप सब जानते ही हो कि माटी के दीप कि सीमा है I स्नेह उसे मिला, पर कितना मिल पाता है I रात लम्बी होती है I भोर होने तक वह टिमटिमाता रहता है, उसे बड़ी प्रसन्नता है कि मैं अब तक अँधेरे से लड़ता रहा I मैं थक रहा हूँ, लेकिन मुस्करा रहा हूँ , क्योंकि इतनी लम्बी लड़ाई लड़ी है I मेरे उस संघर्ष को देखकर ही उषा कि अरुणाई ने अपनी लालिमा चारों ओर बिखेरी है I अब यदि बुझ भी जाऊं तो कोई चिंता नहीं I बल- रवि कि लालिमा आश्वासन दे रही है - कर्तव्य की वेदी पर तुमने अपने प्राण चढ़ा दिए हैं I अब शेष लोग अपने कर्तव्य पालन के लिए अपने आप तुमसे प्रेरणा लेंगे I 
देखो पग- पग पर छल- बल से उस दीप को बुझाने का प्रयत्न संसार में होता है I ऐसा ही हमारे- तुम्हारे साथ भी होता है I यदि मनुष्य उस छल- बल से पराजित हो जाये तो वह मानवता की पराजय है I क्योंकि मानव तो परमात्मा का वह विजेता पुत्र है, जो काल से भी लड़कर अपने विवेक को जगाये रखने का प्रयत्न करता है, जो यमराज के द्वार पर नचिकेता बनकर प्रशन करता है I यदि किसी के विवेक का दीप जलता रहे, तो वह नचिकेता- भाव में जीकर यमराज से भी अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त सकता है I 
आँधी के कारण बहुत साधनापूर्वक सँजोया गया दीप पहले टिमटिमाता है, फिर संघर्ष करता है I तूफान और दीये की लड़ाई प्रसिद्ध है I वह बार- बार प्रज्ज्वलित रहने का प्रयत्न करता है I ऐसी ही आवश्यकता उस समय होती है जब हमारे अंतर का दीप विषय- वासनाओं की बयार चलने से टिमटिमाता है I 
आपने देखा होगा, बड़े- बड़े सम्मेलन और यज्ञों में दीप प्रकट किया जाता है, पुरोहित काँच की चिमनी से उसे ढक देता है की दीप बुझ न जाये, पर प्रकाश भी बाहर जाता रहे I जब वह ऐसा कर देता है तो बयार बहुत प्रयत्न करती है, लेकिन दीप बुझता नहीं और वह बड़े आनन्द के साथ जलता रहता है और प्रकाश देता है I इसी प्रकार से मेरा और आपका अंतर- दीप जल रहा हो, विषय- बयार चल रही हो, तब संतों के वचनों और उनके आशीर्वाद के कवच से अपने दीप को बचाने का यदि प्रयत्न कर लिया जाये तो माया रूपी झंझावात से हम अपने को बचा ले जाएंगे
बांसुरी वाले की कहानी औए जिन्दगी के वायदे
हरेक इन्सान की जिन्दगी में उंच- नीच आता है I हरेक की जिंदगी में कुछ ऐसे मौके आते हैं, जिनमें की तकलीफें बढ़ जाती हैं I महापुरुष हमें समझाते हैं की हर मौके पर धैर्य रखना है, प्रेम से काम करना है I ध्यान रखना है की हम अपने छोटे से फायदे के लिए सिद्धांतों को न छोड़ दें I 
एक बांसुरी वाले की रोचक कहानी है I एक शहर में चूहे बहुत हो गए I लोग सड़कों पर जायें, तो वहां चूहे देखें और घरों में भी चूहे धमा चौकड़ी मचाते दिखें I जिधर देखो, चूहे ही चूहे I वहाँ बीमारी शुरू हो गई I एक दिन शहर के लोग मिलके मेयर के पास गए और उससे कहा की आप कुछ करीये I उसनें भी अपनी तरफ से बड़ी तरकीबें की, पर चूहों की संख्या बढ़ती चली गयी I 
 
फिर मेयर नें घोषणा करवाई की अगर कोई आदमी हमें वह नुस्खा बताये, जिससे की चूहे यहाँ से चले जायें, तो हम उसे 1000 फ्लोरेंस देंगे I वहां की मुद्रा का नाम फ्लोरेंस था I  एलन के अगले ही दिन वहां एक आदमी कहीं बाहर से आया I उसने अजीब से कपडे पहने हुए थे I उसने मेयर से पूछा की अगर में इन चूहों को यहाँ से बाहर ले जाऊंगा, तो घोषणा के अनुसार क्या आप मुझे 1000 फ्लोरेंस देंगे ? मेयर ने कहा, हाँ, अगर सब चूहे चले गए तो तुझे 1000 फ्लोरेंस जरुर दे देंगे I 
 
अगले दिन सुबह वह आदमी पूरे शहर में घूम- घूम कर बांसुरी बजाने लगा I उसकी आवाज चूहों को ऐसी लगी, जैसे खाने के डिब्बे खुल रहे होँ I तो सारे चूहे उस आवाज के पीछे- पीछे जाने लगे I चलता- चलता वह शहर के बाहर आ गया I बाहर एक नदी बहती थी I बांसुरी बजाता हुआ वह नदी के अन्दर चला गया I तो उसके पीछे- पीछे सारे का सारे चूहे भी नदी के अंदर चले गए और डूब गए I 
जब सारे चूहे डूब गए, तो वह वापिस शहर आया और अपना मेहनताना माँगा I मेयर ने कहा तुमने तो कुछ किया ही नहीं, सिर्फ बांसुरी बजाई है I बांसुरी बजाने के लिए 1000 फ्लोरेंस कौन देता है ? बांसुरी वाले ने कहा, देखो, अभी मुझे उस शहर में जाना है, वहां पर बिल्लियों को हटाना है I उसके बाद एक अन्य शहर में जाकर वहां से बिछुओं को हटाना है I तो आप जल्दी से मुझे मेरे पैसे दे दीजिये I पर मेयर नें कहा की ये 50 फ्लोरेंस ले जाओ, तुमने तो खाली बांसुरी बजाई है, और कुछ किया ही नहीं I हम तो मजाक में बोले रहे थे की 1000 फ्लोरेंस देंगे I यह सुनकर बांसुरी वाला बहुत दुखी हुआ I अगले दिन उसनें फिर से बांसुरी बजानी शुरू की, किसी अलग तरह से और ऐसी बांसुरी बजाई की शहर में जितने भी बच्चे थे, सब खुश होकर उसके पीछे- पीछे चलने लगे I फिर वह शहर से बाहर निकला और एक पहाड़ की गुफा में चला गया और सारे बच्चे उसके पीछे चले गए और उसके बाद गुफा का दरवाजा बंद हो गया I 
इस कहानी से हमें कई चीजें समझने को मिलती हैं I एक तो यह की जब हम किसी से कुछ वादा करें, वह हमें अवश्य पूरा करना चाहिए, उसे निभाना चाहिए I हम सोचते हैं, हमारा काम हो गया, हम चालाकी कर लेते हैं I पर प्रभु की निगाह में किसी की कोई चालाकी नहीं चलती I हरेक बोल, हरेक कार्य, हरेक सोच का हमें भुगतान करना है I हम लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से घिरे हुए हैं, हमारी आत्मा सिकुडती जाती है और हम असलियत को नहीं जान पाते हैं I काल के दायरे में इतने फस चुके हैं की उसमें धसते चले जाते हैं I वे लोग, जो अपनी जिन्दगी में सद्गुणों को ढलते है, वे अपनी मंजिल तक पहुँच जाते हैं I 
जैसे बांसुरी वाले नें बांसुरी बजाई, ऐसे ही महापुरुष हमारे अंदर शब्द को शुरू कर देते हैं I प्रभु का "शब्द" हम सबके अन्दर चल रहा है, उसे सुनकर उसका प्रसाद ग्रहण कर हम आनंदित तो होते हैं, लेकिन उस आनन्द को भोगने के लिए किया गया वादा नहीं निभाते I
अपने अंदर के कृष्ण को प्रकट करें
कृष्ण की मनमोहिनी माखनचोर वाली और रासलीला में लीन छवि के आलावा एक और छवि भी है - कल्याणकारी, रक्षक और पालनहार वाली छवि I संकट में रक्षा करने वाला, दुखों को हरने वाला, अधर्म या पाप का नाश करने वाला I 
 
यह संकट का ही दौर है I दुःख, तनाव बहुत बढ़ गए हैं I स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं और मनोरोग भी I संस्कारों के पतन का दौर है ! हर क्षेत्र में झूठ- बेईमानी फल रही है I मानवीय रिश्ते बिखर रहे हैं I संकट धरती पर जीवन के अस्तित्व का भी है I ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण असंतुलन के कारण धरती पर जीवन के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है I 
 
गीता में कृष्ण ने कहा है की जब- जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब- तब में प्रकट होता हूँ I साधु पुरषों का उद्धार करने और दूषित कर्म करने वालों का नाश करने के लिए मैं युग- युग में प्रकट होता हूँ I 
 
दुखों से घिरकर हम ईश्वर को याद करते हैं I पूजा- पाठ, दान- पुन्य या गुरुओं की कृपा से चमत्कार होने की आशा रखते हैं I किसी अवतार के प्रकट होने की उम्मीद लगाते हैं I पर यह सब मन का भुलावा ही होता है I जो भाग्य के भरोसे नहीं बैठते, वे दुखों को कम करने के लिए "जीने की कला" सीखते हैं I युक्तिसम्मत ढंग से समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं I अंग्रेजी में कहावत है "गाड हेल्प्स दोज हु हेल्प देम सेल्फ्स" I 
 
हमें अपना रक्षक स्वयं बनना होगा I क्योंकि देखा जाए तो बहुत सारे दुखों- कष्टों को हम स्वयं जन्म देते हैं I अपनी संकीर्ण सोच, गलत आदतों व मनोविकारों के चलते हम अपने लिए स्वयं समस्याएं पैदा कर लेते हैं I जब हम संकट पैदा करना जानते हैं, तो उसका हल भी जानते होंगे I कृष्ण का गीता का संदेश हमें "रक्षक" की इसी भूमिका के लिए तैयार करता है I गीता हमें "जीने की कला" सिखाती है I 
दुखों का एक मूल कारण है लालच, अनियंत्रित उपभोग, इच्छाओं पर वश न रखना I देखा जाये तो पर्यावरण असंतुलन, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक विषमता या अन्याय के मूल में यही कारण है I लालच और मोह ही क्रोध, भय जैसे मनोविकारों को जन्म देता है I 

 
बहुत- से कष्टों का जन्म हमारे अपने मन में ही होता है I हमारे ही मनोविकार हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं I क्रोध करने वाला व्यक्ति अपना नुकसान स्वयं करता है I वह कभी शांति नहीं पाता I ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति सदा बेचैन रहता है I दूसरों का सुख, उसे दुःख की ओर धकेलता है I झूठ बोलने वाले की समस्याएँ अलग हैं ई एक झूठ को छिपाने के लिए उसे न जाने कितने झूठ बोलने पड़ते हैं I अहंकार भी ऐसा मनोविकार है जो व्यक्ति को यथार्थ से दूर करता है I अहंकारी व्यक्ति समाज से कट जाता है I 
 
गीता मनोविकारों से मुक्ति पर जोर देती है I मनुष्य अपने मन पर विजय प्राप्त करे I कहा भी गया है "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" I गीता में ऐसे तमाम आध्यात्मिक मूल्यों ओर सदाचारों का उल्लेख है जिनके बल पर एक सुखी व संतुष्ट जीवन की नींव रखी जा सकती है I जैसे अहंकार से मुक्ति, अक्रोध, मन- वचन व शरीर से किसी को कष्ट न देना, क्षमा भाव, प्रिय भाषण, मन की स्थिरता, मन व इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह आदि I 
 
मनोविकारों की तरह पर्यावरण असंतुलन के लिए भी मनुष्य का लालच और अनियंत्रित उपभोक्तावाद काफी हद तक उत्तरदायी है I गीता में बताया गया है कि सूर्य, वायु, नक्षत्रों, पर्वतों, जलाशयों, नदियों, वृक्षों, पशु- पक्षियों, जलचरों और जंतुओं में जो श्रेष्ठतम तत्त्व है- वह ईश्वर है I ईश्वर प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है I इसलिए प्रकृति कि रक्षा सच्ची ईश्वर भक्ति है I 
विचार की शक्ति
एक राजा अपने मंत्रियों से बेहद असंतुष्ट था I राजा को लगता था की वे उसकी बात नहीं सुनते, उसके खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं I लेकिन सामने कोई ऐसा उदाहरन नहीं मिलता था की वह मंत्रियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करे I जब उसकी चिंता बहुत बढ़ गई तो वह राज पुरोहित के पास गया I राज पुरोहित नें उसकी बातें बहुत ध्यान से सुनीं I फिर बोला कि राजा दूसरों के बारे में जो कुछ भी सोचे, उसके प्रति सावधान रहे I राजा ने पूछा ऐसा क्यों, पुरोहित ने कहा, तुम्हारे विचार बहुत शक्तिशाली हैं I वे दूसरों तक पहुँच जाते हैं I 
राजा को विश्वास नहीं हुआ, उसने कहा, भला मन में सोची बात दूसरों तक कैसे पहुँच जाएगी ? आपकी यह व्याख्या सही नहीं लगती I तब पुरोहित ने अपनी बात समझाने के लिए एक प्रयोग करने कि सलाह दी I उसने कहा, देखो, सामने से आता हुआ वह जो व्यक्ति दिखाई दे रहा है, जब वह पास आ जाये तो मैं चाहूँगा कि तुम उसके लिए क्रोध और दुर्भावना से भरी बातें सोचो और तब देखते हैं कि उसका क्या असर होता है I 
जब वह अजनबी करीब आया तो बादशाह सोचने लगा, इसे तो पकड़ कर काल कोठरी में डाल देना चाहिए I अच भला मैं राज पुरोहित से बातें कर रहा था, पता नहीं यह कहाँ से खलल डालने आ गया I जब वह अजनबी बिल्कुल पास आ गया, तो राज पुरोहित ने उससे कहा, आओ भाई बैठो I पाता नहीं यह आदमी कहाँ से आ गया है, अपने को राजा बता रहा है I इसे देखकर तुम्हारे मन में क्या आ रहा है ? क्या विचार है ? माफ़ करना पुरोहित जी, पर मेरा तो जी चाहता है इसका सर फोड़ दूं I बादशाह ने सुना I उसे समझ में आ गया कि उस अजनबी ने भी उसके कुविचार पकड़ लिए थे I तभी वह हिंसक रूप से प्रतिक्रिया करने को प्रेरित हुआ था I हम चाहे कुछ न बोलेन, पर हमारे क्रोध के द्वारा, हमारे क्रुद्ध हव- भाव के द्वारा, हमारी क्रुद्ध आवाज़ के द्वारा वातावरण में नकारत्मक तरंगें जा सकती हैं I उनसे न केवल दूसरे व्यक्ति पर असर पड़ता है, बल्कि वे तरंगें लौट कर वापस हम तक भी आती है I हम समझते हैं कि किसी को यह नहीं पता, हम क्या सोच रहे हैं I पर हमारे विचार ऐसी तरंगें पैदा करते हैं, जो कि सूक्ष्म स्तर पर दूसरों द्वारा पकड़ी जा सकती हैं I इसलिए बेहतर हो कि हम कुविचारों से, क्रोध से बचने कि कोशिश करें I इसके लिए कई तरीके अपना सकते हैं I पहला यह है कि जब क्रोध आये तो उसके दुष्परिणामों के बारे में सोचें I दूसरा तरीका यह है कि हम कोई लक्ष्य निर्धारित करें और तब सोचें कि क्रोध से उस लक्ष्य कि प्राप्ति में क्या बढ़ा आएगी I तीसरा तरीका है कि हम ध्यान अभ्यास द्वारा खुद को ऐसे साध लें कि क्रोध आये ही नहीं I 
एक बार बुद्ध के पास एक नौजवान आया और अचानक उन्हें अपशब्द कहने लगा I बुद्ध चुपचाप सुनते रहे, हालांकि उनके शिष्य क्रोधित हो उठे और वे उसे पीटना चाहते थे I पर बुद्ध ने उस नौजवान से कहा, शब्दों का जो उपहार तुम मेरे लिए लोये थे, वह मुझे स्वीकार नहीं I तुम्हारा तोहफा तुम्हारे ही पास रहा, तुम्हें इसे वापस ले जाना होगा I 
क्रोध को काबू करने का एक और तरीका यह है कि हम निश्चित करें कि ये घंटे हम अपने आध्यात्मिक विकास में लगायेंगे I तो उस दौरान हम क्रोध के आक्रमण से बच सकते हैं I क्रोध आने लगे तो हम अपने आप से कह सकते हैं, अगर इसे अपने ऊपर हावी होने दिया तो यह ध्यान- अभ्यास का मेरा कीमती समय बर्बाद कर देगा I अभ्यास कि जगह, मैं बैठा हुआ इसी के बारे में सोचता रहूंगा I इस हालत में मैं अपने अंतर के नजारों पर कैसे ध्यान टिकाऊंगा ? मेरे भीतर तो क्रोध पनपता रहेगा I इस विचार को आगे लेजाकर हम यह भी सोच सकते हैं कि जिंदगी में ऐसी परिस्थितियां हमेशा आती रहेंगी जो मुझे क्रोधित करेंगी I क्या मैं जिंदगी भर किसी न किसी बात के लिए क्रोधित होते रहना चाहूँगा ? यह जिंदगी अनमोल है - मैं इसे क्रोध में बर्बाद नहीं करना चाहता I
मौन तो अनंत भावों कि भाषा है
कुछ कह देना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कुछ नहीं कहना I बोलना यदि कला है, तो मौन सर्वश्रेष्ठ कला है I भारत में अनेक ऋषि, मुनि, संत हुए, जिनमें से अनगिनत ने मौन रहकर पूरा जीवन व्यतीत किया I कई साधक वर्ष, दो वर्ष, पन्द्रह वर्ष तथा इससे भी अधिक मौन रहने कि प्रतिज्ञा करते हैं I मौन का रहस्य इतना गहरा है कि उसे मौन धारण करने वाला ही समझ सकता है I कहना बहुत थोडा होता है I न कहना बहुत ज्यादा होता है I जो परम सत्य है, उसे कह नहीं सकते I वेदांती उसे अनिर्वचनीय तथा जैन (स्यात) अवक्तव्य कहते हैं I 
यदि बोलकर बातें की जा सकती हैं, तो चुप रहकर उससे भी ज्यादा बातें होती हैं I आंखें बातें करती हैं I मौन की भाषा शब्दों की भाषा से किसी भी रूप में कमजोर नहीं होती, बस उसे समझने वाला चाहिए I जिस प्रकार शब्दों की भाषा का शास्त्र होता है, उसी प्रकार मौन का भी भाषा विज्ञान होता है, किन्तु वह किसी शास्त्र में लिखा हुआ नहीं होता I मौन का भाषा विज्ञान भी मौन ही होता है I इसे समझा तो जा सकता है, पर समझाया नहीं जा सकता I संभवत: इसीलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि मौन अनंत कि भाषा है I 
मौन का आध्यात्मिक महत्व तो है ही, व्यावहारिक महत्व भी कम नहीं है I साधारणत: लोग मौन को कायरता का सूचक समझ बैठते हैं I वे लोग समझते हैं कि जो लोग डरते हैं, वे मौन रहते हैं और जो लोग नहीं डरते, वे लोग बेधड़क होकर बोलते हैं I इसलिए वे सत्य बोलते हैं I मौन कई तरह का हो सकता है I यह भी तो हो सकता है कि कहीं धर्म, शास्त्र, राष्ट्र कि हानि हो रही हो और हम अपनी हानि के भय से चुप रहें I एक विचारक के मत में भय से उत्पन्न मौन पशुता और संयम से उत्पन्न मौन साधुता है I एक कवि नें लिखा है - साधारणतया मौन अच्छा है/ शांत मन के लिए/ किन्तु जब चारों ओर मचा हो शोर/ तब हमें बोलना ही चाहिए/ सर कटाना पड़े या न पड़े/ तैयारी तो उसकी होनी ही चाहिए I 
यह विवेक रखना आवश्यक है कि कहां मौन रहना चाहिए और कहां बोलना चाहिए I एक विचारक ने कहा है कि मुझे इस बात किया कभी गम नहीं हुआ कि मैं मौन क्यों रहा, लेकिन इस बात का गम हमेशा रहा कि मैं बोला क्यों ? कई लोगों कि चुप्पी ही सारा शासन- प्रशासन चलाती है I वे किसी अपराध कि सजा डांटकर नहीं, बल्कि कुछ न कहकर देते हैं I इससे अपराधी इतना अधिक लज्जित हो जाता है, जितना बोलने पर भी नहीं होता I बोलने पर हो सकता है, वे कोई ऐसा ही जवाब दे दें कि बच जाएं I लेकिन चुप्पी उन्हें हर पल सजा देती है I 
हमारी वाणी हमें अक्सर धोखा दे जाती है I हम कुछ का कुछ कह डालते हैं, बाद में पछताते हैं और उसका खामियाजा भुगतते हैं I पर मौन हमारा ऐसा मित्र है जो कभी धोखा नहीं देता I जान ब्रायल ने कहा है कि मौन रहो और अपनी सुरक्षा करो I मौन कभी तुम्हारे साथ विश्वासघात नहीं करेगा I एक संत ने कहा है कि सलाह देने के, आत्म प्रशंसा के, निंदा करने के तथा गुस्सा होने के मौके पर भी आपने यदि मौन धारण कर लिया, तो जीवन अवश्य सफल हो जाएगा I 
लेकिन मौन कोई साधारण चीज नहीं है और न ही वह हर मनुष्य के बस की बात है I मौन का अर्थ कर्म का अभाव, जड़ता, अकर्मण्यता या आलस भाव नहीं है I वह विचार या तर्क- वितर्क से खाली रहना नहीं है I गाँधी जी ने कहा था कि क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक है, उतना और कोई नहीं I कभी लगता है मौन जितना कुछ कह देता है उतना वाणी भी नहीं कह पाती I 
बोलने वालों के मायने तय हो जाते है, पर मौन रहने वालों के हजार मायने हो सकते हैं I कुछ लोग कहकर कहना चाहते हैं, कुछ लोग बिना कहे ही सब कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि बिना कहे जो कहा जाता है, वह कहे गए से इतना ज्यादा बड़ा और महान होता है कि उसे कहा नहीं जा सकता है I
कर्म और भाग्य
एक बार एक संत किसी गांव में जा रहे थे I गांव के बाहर किसान गेहूं कि सिंचाई कर रहे थे I गेहूं कि फसल बहुत अच्छी थी I लहलहाती फसल को देखकर संत ने कहा, भगवान कि कृपा से इस बार बहुत अच्छी फसल हुई है I पास में खड़े किसान ने इसे सुन लिया I उसने कहा, संत जी ! इसमें भगवान कि कृपा कहां से आ गई ? मैंने कड़ी मेहनत करके खेत कि जुताई कि, कुदाल से खोद- खोदकर खरपतवार निकले, अच्छी पैदावार वाले बीज को महंगे दामों में खरीद कर बोया, समय पर खाद पानी दिया I न रात देखा न दिन, जरूरत के मुताबिक खेत में जुटा रहता था I यह तो मेरे परिश्रम का फल है I यदि मैं मेहनत नहीं करता तो फसल अच्छी कैसे होती I 
उस समय किसान कि बात सुन कर संत जी बगैर कोई जवाब दिए मुस्कुराए हुए वहां से चले गए I कुछ दिन बाद वे फिर उसी रस्ते से लौट रहे थे कि देखा, वही किसान सर पर हाथ रखे उदास मन से खेत के पास बैठा है I संत उसे दुखी देख कर रुक गए , पास गए और सांत्वना भरे शब्दों में बोले, भैया बहुत बुरा हुआ I तुम्हारी तो हरी- भरी लहलहाती फसल नष्ट हो गई I 
किसान ने कहा, महाराज, क्या बताऊं I मुझे भगवान ने तबाह कर दिया I सारी मेहनत बेकार चली गई I ओले और आँधी ने सारी फसल को बर्बाद कर दिया I तब संत बोले, भैया ! भगवान की तो माया है ही I यही बात तो पिछले दिनों अच्छी फसल को देखकर भी मैंने कही थी कि भगवान कि कृपा है I तब तुम्हीं नहीं माने, बोले कि यह तो हमारे परिश्रम का फल है, इसमें भगवान कि कृपा कहां से आई ? अब तुम कह रहे हो कि भगवान ने तबाह कर दिया I अच्छा काम का श्रेय तो तुम लो और बुरा हो तो उस बेचारे भगवान को क्यों दोषी मानते हो I 
किसान समझ गया कि मेहनत का फल तभी मिलता है जब भगवान कि कृपा होती है I कर्म के बगैर भाग्य का कोई अर्थ नहीं और भाग्य के बगैर कर्म का फल मिलेगा यह भी जरुरी नहीं है I 
 
भाव के भूखे प्रभु
वृंदावन के एक मंदिर में मीराबाई ईश्वर को भोग लगाने के लिए रसोई पकाती थीं I वे रसोई बनाते समय मधुर स्वर में भजन भी गाती थीं I एक दिन मंदिर के प्रधान पुरोहित ने देखा कि मीरा अपने वस्त्रों को बिना बदले और बिना स्नान किये ही रसोई बना रही हैं I उन्होंने बिना नहाए-धोए भोग कि रसोई बनाने के लिए मीरा को डांट लगा दी I पुरोहित ने उनसे कहा कि ईश्वर यह अन्न कभी भी ग्रहण नहीं करेंगे I पुरोहित के आदेशानुसार, दूसरे दिन मीरा ने भोग तैयार करने से पहले न केवल स्नान किया, बल्कि पूरी पवित्रता और खूब सतर्कता के साथ भोग भी बनाया I शास्त्रीय विधि का पालन करने में कहीं कोई भूल न हो जाये, इस बात से भी वे काफी दरी रहीं I तीन दिन बाद पुरोहित ने सपने में ईश्वर को देखा ! ईश्वर ने उनसे कहा कि वे तीन दिन से भूखे हैं I पुरोहित ने सोचा कि जरुर मीरा से कुछ भूल हो गई होगी ! उसने भोजन बनाने में न शास्त्रीय विधान का पालन किया होगा और न ही पवित्रता का ध्यान रखा होगा ! ईश्वर बोले - इधर तीन दिनों से वह काफी सतर्कता के साथ भोग तैयार कर रही है I वह भोजन तैयार करते समय हमेशा यही सोचती रहती है कि उससे कहीं कुछ अशुद्धि या गलती न हो जाए! इस फेर में मैं उसका प्रेम तथा मधुर भाव महसूस नहीं कर पा रहा हूं I इसलिए यह भोग मुझे रुचिकर नहीं लग रहा है I ईश्वर कि यह बात सुन कर अगले दिन पुरोहित ने मीरा से न केवल क्षमा- याचना कि, बल्कि पहले की ही तरह प्रेमपूर्ण भाव से भोग तैयार करने के लिए अनुरोध भी किया I सच तो यह है कि जब भगवान कि आराधना अंतर्मन से की जाती है, तब अन्य किसी विधि- विधान की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है I अभिमान त्याग कर और बिना फल की चिंता किए हुए ईश्वर कि पूजा जरुर करनी चाहिए I हालांकि उनकी प्रेमपूर्वक आराधना और सेवा ही सर्वोत्तम है I इसलिए बिना मंत्रों के उच्चारण और फूल चढ़ाए हुए ही यदि आप मन से दो मिनट के लिए भी ईश्वर को याद कर लेते हैं, तो यही सच्ची पूजा होती है I
क्रोध ख़त्म हो जाता है, उसका घाव नहीं
एक बालक को छोटी- छोटी बातों पर क्रोध आ जाता था I उसके पिता ने कहा, जब भी तुम्हें क्रोध आये, घर की चहारदीवारी पर एक कील थोक देना I पहले दिन उस लड़के ने 37 कीलें ठोकीं I लेकिन कीलें देखकर उसे खुद पर आश्चर्य भी हुआ कि उसे इतना क्रोध आता है I 
उसके अगले दिन उसने 32 कीलें ठोकीं, उसके बाद 29 I क्रोध आने के बाद जाकर दीवार में कील ठोकने कि उस प्रक्रिया में कुछ सप्ताहों में उसने अपने क्रोध पर काबू पाना सीख लिया ओर धीरे- धीरे कीलें गाड़ने कि संख्या भी कम हो गई I उसे समझ आ गया कि कील ठोकने कि तुलना में क्रोध पर काबू पाना आसन है I फिर एक दिन ऐसा आ गया जब उसे बिल्कुल क्रोध नहीं आया, वह एक सहनशील बालक बन गया I 
उसने अत्यंत हर्षित भाव से पिता को इसके बारे में बताया I तब पिता ने सुझाव दिया कि अब वह प्रतिदिन एक- एक कील दीवार से बाहर निकाले, क्योंकि अब उसे अपने आप पर पूरा नियंत्रण हो गया है I इस तरह कुछ दिन बीते और एक दिन उसने खुश होकर पिता को जाकर बताया कि सब कीलें निकल दी गई हैं I 
पिता अपने बेटे का हाथ पकड़ कर दीवार के पास वापस ले गया I फिर कहा, तुमने बहुत अच्छा कम किया है I लेकिन यह देखो, कील निकलने के बाद भी गड्ढे बचे हुए हैं I कील ठोकने से जो नुकसान होना था, वह हो चुका I दीवार अब कभी भी अपनी पहली वाली साफ़- सुथरी स्थिति में नहीं आ सकती I 
उसने बेटे को समझाया, इसी तरह जब हम किसी को क्रोध के आवेश में कुछ अनाप- शनाप कहते है, तो दूसरों के मर्मस्थलों को घायल कर देते हैं I उसके बाद सुलह- सफाई हो भी जाये, तो उसके निशान रह जाते हैं I तुम किसी व्यक्ति को पहले तो घाव दे दो और फिर बार- बार 'सारी' कहो भी तो घाव के निशान जाएंगे नहीं, वे बने रहेंगे I 
हमारे शास्त्रों में एक नीति वाक्य है, जिसने क्रोध कि अग्नि अपने हृदय में प्रज्वलित कर रखी है, उसे चिता से क्या प्रयोजन ? अर्थात वह तो बिना चिता के ही जल जाएगा I ऐसी महाव्याधि से दूर रहना ही कल्याणकारी है I क्रोध बुद्धि कि विनाशकारी स्थिति है I वास्तव में क्रोध, घृणा, निंदा, ईर्ष्या ये वे भावनाएं हैं जिनसे मानुष कि तर्कशक्ति नष्ट हो जाती है I क्रोध को तो यमराज कहा गया है I 
पुत्र ने पिता कि आज्ञा नहीं मानी, पिता को क्रोध आ गया I पत्नी ने आपकी मर्जी कि दाल- सब्जी नहीं बनाई, तो आपको क्रोध आ गया I आप समझते हैं कि हर काम आपकी मर्जी से ही होना चाहिए I कई बार हमारे विचार दूसरों से मेल नहीं खाते, तो मतभेद हो जाता है, शत्रु बन जाते हैं I हम समझते हैं कि लोगों को हमारे अनुसार ही चलना चाहिए I 
इसी तरह जब हम यह मानने लगते हैं कि जो कुछ हम जानते हैं, वह ठीक है I तब भी संघर्ष और क्रोध के अवसर आते हैं I वैज्ञानिक लोग किसी एक बात का जीवन भर अनुसन्धान करते हैं, किन्तु यदि उन्हें अपने मन में संदेह हुआ तो बिना वर्षों के परिश्रम का ख्याल किये तुरंत अपना मत बदल भी देते हैं I ज्ञान का समुद्र अथाह है I जो यह सोचता है कि मैं जो जनता हूं, वाही पूर्ण सत्य है, वह अंधेरे में भटक रहा है I 
जो खुद को मालिक मानता है, करता समझता है, अहंकार करता है, उसे ही क्रोध आएगा, जो अपने को सेवक स्वरुप जनता है, वह किसी पर क्रोध क्यों करेगा ? इसलिए हमें प्रतिदिन एकांत में बैठकर कुछ देर शांतिपूर्वक अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में सोचना चाहिए I हमें इतना अधिकार किसी ने नहीं दिया कि सभी बातों में हम अपनी ही मर्जी चलाएं I हम भी उतना ही अधिकार रखते हैं, जितना दूसरे I फिर जब हम दूसरे से प्रतिकूल विचार रखते हैं, तो दूसरों को भी वैसा करने का अधिकार क्यों नहीं है ?

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