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Daily Routine

प्रात: स्मरणम्

समुद्रवसने देवी पर्वतस्तनमंडिते I

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम पद्स्पर्श्म क्षमस्व मे II

त्रैलोक्यचैतन्य मयादि देव

श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव I

प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थम

संसार यात्रा मनुवर्तयिष्ये II

सुप्तः प्रबोधितो विष्णो

हृषीकेशेन यत त्वया I

यद्यद कारयसे कार्यं

तत करोमि तवाज्ञया II

आयुर्बलं यशोवर्चः प्रजाः पशुवसूनी च I

ब्रह्म प्रज्ञं च मेधं च त्वं नो देहि वनस्पते II

अत्यन्त मलिनः कायो नवछिद्र समन्वित: I

स्रवत्येष दिवारात्रौ प्रात: स्नानं विशोधनम II

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती I

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन संनिधिम कुरु II

प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथ बन्धुम

सिंदूर पूर परिशोभितगंडयुग्मं I

उद्दंड विघ्न परिखण्डन चंड दण्ड

माखंडलादि सुरनायकवृन्दवन्द्यम I

प्रात: स्मरामि भवभीति महार्तिनाशम

नारायणं गरुड़वाहन मब्ज नाभम I

ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं

चक्रायुधम तरुणवारिजपत्रनेत्रम II

प्रात: स्मरामि भव भीति हरम सुरेशं

गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम I

खट्वांगशूल वरदा भय हस्तमीशम

संसार रोग हर मौषधमद्वितियम I

प्रात: स्मरामि शरदिंदु करोज्ज्वलाभाम

सद्रत्नवनमकरकुंडलहारभूषाम I

दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्रहस्ताम

रक्तोत्पलाभचरणाम भवतीम परेशां II

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं

रूपं हि मण्डलमृचोSथ तनुर्यजूंषि I

सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं

ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपं I

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु:

शशी भूमिसुतो बुधश्च I

गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

भृगुर्वसिष्ठ: क्रतुरंगिराश्च मनु:

पुलस्त्य: पुलहश्च गौतम: I

रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्ष:

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

सनत्कुमार: सनक: सनन्दन: स्नातनोSप्यासुरिपिंग्लौ च I

सप्त स्वरा: सप्त रसातलानि कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम II

सप्तार्णवा: सप्त कुलाचलाश्च सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त I

भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम II

पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथाप: स्पर्शी

च वायुर्ज्वलितं च तेज: I

नभ: सशब्दं महता सहैव

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं पठेत

स्मरेद्वा श्रणुयाच्च भक्त्या I

दु:स्वप्ननाशस्त्विह सुप्रभातं

भवेच्च नित्यं भगवत्प्रसादात II

पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको जनार्दन: I

पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको युधिष्ठिर: II

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण: I

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन: II

सप्तैतान संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम I

जीवेद वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित: II

कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च I

ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तनं कलिनाशनम II

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक

व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान

रुक्मांगदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन

पुण्यानिमान परमभागवतान नमामि II

धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन पापं

प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन I

शत्रुर्विनश्यति धनंजयकीर्तनेन

माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगा: II

वाराणस्यां भैरवो देव: संसारभयनाशन: I

अनेकजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति II

वाराणस्यां पूर्वभागे व्यासो नारायण: स्वयं I

तस्य स्मरणमात्रेण अज्ञानी ज्ञानवान भवेत् II

वाराणस्यां पश्चिमे भागे भीमचण्ड़ी महासती I

तस्या: स्मरणमात्रेण सर्वदा विजयी भवेत् II

वाराणस्यां उत्तरे भागे सुमन्तुर्नाम वै द्विज: I

तस्य स्मरणमात्रेण निर्धनो धनवान् भवेत् II

वाराणस्यां दक्षिणे भागे कुक्कुटो नाम ब्राह्मण: I

तस्य स्मरणमात्रेण दु:स्वप्न: सुस्वप्नो भवेत् II

उमा उषा च वैदेही रमा गंगेति पञ्चकम् I

प्रातरेव पठेन्नित्यं सौभाग्यं वर्धते सदा II

 

सोमनाथो वैद्यनाथो धन्वन्तरिरथाश्विनौ I

पञ्चैतान् य: स्मरेन्नित्यं व्याधिस्तस्य न जायते II

कपिला कालियोSनन्तो वासुकिस्तक्षकस्तथा I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं विषबाधा न जायते II

हरं हरिं हरिश्चन्द्रम् हनूमन्तं हलायुधम् I

पञ्चकं वै स्मरेन्नित्यं घोरसंकटनाशनम् II

आदित्यश्च उपेन्द्रश्च चक्रपाणिर्महेश्वर: I

दण्डपाणि: प्रतापी स्यात् क्षुत्तृड्बाधा न बाधते II

वसुर्वरुणसोमौ च सरस्वती च सागर: I

पञ्चैतान् संस्मरेद् यस्तु तृषा तस्य न बाधते II

सनत्कुमारदेवर्षिशुकभीष्मप्लवंगमा: I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं कामस्तस्य न बाधते II

रामलक्ष्मणौ सीता च सुग्रीवो हनुमान कपि: I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं महाबाधा प्रमुच्यते I

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिम् दण्डपाणिम च भैरवं I

वन्दे काशीं गुहां गंगां भवानीं मणिकर्णिकां II

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् I

उज्जयिन्यां महाकालमोम्कारममलेश्वरम् II

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् I

वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे II

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने I

सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये II

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् I

सर्वपापविनिर्मुक्त: सर्वसिद्धिफलो भवेत् II

ॐ एकचक्र रथो यस्य दिव्य कनक भूषित: I

स मे भवतु सुप्रीत: पद्म हस्तो दिवाकर: II

ॐ उद्वयं तमसस्परिश्व: पश्यंत उत्तरम् I

देवं देवत्रा सूर्य मगन्म ज्योति रुत्तमम् II

ॐ कर्पूर गौरम करुणावतारम

संसारसारम भुजगेन्द्रहारम I

सदावसन्तम हृदयारविन्दे

भवम भवानी सहितं नमामि II

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय I

ॐ नमो नारायणाय I

ॐ श्री सीतारामाभ्यम नमः I

ॐ श्री राधाकृष्णाभ्याम नमः I

Introduction To Daily Routine

अथोच्यते गृहस्थस्य नित्यकर्म यथाविधि I
यत्कृत्वा नृण्यमाप्नोती दैवात् पैत्र्याच्च मानुषात् II

शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य इस संसार में जन्म लेने के साथ ही तीन प्रकार के ऋणों से युक्त होता है I
वे तीन ऋण हैं-
 
1. देवऋण                                                             2 . पितृऋण                                                        3 . मनुष्यऋण
 
पहला ऋण है देवऋण अर्थात मनुष्य जब पैदा हुआ तो ईश्वर की कृपा से सकुशल इस संसार में जन्म ले पाया, किसी एक भाग्यविशेष को लेकर पैदा हुआ, अतः नित्यप्रति हमें उस ईश्वर का चिंतन, वंदन, धन्यवाद करना चाहिए की प्रभु आपकी कृपा से मैं इस आज को देख पाया और मेरी हर घडी मंगलमय हों, मुझ से शुभ कर्म हों, इस प्रकार उस परमात्मा को धन्यवाद करके हम उसका कर्ज चुकायें I 
 
दूसरा ऋण है पितृऋण अर्थात हम इस संसार में किसी एक कुलविशेष, खानदान आदि में पैदा हुए हैं, हमें पालने पोसने में, हमें यहाँ तक लाने में हमारे माता पिता सहित हमारे पूर्वजों की तपस्या, संघर्ष, उपकार सम्मिलित है, अतः जीवित माता- पिता की सेवा सुश्रूषा एवं गुजरे पित्रों के लिए तर्पण, उनकी पुण्यतिथियों का स्मरण हमें उनके कर्ज से मुक्ति की तरफ ले जाता है I
 
तीसरा ऋण है मनुष्यऋण अर्थात इस संसार में हमारा अकेले का अस्तित्व कुछ नहीं है हम समाज में पैदा हुए हैं, समाज का सहयोग ज़रूरी है, पढने, लिखने, खाना, पहनना, व्यापार, व्यवसाय, विवाह, संतान, सुख के साधन ये सब हमें समाज के द्वारा ही प्राप्त होते हैं अतः हमारा भी समाज के प्रति कुछ कर्तव्य होता है अपने परिवार, परिवेश, देश, संसार, मानवता के लिए कुछ अच्छा कर पाना, उन्हें सहयोग देना हमें इस मनुष्य ऋण से मुक्त करता है I अतः अपने जीवन को परिपूर्ण बनाने की कला का नाम नित्यकर्म है I
 
अपने इस नित्यकर्म विभाग के अंतर्गत हम आपको बतलायेंगे की किस प्रकार आप अपने रोज़ की, दिनचर्या की शुरुआत करें की आपका पूरा दिन मंगलमय हों, आपका मन श्रेष्ठ उर्जा से ख़ुशी से परिपूर्ण हों, आपका मनचाहा सिद्ध हों, कम से कम बाधाएं होँ I किस प्रकार सिर्फ कुछ परिवर्तन करके, मात्र 15-20 मिनट कुछ शुभ मंत्रों का उच्चारण करके आप अपने पूरे जीवन की दिशा और दशा बदल सकते हैं, दुःख दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर सकते हैं I अपने मनोबल, भाग्यबल और ग्रहबल को बढाकर सुखी हों सकते हैं I विद्यार्थी विद्या में, गृहिणी परिवार में, व्यापारी व्यवसाय में, नौकरी करने वाले नौकरी में उन्नति, श्रेष्ठता, परिपूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं I फिर आपको आगे बढ़ने के लिए किसी छल कपट , पाप करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी I पूरी की पूरी प्रकृति, कुदरत आपका साथ देगी और जो व्यक्ति निरन्तर सत्कर्म में संलग्न है, जो मन, वाणी और कर्म से सच्चा है, भगवन भी ऐसे व्यक्ति के पीछे- पीछे घूमता है अतः आईये आज से ही इस नित्यकर्म को अपनाइये और एक फर्क महसूस कीजिये की जीवन में कितनी शांति आ रही है, सहजता को आप छू पा रहे हैं यहाँ सबके लिए सहज और साधारण नित्यकर्म दिया जा रहा है, किन्तु आप चाहें तो अपनी राशि, जन्मकुंडली, अपनी स्तिथि, व्यवसाय, अपने क्षेत्र के अनुरूप (specific) विशेष नित्यकर्म भी कुछ शुल्क अदा करके बनवा सकते हैं जोकि सिर्फ आपके लिए, आपके ग्रह नक्षत्रों को देखकर, आपके कार्यक्षेत्र से सम्बंधित सफलता को देने वाला होगा I
बनवाएं भाग्य को बदल देने वाली एक अदभुत दिनचर्या
Rs . 500 /- only

-नित्यकर्म-

जागरण:- सर्वप्रथम कोशिश करें की रात्रि को जल्दी सोकर प्रात: काल ब्रह्ममुहूर्त में जागें, सूर्योदय से चार घडी पूर्व अर्थात सवा डेढ़ घंटा पूर्व उठना ब्रह्ममुहूर्त में उठना कहलाता है I

करावलोकन:- आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए इस शलोक का पाठ करें-

कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती I

करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम II

अर्थात शुभाशुभ कर्म करने वाले कर्म शक्ति के परिचायक हमारे इन हाथों में सौभाग्य की जननी लक्ष्मी, बुद्धि की सरस्वती और संरचना के अधिपति ब्रह्मा जी का वास हो I अर्थात इन हाथों से रचनात्मक और बुद्धिमता से परिपूर्ण ऐसे काम होँ की जीवन में लक्ष्मी का वास हो I

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भूमि वंदना

शैय्या से उठकर भूमि पर पैर रखने से पहले सबको आश्रय देने वाली माँ स्वरुप पृथ्वी को वंदन करें और उन पर पैर रखने की मज़बूरी के लिए हल्की सी क्षमा याचना करें I संभव हो और याद कर पाएं तो इस मन्त्र के द्वारा अपने विचारों को प्रकट करें I

समुद्रवसने देवी पर्वतस्तनमंडिते I

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम पद्स्पर्श्म क्षमस्व मे II

अर्थात- हे समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पर्वत रूपी वक्षस्थलों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी रूपा पृथ्वी देवी ! आप मेरे पादस्पर्श को क्षमा करें और मुझे आज के लिए श्रेष्ठ मार्गदर्शन करें अर्थात मेरे ये कदम खुद से सफलता की ओर चलें I

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मंगल दर्शन

तत्पश्चात गोरोचन, चन्दन, सुवर्ण आदि श्रेष्ठ धातुएं, शंख, मृदंग, दर्पण, मणि, रत्न आदि किसी भी मांगलिक वास्तु का दर्शन करें तथा गुरु, अग्नि और सूर्य भगवान को नमस्कार करें I

अभिवादन

इसके बाद मूर्तिमान भगवान अपने माता- पिता, दादा- दादी आदि वरिष्ठ जनों का एवं गुरुजनों का (जो भी उपलब्ध होँ) पैर छूकर अभिवादन करें I फिर परम पिता परमात्मा का स्मरण करें I

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भगवान को अपने दिन का समर्पण

इसके अनन्तर परमात्मा से प्रार्थना करें कि हे प्रभु ! मैं इस समय से लेकर सोने तक के सभी कार्य आपकी प्रसन्नता के लिए करना चाहता हूँ I मुझसे होने वाले सभी कार्य शुभ एवं श्रेष्ठ होँ I आप मुझ पर प्रसन्न होँ क्योंकि एक सेवक के लिए आज्ञा पालन से बढ़कर और कोई सेवा नहीं होती अर्थात हे प्रभु मेरी आज कि कर्मरूपी पूजा से आप प्रसन्न होँ I

त्रैलोक्यचैतन्य मयादि देव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव I

प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थम संसार यात्रा मनुवर्तयिष्ये II

सुप्तः प्रबोधितो विष्णो हृषीकेशेन यत त्वया I

यद्यद कारयसे कार्यं तत करोमि तवाज्ञया II

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शौच विधि

शौच के द्वारा अपने दिन और शरीर को पवित्र करें I जनेऊ धारण किया हो तो इसे कान में धारण कर लें अर्थात कोई पवित्र वस्तु धारण की हो तो इसकी शुद्धि का विशेष ध्यान रखें I शौचालय वास्तुशास्त्र अनुसार नैऋतय कोण में हो तो श्रेष्ठ, मुख दक्षिण या उत्तर कि तरफ हो तो श्रेष्ठ, समस्त शौच क्रिया मौन होकर सम्पन्न करें I तत्पश्चात मृत्तिका, साबुन आदि के द्वारा हाथ आदि कि शुद्धि का विशेष ध्यान रखें I

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दंतधावन विधि

मुख शुद्धि के बिना पूजा पाठ, मन्त्र- जाप आदि सब निष्फल होते हैं I अतः स्वास्थ्य अथवा धर्म दोनों के दृष्टिकोण से दंतधावन अथवा मंजन (ब्रश) करें I इसके लिए पूर्व या ईशान कि तरफ मुह करें I संभव हो तो इस मन्त्र का मानसिक जाप करें

आयुर्बलं यशोवर्चः प्रजाः पशुवसूनी च I

ब्रह्म प्रज्ञं च मेधं च त्वं नो देहि वनस्पते II

अर्थात इस क्रिया के द्वारा हे देवों ! मैं आयु, बल, यश, उत्तम वाणी, श्रेष्ठतम साधन, ईश्वर को जानने कि बुद्धि आदि सदगुणों को प्राप्त करूँ I

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क्षौर कर्म (शेविंग या कटिंग करने कि विधि)

एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, किसी भी व्रत के दिन, मंगलवार, वीरवर, शनिवार को बाल कटवाना निषिध है I 

बुधवार को क्षौर कर्म कराने से पाँच महीने की, सोमवार को सात मास की, रविवार को दस मास की और शुक्रवार को ग्यारह मास की आयु उस दिन के देवता बढ़ा देते हैं I जबकि शनिवार व मंगलवार को क्षौर कर्म करवाने से उस दिन के अभिमानी देवता सात या आठ मास की आयु घटा देते हैं I पुत्र वाले गृहस्थियों को एवं उन्नति कि चाह रखने वालों को वीरवार को भी क्षौर नहीं करवाना चाहिए I 
 
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स्नान

प्रात: काल स्नान करने से ही मनुष्य शुद्ध होकर जप, पूजा- पाठ, भोजन आदि समस्त कर्मों के योग्य बनता है I अतः स्नान आवश्यक है I

अत्यन्त मलिनः कायो नवछिद्र समन्वित: I

स्रवत्येष दिवारात्रौ प्रात: स्नानं विशोधनम II

अर्थात नौ छिद्रों वाले इस मलिन शरीर से दिन रात मल निकलता रहता है और स्नान से ही इसकी शुद्धि होती है I वेदों और शास्त्रों में कहे गए समस्त कार्य स्नानमूलक हैं I अतएव लक्ष्मी, पुष्टि एवं आरोग्य को चाहने वाले मनुष्य को नित्यस्नान करना चाहिए I स्नान करते हुए गंगा आदि पवित्र तीर्थ जलों का स्मरण करें I स्नान करते हुए जल से भरे पात्र में अपना दाहिना हाथ कलाई तक डुबो कर गंगा जी के नाम का तीन बार स्मरण करें, इससे उस जल में माँ गंगा जी अपना आशीर्वाद देती हैं I फिर भगवान का स्मरण करते हुए स्नान प्रारम्भ करें I संभव हो तो इस मन्त्र को अवश्य याद करके नहाते हुए इसका उच्चारण करें I

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती I

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन संनिधिम कुरु II

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तर्पण

यदि किसी तीर्थ आदि में स्नान कर रहें होँ तो देव, ऋषि एवं पितृयों के निमित जल कि भरी अन्जलियाँ मंत्रों के द्वारा प्रदान करें, इसे तर्पण विधि कहते हैं I यह एक विशेष विधि है यदि कोई श्रद्धावान मनुष्य इसे करना चाहें तो संस्था के ब्राह्मणों के द्वारा विधि सीख लें I 

इसके बाद शुद्ध वस्त्र धारण करके शिखा आदि हो तो मन्त्रपूर्वक  इसे बांधकर तिलक धारण करें I यह तिलक गंगाजल, तुलसी कि मिट्टी, चन्दन, केसर, रोली, भस्म आदि से लगा सकते हैं I इससे यश कीर्ति की वृद्धि, चित्त की एकाग्रता एवं भगवान के प्रति ध्यान कि प्राप्ति होती है I अतः नियम पूर्वक भगवन को समर्पित तिलक लगाना चाहिए I 
 
फिर नियम से पूजा- पाठ को महत्व देने वाले व्यक्ति संध्यावंदन करें I साधारण जन अपने पूरे दिन को बाधारहित, खुशियों से भरा, रोग रहित बनाने के लिए एवं किये जाने वाले कार्यों में सफलता प्राप्ति के लिए, आर्थिक लाभ के लिए ग्रहों और देवताओं की कृपा प्राप्ति के लिए इस नित्य मंत्रावली का अवश्य पाठ करें और अपने जीवन में बदलाव देखें I ये हमारी ओर से आपके लिए चेलेंज है I
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गणेश स्मरण

प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथ बन्धुम सिंदूर पूर परिशोभितगंडयुग्मं I

उद्दंड विघ्न परिखण्डन चंड दण्ड माखंडलादि सुरनायकवृन्दवन्द्यम I

अर्थात- अनाथों की रक्षा करने वाले, सिंदूर से सुशोभित दोनों कपोलों वाले, प्रबलतम विघ्नों का नाश करने में समर्थ एवं इंद्र आदि देवों से नमस्कृत श्री गणेश भगवान जी का मैं प्रात: काल स्मरण करता हूँ I

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विष्णु स्मरण

प्रात: स्मरामि भवभीति महार्तिनाशम

नारायणं गरुड़वाहन मब्ज नाभम I

ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं

चक्रायुधम तरुणवारिजपत्रनेत्रम I I

अर्थात संसार के भयरूपी महान दुःख को नष्ट करने वाले, ग्राह से गजराज को बचाने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदल के समान नेत्र वाले, पद्मनाभ, गरुड़वाहन भगवान श्री नारायण का मैं प्रात: काल स्मरण करता हूँ I वे मेरे आज को शुभ करें I 

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शिव स्मरण

प्रात: स्मरामि भव भीति हरम सुरेशं
गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम I
खट्वांगशूल वरदा भय हस्तमीशम
संसार रोग हर मौषधमद्वितियम I

अर्थात संसार के भय को नष्ट करने वाले, देवेश, गंगाधर, वृषभ वाहन, पार्वतीपति, हाथ में भक्तों कि रक्षा के लिए त्रिशूल आदि को धारण करने वाले, संसार रूपी रोग का नाश करने के लिए अद्वितीय औषध स्वरुप अभय एवं वरद मुद्रायुक्त हाथों वाले भगवान शिव का मैं अच्छी सुबह के लिए स्मरण करता हूँ I

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दुर्गा स्मरण

प्रात: स्मरामि शरदिंदु करोज्ज्वलाभाम

सद्रत्नवनमकरकुंडलहारभूषाम I

दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्रहस्ताम

रक्तोत्पलाभचरणाम भवतीम परेशां II

अर्थात शरत्कालीन चन्द्रमा के समान उज्जवल आभावाली, उत्तम रत्नों से जडित मकरकुण्डलों तथा हारों से सुशोभित, दिव्यायुधों से दीप्त सुंदर नीले हजारों हाथोंवाली, लाल कमल की आभा युक्त चरणों वाली भगवती दुर्गा देवी का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ I 
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सूर्यस्मरण

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यंरूपं हि मण्डलमृचोSथ तनुर्यजूंषि I

सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपं I

अर्थात सूर्य का वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर, यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद हैं I जो सृष्टि आदि के कारण हैं, ब्रह्मा और शिव क स्वरुप हैं तथा जिनका रूप अचिन्त्य और अलक्ष्य है, प्रात:काल मैं उनका स्मरण करता हूँ I
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त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च I

गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर सहित समस्त नवग्रह मेरे दिन को मंगलमय बनायें I

भृगुर्वसिष्ठ: क्रतुरंगिराश्च मनु: पुलस्त्य: पुलहश्च गौतम: I

रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्ष: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अंगिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन और दक्ष- ये समस्त मुनिगण मेरे प्रात:काल को मंगलमय करें I

सनत्कुमार: सनक: सनन्दन: स्नातनोSप्यासुरिपिंग्लौ च I

सप्त स्वरा: सप्त रसातलानि कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम II

सप्तार्णवा: सप्त कुलाचलाश्च सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त I

भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम II

अर्थात सनत्कुमार, सनक, सनंदन, सनातन, आसुरि और पिंगल- ये ऋषिगण; षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत तथा निषाद- ये सप्त स्वर; अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा पाताल- ये सात अधोलोक सभी मेरे प्रात:काल को मंगलमय करें I सातों समुद्र, सातों कुलपर्वत, सप्तर्षिगण, सातों वन तथा सातों द्वीप, भूलोक, भुवलोक आदि सातों लोक सभी मेरे प्रात:काल को मंगलमय करें I

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प्रकृतिस्मरण

पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथाप:स्पर्शी च वायुर्ज्वलितं च तेज: I

नभ: सशब्दं महता सहैवकुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातं II

इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं पठेत स्मरेद्वा श्रणुयाच्च भक्त्या I

दु:स्वप्ननाशस्त्विह सुप्रभातं भवेच्च नित्यं भगवत्प्रसादात II

 

इस प्रकार उपर्युक्त इन प्रात: स्मरणीय परम पवित्र श्लोकों का जो मनुष्य भक्ति पूर्वक प्रात:काल पाठ करता है, स्मरण करता है अथवा सुनता है, भगवद्यया से उसके दु:स्वप्न का नाश हो जाता है और उसका प्रभात मंगलमय होता है I

 

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पुण्यश्लोकों का स्मरण

शास्त्रानुसार पाप का प्रतिफल दुखों के रूप में पुण्य का प्रतिफल सुख के रूप में प्राप्त होता है I कुछ ऐसे पुण्यात्मा पुरुष हुए हैं जिनका नाम स्मरण करने मात्र से भी हमारे पाप नष्ट होकर पुण्यों की प्राप्ति होती है I आईये अत्यन्त श्रद्धा भक्तिपूर्वक उन महानुभावों का स्मरण करें ताकि उन जैसा ही ओज, वैसी ही महानता, उनकी भुजाओं सी पराक्रमता एवं उनका पुण्यबल वे सब सदगुण जिनके कारण कोई युग पुरुष बनता है, हमें प्राप्त होँ I

पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको जनार्दन: I

पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको युधिष्ठिर: II

आईये अब अपनी लम्बी आयु के लिए इन आठ चिरंजीवियों का आशीर्वाद ग्रहण करें जिन्होनें अपने तप, भगवान के आशीर्वाद एवं दिव्य ऋषियों के आशीर्वाद से अजर- अमर होने का वरदान पाया है :-

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण: I

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन: II

सप्तैतान संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम I

जीवेद वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित: II

कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च I

ऋतुपर्णस्य राजर्षे: कीर्तनं कलिनाशनम II

चलिए अब प्रह्लाद, नारद, पराशर, महाराज अम्बरीश आदि महानुभावों को प्रणाम करें ताकि जिस प्रकार उनहोंने अर्थ और परमार्थ दोनों को पूर्ण रूपेण पाया है, उनके आशीर्वाद से हम भी परिपूर्णता की तरफ बढ़ सकें:-

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान

रुक्मांगदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन पुण्यानिमान परमभागवतान नमामि II

युग प्रणेता कृष्ण जी के प्रिय ये पांच पांडव कितने दिव्य हैं देखिये I युधिष्ठिर जी का नाम लेने से धर्म की वृद्धि होती है, भीम जी का नाम लेने से पाप नष्ट होते हैं, अर्जुन जी का नाम लेने से शत्रु नष्ट होते हैं और माद्री के वे दो पुत्र नकुल एवं सहदेव जिनके स्मरण से रोग दूर होते हैं I हमारे द्वारा हर सुबह वे वन्दनीय हैं :-

धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन I

शत्रुर्विनश्यति धनंजयकीर्तनेन माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगा: II

भगवान शिव की वो प्राचीन नगरी वाराणसी कितनी पुण्य भूमि है जिसके पूर्व दिशा में साक्षात् कृष्ण स्वरुप वेदव्यास जी पूर्व दिशा में ज्ञान का आशीर्वाद देते हुए भगवती भीमचंडी विजयी होने का आशीर्वाद देती हुई, उत्तर दिशा में सुमन्तु नाम के श्रेष्ठ ब्राह्मण धनवान होने का आशीर्वाद देते हुए तथा दक्षिण दिशा में कुक्कुट नाम के ब्राह्मण रात्रि को देखे गए दु:स्वप्नों को सुस्वप्न में परिवर्तित करने का आशीर्वाद देते हुए गुप्त रूप से आज भी विराजमान हैं I उनका स्मरण हमारे आज को मंगलमय करें :- वाराणस्यां भैरवो देव: संसारभयनाशन: I

अनेकजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति II

वाराणस्यां पूर्वभागे व्यासो नारायण: स्वयं I

तस्य स्मरणमात्रेण अज्ञानी ज्ञानवान भवेत् II

वाराणस्यां पश्चिमे भागे भीमचण्ड़ी महासती I

तस्या: स्मरणमात्रेण सर्वदा विजयी भवेत् II

वाराणस्यां उत्तरे भागे सुमन्तुर्नाम वै द्विज: I

तस्य स्मरणमात्रेण निर्धनो धनवान् भवेत् II

वाराणस्यां दक्षिणे भागे कुक्कुटो नाम ब्राह्मण: I

तस्य स्मरणमात्रेण दु:स्वप्न: सुस्वप्नो भवेत् II

ये पांच दिव्य देवियाँ जिनके स्मरण से सौभाग्य का उदय होता है वे हमारे प्रात: काल को शुभ बनाएं :-

उमा उषा च वैदेही रमा गंगेति पञ्चकम् I

प्रातरेव पठेन्नित्यं सौभाग्यं वर्धते सदा II

ये पांच दिव्य देव इनका स्मरण भी अनिवार्य है क्योंकि यही तो आपके रोगों को मिटायेंगे :-

सोमनाथो वैद्यनाथो धन्वन्तरिरथाश्विनौ I

पञ्चैतान् य: स्मरेन्नित्यं व्याधिस्तस्य न जायते II

वासुकि आदि ये पांच महानाग इनके प्रात: स्मरण से विषबाधा का नाश होता है, मानसिक तनाव, अवसाद आदि मानसिक रोग दूर होते हैं :-

कपिला कालियोSनन्तो वासुकिस्तक्षकस्तथा I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं विषबाधा न जायते II

कहीं आप घोर संकट में ना पड़ जाएं इसलिए हनुमान आदि इन पांच देवों का नाम ले लेते हैं :-

हरं हरिं हरिश्चन्द्रम् हनूमन्तं हलायुधम् I

पञ्चकं वै स्मरेन्नित्यं घोरसंकटनाशनम् II

आपकी हर इच्छा परिपूर्ण हो भूख प्यास आदि तृष्णाएँ आपको न सताएं इसलिए ये मन्त्र बोलिए :-

आदित्यश्च उपेन्द्रश्च चक्रपाणिर्महेश्वर: I

दण्डपाणि: प्रतापी स्यात् क्षुत्तृड्बाधा न बाधते II

वसुर्वरुणसोमौ च सरस्वती च सागर: I

पञ्चैतान् संस्मरेद् यस्तु तृषा तस्य न बाधते II

अनावश्यक काम बाधा, बुरे विचार इनसे बचने के लिए आप कहें तो एक मन्त्र बता दूं :-

सनत्कुमारदेवर्षिशुकभीष्मप्लवंगमा: I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं कामस्तस्य न बाधते II

आपका ये फूलों सा कोमल जीवन और इतनी बड़ी- बड़ी परेशानियाँ, ये बाधाएँ कहीं ये आपको दुखी न कर दें ऐसा सोच कर ही मेरे मन ने कहा की ये मन्त्र मैं आपको बता दूं :-

रामलक्ष्मणौ सीता च सुग्रीवो हनुमान कपि: I

पञ्चैतान् स्मरतो नित्यं महाबाधा प्रमुच्यते I

इन पवित्र तीर्थों का स्मरण, गंगा आदि नदियों का पवित्र प्रवाह आईये एक दुबकी लगाते चलें :-

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिम् दण्डपाणिम च भैरवं I

वन्दे काशीं गुहां गंगां भवानीं मणिकर्णिकां II

जब आपने इतने मन से गंगा मैया में डुबकी लगाई ही है तो क्यों ना एक बार दौड़कर इन सारे भगवान शंकर के वास:स्थान द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करके अपने सांसारिक कार्यों में जुट जाएं :-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् I

उज्जयिन्यां महाकालमोम्कारममलेश्वरम् II

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् I

वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे II

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने I

सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये II

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् I

सर्वपापविनिर्मुक्त: सर्वसिद्धिफलो भवेत् II

तत् पश्चात् इस संसार के प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य को तांबे के पात्र में गुड, गेहूँ, रोली, मौली और लाल फूल मिलाकर मन्त्र पढ़ते हुए (उसी जल को तीन बार में बांटकर) जल चढ़ाएं I

मन्त्र : ॐ घृणि सूर्याय नमः I

नोट : यदि आप सूर्योदय से 72 मिनट देर से जल चढ़ा रहे हैं तो इस जल को चर बार मे बाँट कर चढ़ाएं और जल चढाते हुए लोटे को अंगूठे से ना छूएं यदि संभव हो तो एक पैर की एडी को भी उठा लें फिर दोनों हाथ फैलाकर भगवान सूर्य की दिव्य रश्मियों को दोनों हथेलियों से अपने भीतर समाहित हो जाने दें हो सकें तो इन मंत्रों का पाठ करें :-

ॐ एकचक्र रथो यस्य दिव्य कनक भूषित: I

स मे भवतु सुप्रीत: पद्म हस्तो दिवाकर: II

ॐ उद्वयं तमसस्परिश्व: पश्यंत उत्तरम् I

देवं देवत्रा सूर्य मगन्म ज्योति रुत्तमम् II

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पंचदेव स्मरण

इसके बाद पंचदेवों की पूजा- आराधना, मन्त्र- जाप करें क्योंकि ये जीवन को आयु, आरोग्य, यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा, स्थिर व्यवसाय, उत्तम जीवनसाथी, आज्ञाकारी संतानें, भवन, वाहन, सामाजिक जीवन और सुख के सकल साधन देकर जीवन को परिपूर्ण बनाने वाले हैं :-

गणेश पूजन : ॐ गं गणपतये नमः I

इस मन्त्र द्वारा भगवान गणेश जी का चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों के द्वारा पूजन करें अथवा इस मन्त्र का 108 या 11 बार जाप करें I

दुर्गा पूजन

शक्ति स्वरुप माँ दुर्गा जोकि साहस, विजय एवं उत्साह के प्रतीक सिंह पर विराजति हैं I इनका अथवा इनके किसी रूप का 
पूजन भी नित्यकर्म में करना चाहिए I ये दिखने में छोटे किन्तु अथाह शक्ति से सम्पन्न लघु मन्त्र हैं इनका भी यथाशक्ति जाप करें I इसके अलावा आपके पास समय हो तो दुर्गा सप्तशती, नामावली, दुर्गा चालीसा आदि का पाठ करें I 
 
मन्त्र : ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे I
          ॐ दुं दुर्गायै नमः I


शिव पूजन
देवों के देव महादेव अत्यन्त दयालु, शीघ्र प्रसन्न होने के कारण आशुतोष नाम से विख्यात I इतिहास साक्षी है कि देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व इन सबके ऊपर भगवान शंकर जी ने बिना किसी भेद- भाव के दया की है I अतः विशेष कृपा कि प्राप्ति के लिए नित्यकर्मों में इनका पूजन आवश्यक है I वैसे गृहस्थियों को इनकी सपरिवार रूप की पूजा करनी चाहिए I

 प्रार्थना

ॐ कर्पूर गौरम करुणावतारम 
संसारसारम भुजगेन्द्रहारम I
सदावसन्तम हृदयारविन्दे 
भवम भवानी सहितं नमामि II 

मंत्र:-   ॐ नमः शिवाय I
                अथवा 
          ॐ भगवते साम्बसदाशिवाय नमः I


सूर्य पूजन
इनके पूजन की विधि ऊपर बताई जा चुकी है I

विष्णु पूजन
परमार्थ साधन हेतु अपने इस मानव जीवन को सार्थकता देने के लिए भगवान विष्णु के किसी रूप जैसे नारायण, राम, कृष्ण आदि का पूजन करना चाहिए I इनके साथ ही लक्ष्मी का पूजन करें I इन मंत्रों के जाप से आप भगवान विष्णु को प्रसन्न कर सकते हैं I

मन्त्र : ॐ नमो भगवते वासुदेवाय I
          ॐ नमो नारायणाय I
          ॐ श्री सीतारामाभ्यम नमः I
          ॐ श्री राधाकृष्णाभ्याम नमः I

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यह तो एक साधारण सी नित्य पूजा विधि है जिसका सभी को आवश्यक रूप से पालन करना चाहिए किन्तु अपने जीवन में शीघ्रतम उन्नति के लिए आपकी एक छोटी सी दिनचर्या से आपके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन आएँ तो आप www.madhusudanastroguru.com से संपर्क करके अपनी जन्म कुण्डली, अपने ग्रहों, अपनी व्यवसायिक स्थिति या अपनी जरुरत के अनुसार एक स्पेसिफिक (विशेष) दिनचर्या बनवाएं जोकि मात्र Rs. 500 /- आपको उपलब्ध करवाई जाएगी I